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क्या आप जानते हैं नवरात्रि में देवी दुर्गा के कौनसे नाम लेने चाहिए?

क्या आप जानते हैं नवरात्रि में देवी दुर्गा के कौनसे नाम लेने चाहिए?

नवरात्रि के नौ दिनों में देवी की स्तुति और नाम-सम्प्रदायों का विशेष महत्व है। कई विधाओं में एक‑एक दिन के लिए देवी की अलग अलग रूपों (नवदुर्गा) की पूजा होती है, जबकि दूसरी परंपराएँ एक ही नाम/स्तोत्र का निरन्तर जप करना महत्वपूर्ण मानती हैं। यहाँ उद्देश्य जानकारी देना है — कौन‑कौन से नाम पारंपरिक रूप से लिये जाते हैं, उनके स्रोत और विविध प्रथाओं के बीच क्या अंतर है — न कि किसी एक विधि को ही सर्वोपरि बताना। पाठ में ग्रंथीय संदर्भों (जैसे देवीमहात्म्य/दुर्गासप्तशती, लालितासहस्रनाम) और क्षेत्रीय प्रथाओं का संक्षिप्त उल्लेख होगा। यदि आप नवदुर्गा के नामों का जप करना चाह रहे हैं तो नीचे दिए तरीके सरल, व्यवहारिक और परम्परागत दृष्टि से उपयोगी हैं। याद रखें: उच्चारण, मनोवृत्ति (संकल्प) और श्रद्धा ही मुख्य हैं; स्थानीय गुरु या पुरोहित से पारंपरिक मंत्रों के लिए परामर्श रखें।

नवदुर्गा — पारंपरिक नौ नाम (संक्षेप में)

  • शैलपुत्री — पर्वतपुत्री, पार्वती का रूप; स्थिरता और मूलाधार से जुड़ी शक्ति। परम्परा में नवरात्रि का प्रथम दिवस इसी रूप को अर्पित रहता है।
  • ब्रह्मचारिणी — तपस्विनी रूप, संयम और साधना का भाव; दअित्यों‑वश में नहीं, आत्मसाक्षात्कार की प्रेरणा देती हैं।
  • चंद्रघंटा — शान्ति और वीरता का समन्वय; युद्धरूप नहीं परंतु भय दूर करने वाली शक्ति।
  • कुश्मांडा — सृष्टि‑ऊर्जा का रूप, ब्रह्माण्डीय प्रकाश देने वाली; कुछ परम्पराएँ इसे सृजनात्मिका भी कहती हैं।
  • स्कन्दमाता — माता का रूप, करुणा और मातृत्व; स्कन्द (कार्तिकेय) के माता के रूप में सुमंगल और रक्षा की देवी।
  • कात्यायनी — कात्यायन ऋषि के वंश से उत्पन्न, भक्तों में निर्भयता और संकल्प पैदा करने वाली देवी।
  • कालरात्रि — दुःख, रात्रि और भूत‑प्रेत के भय का नाश करने वाली भीषण रूप; कई शास्त्रीय संदर्भों में यह करुणा और उन्मुक्ति का साधन भी मानी जाती है।
  • महागौरी — शुद्धता और आलोक की देवी; पाप नाश और वैराग्य को प्रोत्साहित करने वाला रूप।
  • सिद्धिदात्री — सिद्धियाँ देने वाली, तंत्र‑शाक्त परम्पराओं में विशेष महत्त्व; समर्पित साधक को सिद्धि प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजी जाती हैं।

ग्रंथीय संदर्भ और विविधताएँ

  • देवीमहात्म्य (दुर्गासप्तशती), जो मार्कण्डेय पुराण के अंश के रूप में मिलती है, देवी के महिम्नों और कई कहानियों का प्रमुख स्रोत है। यह 13 अध्यायबद्ध है और शौर्य, करुणा तथा जगत्‑रक्षण की कहानियाँ बताती है।
  • लालिता सहस्रनाम, ब्रह्मांड पुराण में उद्धृत, देवी के सहस्रनामों का ग्रन्थ है — यह नामावलियों का अत्यंत समृद्ध स्रोत है; परम्परागत पूजाओं में इसका स्थान भिन्न‑भिन्न है।
  • स्थानीय और वैश्विक परम्पराएँ भिन्न हैं: बंगाल में दुर्गा पूजा की शैली, गुजरात में गरबा/डांडिया के साथ नवरात्रि, दक्षिण भारत में विभिन्न स्तोत्र और केरल‑त्रिपुरा जैसी विधियाँ।

