क्या आप जानते हैं नवरात्रि में कौनसे भोग किस देवी को चढ़ाते हैं?
नवरात्रि केवल उत्सव और नृत्य का समय नहीं है; यह देवी की शक्ति के प्रति भक्ति और शुद्ध आहार-अनुशासन का भी अवसर है। पारंपरिक रूप से नवरात्रि में जो भोग चढ़ाए जाते हैं, वे क्षेत्र, समुदाय और परिवार की परंपराओं के अनुसार बदलते हैं—कई स्थानों पर सात्विक प्रसाद पर जोर होता है जबकि अन्यत्र स्थानीय पकवानों को देवी को समर्पित किया जाता है। नीचे दिए गए सुझाव व्यापक, विवेचित और व्यवहारिक हैं: वे शाक्त, वैदिक और लोक परंपराओं में मिलते-जुलते प्रथागत आधार पर तैयार किए गए हैं और उन्हें स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ समायोजित किया जा सकता है। मैं हर देवी-रूप के लिए एक नमूना भोग दे रहा/रही हूँ, पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि शास्त्रों में एकरूप सूची नहीं मिलती—इसलिए पारिवारिक और क्षेत्रीय भेदों का सम्मान करते हुए इन सुझावों को एक मार्गदर्शक के रूप में पढ़ें।
नवरात्रि में भोग के सामान्य सिद्धांत
- सात्विकता: ताजा फल, दूध, मिश्री, घी, हलवा, खीर और हल्के पकवान प्राथमिकता में आते हैं।
- व्रत-उपयुक्तता: यदि पूजा व्रत के साथ है तो सादा आटे (कुट्टू, सिंहाड़ा, राजगीरा), साबुदाना, आलू और मूंगफली के व्यंजन सामान्य होते हैं।
- क्षेत्रीय विविधता: बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर भारत—सभी में अलग भोग परंपराएँ हैं; कोई एकमात्र ‘सही’ सूची नहीं।
- भोजन का भाव: शास्त्रीय दृष्टि में भोग का मुख्य लक्ष्य आहार को शुद्ध कर देवी को समर्पित करना और फिर प्रसाद के रूप में सामूहिक साझा करना है।
नवरात्रि के नौ दिन और सुझावित भोग (एक मार्गदर्शक)
- पहला दिन — शैलपुत्री: शैल्य (पर्वत) की संतान के रूप में शैलपुत्री को ताजगी से भरा दूध, नारियल और मौसमी फल चढ़ाना उपयुक्त माना जाता है। कई जगह पर नारियल के साथ मिश्री भी चढ़ाई जाती है। कुछ परंपराएँ साधारण सूजी का हलवा भी देती हैं।
- दूसरा दिन — ब्रह्मचारिणी: तपस्या-रूपी देवी के लिए खीर या दही-चावल (योगिक, सात्विक) और सेहतमंद सूखे मेवे जैसे बादाम-काजू का भोग रखा जाता है। ब्रह्मचारी परंपरा को देखते हुए सरल, पौष्टिक भोग प्रायः चुना जाता है।
- तीसरा दिन — चंद्रघंटा: सौम्य व सौंदर्ययुक्त स्वरूप के कारण कheer/लड्डू, फल और गुलाब जल मिलाकर हल्का मिष्ठान दिया जाता है। कई स्थानों पर पारंपरिक घी का प्रयोग ज्यादा होता है।
- चौथा दिन — कूष्माण्डा: कुछ लोकपरम्पराओं में कूष्माण्डा को कद्दू (कुश्माण्ड) से जुड़ा माना जाता है; इसलिए कद्दू की सब्जी या कद्दू का हलवा भोग के रूप में दिया जाता है। अन्यथा खीर व फल भी स्वीकृत हैं।
