क्या आप जानते हैं नवरात्रि में किस दिशा में दीपक जलाना शुभ है?
नवरात्रि के दौरान दीपक जलाने का प्रश्न धार्मिक, सांस्कृतिक और वैयक्तिक अनुभवों के मिश्रित संदर्भ में आता है। सामान्यतः लोग जानना चाहते हैं कि कौन-सी दिशा में दीपक रखना सबसे शुभ होगी — क्या यह वास्तुशास्त्र, पुराणिक परम्परा, भक्तिप्रथाएँ या स्थानीय रीति-रिवाज़ों से तय होता है? इस लेख में हम विभिन्न परम्पराओं का संतुलित और विनम्र परिचय देंगे: किस दिशा को क्यों शुभ माना जाता है, कौन-सी जातीय और सम्प्रदायिक विविधताएँ मिलती हैं, तथा व्यवहारिक और सुरक्षा संबंधी सुझाव क्या हैं। ध्यान रहे कि हिन्दू धर्म में तय नियमों की विवेचना अलग-अलग स्कूलों में भिन्न रहती है; यहाँ हम प्रमाणित सामान्य प्रवृत्तियों और व्यावहारिक मानदण्डों का सार प्रस्तुत कर रहे हैं, न कि किसी एक पद्धति का पुकार।
कहां से आती हैं ये मान्यताएँ?
दीपक की दिशा संबंधी प्रथाएँ कई स्रोतों से प्रेरित हैं: पारंपरिक वास्तु शास्त्र, घर-घर में प्रचलित पूजा-पद्धतियाँ, क्षेत्रीय रीतियाँ, और तांत्रिक/शाक्त ग्रंथों की स्थानीय व्याख्याएँ। वास्तु में इशान (उत्तर-पूर्व) को विशेष पुण्यस्थान माना गया है; सूर्य की महत्वता के कारण पूर्व भी ज्ञान और आरोग्य का प्रतीक रहता है। वहीं कुछ वैष्णव और स्मार्त परम्पराएँ देव प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप जलाने पर ज़ोर देती हैं, ताकि देवी/देव की आरती और दर्शन प्रकाश के समक्ष हों।
सबसे सामान्य सुझाव — कौन-सी दिशा शुभ मानी जाती है?
- उत्तर-पूर्व (इशान): अधिकांश वास्तु परंपराओं में यह दिशा अत्यंत शुभ मानी जाती है। इशान को पवित्रता, आध्यात्मिक ऊर्जा और देवत्व का स्थान समझा जाता है; इसलिए पूजा स्थल के उत्तर-पूर्व भाग में दीप रखना शुभ माना जाता है।
- पूर्व (पूर्वमुख): सूर्य की दिशा होने के कारण पूर्व को ज्ञान और नई शुरुआत का चिन्ह माना जाता है। कई पारंपरिक घरों में मंदिर का मुख पूर्व की ओर रहता है और दीप उसी ओर रखे जाते हैं।
- उत्तर: कुबेर, धन और समृद्धि से जुड़ी मान्यताओं के कारण कुछ परम्पराएँ उत्तर दिशा को शुभ मानती हैं, विशेषकर धन-पूजा के समय।
- देव की ओर मुंह करके दीप जलाना: कई भक्त-परम्पराएँ कहती हैं कि दीपक ऐसा रखा जाए कि वह प्रतिमा या तस्वीर की ओर प्रकाशित करे — इससे प्रकाश प्रत्यक्ष रूप से देव को समर्पित होता है।
सम्प्रदायगत और क्षेत्रीय भिन्नताएँ
- शाक्त/तांत्रिक परम्पराएँ: तंत्रिक ग्रंथों और शाक्त रीति-रिवाज़ों में मंदिर-स्थापना तथा दीप-स्थान के लिए विशिष्ट अनुष्ठान-विधियाँ होती हैं; कभी-कभी मंत्रपरक निर्देश उत्तर-पूर्व के साथ-साथ किसी विशेष कोण या स्थान का भी निर्देश देते हैं।
- वैष्णव और स्मार्त परम्पराएँ: सामान्यतः प्रतिमा के सामने, प्रतिमा के मुख के अनुरूप दीप रखा जाता है। यदि घर का मंदिर पश्चिम की ओर मुख कर रहा हो, तो देव की दृष्टि के अनुसार दीप की व्यवस्था की जाती है।