कौन सा नाम कब और कैसे लें — व्यवहारिक सुझाव

  • यदि आप नौ‑दिवसीय परंपरा अपनाते हैं, तो प्रत्येक दिन परम्परागत तिथि के अनुसार उस दिन का नौदुर्गा‑नाम लेकर जप कर सकते हैं (उपर्युक्त सूची)।
  • प्रतिदिन नामों का जप 9, 27, 54, 108 का चक्र करना पारंपरिक है; शुरुआती भक्त 9 या 27 से शुरू करें और समय के साथ संख्या बढ़ाएँ।
  • यदि आपने किसी गुरु या पुरोहित से मंत्र‑दीक्षा ली है, तो उसी मंत्र का नियमित जाप सबसे उपयुक्त होता है। बिना दीक्षा के कुछ तन्त्र‑सूत्रों के जप निजी तौर पर करने से बचें; सरल नाम‑जप (Navarnaamavali) या लोकप्रचलित दुर्गास्तोत्र सुरक्षित विकल्प हैं।
  • संकल्प (उद्देश्य) स्पष्ट रखें: शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मिक उन्नति या समुचित कार्य‑सफलता — जाप में यह मनोबद्ध करें।
  • संकल्प के साथ उच्चारण (देवनागरी या रोमन लिपि) और शुद्ध उच्चारण पर ध्यान दें; यदि संस्कृत कठिन लगे तो नामों का हिंदी अर्थ जानकर भक्तिपूर्वक जप करना भी फलदायी माना जाता है।

वैकल्पिक नाम और व्यापक उपाधियाँ

  • देवी को अनेक उपनामों से पूजा जाता है: अम्बिका, जगदम्बा, भवानी, चंडी, चामुंडा, त्रिपुरसुन्दरी, लालिता आदि। कुछ परम्पराएँ नवरात्रि में इन उपाधियों का विशेष रूप से उच्चारण करती हैं।
  • शाक्त परम्पराएँ तन्त्रग्रंथों से जुड़े अतिरिक्त नाम और शक्तियाँ जोड़ती हैं; स्मार्त या वैष्णव परम्पराएँ नम्रता और लोकहित की दृष्टि से अन्य विधियाँ चुन सकती हैं।

नैतिक और संस्कृति‑संबंधी ध्यान

  • नाम लेते समय अहंकार, नफरत या दूसरों के प्रति द्वेष न लाएं — परम्परागत सूत्र यह कहते हैं कि देवी का वास्तविक स्वरूप करुणा और धर्म का संरक्षण है।
  • भाषा और क्षेत्र की विविधता को स्वीकारें: संस्कृत जप न कर पाने पर स्थानीय भाषाओं में अर्थपूर्ण स्तुति करना भी समान रूप से सम्माननीय है।
  • यदि आपने किसी विशिष्ट मंत्र या संहिता अपनाई है, उसकी पारम्परिक मर्यादा और गुरु‑परामर्श का पालन करें—क्योंकि कुछ मन्त्र परम्पराओं में दीक्षा‑नियमन होते हैं।

अंतिम सलाह

नवरात्रि में नाम लेने का मूल उद्देश्य मन का सामान्यीकरण, भय समाप्ति और ईश्वर/देवी के प्रति समर्पण है। साधारणतः नौदुर्गा के पारंपरिक नाम (ऊपर सूचीबद्ध) से शुरुआत करिये; यदि उपलब्ध हो तो देवीमहात्म्य या लालिता सहस्रनाम का पठन/श्रवण सूचित और समृद्ध अनुभव देगा। किसी भी शंकित या विशेष मंत्र‑विधि के लिए स्थानीय विद्वान या गुरु से परामर्श अवश्य लें। याद रखें: श्रद्धा, शुद्ध मन और नैतिक जीवन ही किसी भी पूजा‑प्रक्रिया का आधार हैं।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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