- पाँचवा दिन — स्कन्दमाता: स्कन्द यानी कार्तिकेय की माता होने से, मां के रूप में पोषण पर जोर—घी वाले लड्डू, दूध, फल और गुड़ का रस दिया जाता है। कई जगह माँ को बच्चे के प्रतीक के रूप में खिलौने या हल्का भोजन भी चढ़ाया जाता है।
- छठा दिन — कात्यायिनी: योद्धा-स्वरूप के लिए ताकत बढ़ाने वाले पदार्थ—ताजा फल, सत्तु/चने का हलवा, या परंपरागत लड्डू (गुड़-तिल) चढ़ाने की चलन है।
- सातवा दिन — कालरात्रि: कालरात्रि का रूप उग्र है; कुछ परंपराओं में सरल, काली वस्तुओं (काले तिल) या तिल-मिश्री वाले प्रसाद, और मुख्यतः सादा दूध या खीर दिया जाता है। विषमता से बचने के लिए सात्विक और सरल भोग अधिक उपयुक्त माना जाता है।
- आठवा दिन — महागौरी: सौम्य और निर्मल रूप पर जोर—शुद्ध दूध, मलाई, हल्की खीर, गुड़ व सूखे मेवे आदि उपहारस्वरूप रखे जाते हैं।
- नौवा दिन — सिद्धिदात्री/सिद्धयोगिनी/त्रिपुर सुंदरी (क्षेत्रानुसार नाम भिन्न): अंतिम दिन परि पूर्णता और सिद्धि की प्रार्थना के कारण मीठा भोग जैसे खीर, हलवा, लड्डू, और कई जगह चावल-की-खिचड़ी या विशेष पकवान दिए जाते हैं। कई समुदायों में यह दिन विशेष प्रसाद और सामूहिक भोजन का होता है।
क्षेत्रीय उदाहरण (संक्षेप)
- बंगाल: दुर्गापूजा में भोग में खिचड़ी, दूर्वा/फल, रसगुल्ला और पान-मिश्रित प्रसाद आम है।
- गुजरात/महाराष्ट्र: व्रती व्यंजन, हलवा, लड्डू, साबुदाना व्यंजन और स्थानीय फर्सान देवी को अर्पित होते हैं।
- दक्षिण भारत: नवदुर्गा के अवसर पर साडू पासि/पोंगल/कोजाकत्ताई (कोझुकत्तई) जैसी स्थानीय मिठाइयाँ और अन्न-भोग रखे जाते हैं; अंतिम दिन सरस्वती पूजा में विद्या का प्रसाद शामिल होता है।
व्यवहारिक सुझाव और संवेदनशीलता
- यदि परिवार में किसी विशेष देवी-रूप का प्रचलित भोग है, तो वही रखें—परंपरा का सम्मान करना भी एक धार्मिक भाव है।
- ब्राह्मण/पंडित या स्थानीय पुजारी से परामर्श लें—कई गृहस्थ विधान क्षेत्रीय नियम सुझाते हैं (तिथि, वार, और स्थानानुसार)।
- व्रत रखने वालों के लिए साबुत अंकुरित अनाज, सूखे मेवे और व्रत-योग्य आटे के व्यंजन अच्छे विकल्प हैं।
- मूल बात: भोग का वैज्ञानिक उद्देश्य ध्यान में रखें—खाद्य-सज्जा, शुद्धता और सामुदायिक प्रसाद।
निष्कर्ष
नवरात्रि के भोगों का एकमात्र सही तरीका नहीं है; शास्त्रीय और लोक परंपराएँ मिलकर विविधता बनाती हैं। ऊपर दिए गए संकेतक और सुझाव पारंपरिक अनुभवों पर आधारित हैं और इन्हें अपने पारिवारिक/समुदायिक रीति-रिवाजों के अनुरूप ढाला जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण तत्व है निष्ठा और शुद्ध मन से अर्पण—इसी भाव से चढ़ाया गया साधारण प्रसाद भी देवी के समक्ष प्रतिष्ठित माना जाता है।