- क्षेत्रीय प्रथाएँ: बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में नवरात्रि के दीप-रिवाज़ अलग-अलग होते हैं — बंगाल में सन्ध्या-दीप और जलेब का आयोजन, गुजरात में घी-दीप और घर-घर की सजावट आदि।
तैयारी और सामग्री पर उल्लेख
- तेल या घी: पारंपरिक ग्रंथ अक्सर घी के दीप को श्रेष्ठ बताते हैं क्योंकि घी शुद्धता और संकल्प का प्रतीक है; परन्तु कुछ परम्पराएँ तिल का तेल, सरसों या वनस्पति तेल भी स्वीकार करती हैं।
- दीप की संख्या: कुछ परिवार हर शाम नौ दीप (नवरात्रि के नौ दिन) जलाते हैं — दिन-प्रतिदिन एक दीप समर्पित करना — जबकि अन्य 9×1, 81, या पौराणिक अनुष्ठान में 108 दीप जैसी संख्याएँ अपनाते हैं। यह पारंपरिक रीति और सुविधा पर निर्भर है।
व्यावहारिक और सुरक्षा दृष्टिकोण
- घरेलू मंदिर की संरचना देखें: यदि मंदिर का मुख पूर्व की ओर है तो दीप वहीं रखें। यदि उत्तर-पूर्व साफ़ जगह है तो वही सर्वोत्तम विकल्प रहेगा।
- दीप को ऐसी जगह रखें जहाँ हवा से वह नरेखे और कपड़े/चित्र/पर्ण इत्यादि जलने का खतरा न हो।
- यदि छोटे बच्चे या पालतू जानवर हों, तो ऊँची, सुरक्षित थाली या दीपक-बक्से का उपयोग करें।
- सामग्री का सम्मान रखें: घी/तेल भरने और मिट्टी/कांच के दीपों को ठोस आधार पर रखें ताकि गिरने का खतरा न रहे।
ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक अर्थ
दीपक का प्रकाश अज्ञान पर ज्ञान की विजय, अँधेरे पर प्रकाश की प्रधानता और अंदरूनी आत्म-प्रज्ञा का प्रतीक रहा है। नव-आरम्भों के त्योहारों में दीप आशा और नयी ऊर्जा का संकेत होते हैं। वास्तुशास्त्र और पूजा-विधियों में दिशाएँ इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं क्योंकि उन्हें ब्रह्मांडीय उर्जा-प्रवाहों के अनुकूल माना गया है।
सारांश और सुझाव
- सामान्यतः उत्तर-पूर्व (इशान) और पूर्व को नवरात्रि में दीप रखने के लिए सर्वाधिक शुभ माना जाता है।
- यदि आपके घर की परम्परा किसी विशेष दिशा का निर्देश देती है, तो उसे प्राथमिकता दें — परम्परा का सम्मान भी धार्मिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
- देव की ओर मुंह करके दीप रखना व्यापक और सरल नियम है: इससे भक्त का ध्यान केंद्रित रहता है और अनुष्ठान की लय बनी रहती है।
- सुरक्षा और सुविधा से जुड़ी व्यावहारिक बातों को अनदेखा न करें; सुरक्षित रूप से जलाया गया दीप ही निरंतर शुभता का मार्ग बनता है।
अंत में यह याद रखना उपयोगी है कि नवरात्रि में दीपक जलाना हृदय का कर्म है — दिशा मायने रखती है पर अन्तःभाव और श्रद्धा ही मुख्य है। अलग-अलग सम्प्रदाय और परिवारों की प्रथाएँ आपस में भिन्न हो सकती हैं; सबसे सुरक्षित और सामंजस्यपूर्ण तरीका यही है कि स्थानीय परम्परा, वास्तु-स्थितियाँ और सुरक्षा को ध्यान में रखकर दीप की व्यवस्था की जाए।