क्या आप जानते हैं माँ कुष्मांडा को ‘आदि स्वरूपा’ क्यों कहा जाता है?
क्या आप जानते हैं कि माँ कुश्मांडा को ‘आदि स्वरूपा’ कहा क्यों जाता है? यह प्रश्न केवल नाम-व्युत्पत्ति तक सीमित नहीं है बल्कि सृष्टि-संकल्पना, देवी-आधारित दर्शन और लोक-व्यवहार के मिलन से जुड़ा है। पारंपरिक शाक्त ग्रंथों में माँ कुश्मांडा को वह देवी बताया गया है जिसने पहले उजाले, प्रथम ऊर्जा और ब्रह्माण्ड के अंडाकार रूप (ब्रह्माण्ड) की सृष्टि की — कई भाष्यकार इसे ‘मुस्कान से सृष्टि’ की कथा से जोड़ते हैं। दूसरी ओर, विविध सांस्कृतिक परंपराओं और सम्प्रदायों में इस उपाधि की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की गई है: कुछ ग्रन्थों में वे आद्यशक्ति के रूप में पूजी जाती हैं, कुछ में सर्जक के रूप में और कुछ में जीवन-शक्ति (प्राण) की प्रतिपत्ति के रूप में। इस लेख में हम नाम की व्युत्पत्ति, शास्त्रीय संदर्भ, चिन्हात्मक रूप-निर्वचनाएँ और दर्शनात्मक अर्थों को सामने रखकर समझने की कोशिश करेंगे कि क्यों कुश्मांडा को ‘आदि स्वरूपा’ कहा जाता है — और किन परिप्रेक्ष्यों में यह पदविशेष अलग अर्थ लेता है।
नाम और व्युत्पत्ति
कुश्मांडा नाम का पारंपरिक संस्कृत-विश्लेषण तीन भागों में किया जाता है: ku (अल्प/सूक्ष्म), ushma (ऊष्मा, ऊर्ज़ा/उष्णता/प्रकाश) और anda (अंडा, ब्रह्माण्ड का अंकुरित रूप)। इस मिश्रण-वाचन के अनुसार कुश्मांडा का अर्थ हुआ — ‘उस छोटी-सी मुस्कान/ऊष्मा से जिसने ब्रह्माण्ड-अंडा (ब्रह्माण्ड) को उत्पन्न किया’। लोक-कथाओं और पूजापद्धतियों में यही भाव प्रचलित है: जब सृष्टि अन्धकार में थी, तब देवी की एक हल्की मुस्कान/तेज से प्रथम प्रकाश उत्पन्न हुआ और ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ।
इसके अतिरिक्त भाष्यकारों और ग्रामीण व्याख्याओं में और भी अर्थ मिलते हैं — जैसे कुछ प्रथाओं में ‘कुश’ (कदली/निर्यातक) या ‘कुश’ से जुड़ी लोककथाएँ आती हैं — पर शास्त्रीय परंपरा में सबसे स्वीकार्य व्याख्या उपर्युक्त त्रिभाव वाली ही है।
ग्रंथों और परंपरागत संदर्भ
देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण का भाग) एवं श्राद्ध-कालीन स्तोत्रों में कुश्मांडा का उल्लेख मिलता है; वहां वह सृष्टिकर्त्री व जगत-सृजन से जुड़ी देवी के रूप में प्रस्तुत हैं। शाक्त ग्रन्थों और उपशास्त्रों में उन्हें आद्यशक्ति या ‘आद्य’ के रूप में संवोधित किया जाता है — इसका तात्पर्य वह प्रथम शक्ति जो सृष्टि का कारण बनी।
ललिता सहस्रनाम और देवी भागवत जैसे ग्रंथों में भी देवी के आद्यत्व के विभिन्न पहलू मिलते हैं; शास्त्रार्थ में उन्हें ‘आदि’ या ‘आद्य’ कहकर दिव्य मूल के संकेत दिए जाते हैं। तान्त्रिक परम्पराएँ और श्रीविद्या में देवी को प्रथम कारण के रूप में स्वीकारा गया है — यानी जो न केवल पदार्थ का स्रोत है बल्कि ज्ञान-ऊर्जा का भी मूल है।
आइकॉनोग्राफी और प्रतीकवाद
कुश्मांडा की पारंपरिक मूर्तिकला-चित्रणों में उन्हें आठ-हाथों वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जिनके हाथों में कमंडलु, जपमाला, बाण-धनुष, चक्र, कलश आदि प्रतीक दिखाई देते हैं और वे सिंह पर विराजमान होती हैं। वक्ष-पृष्ठ में कभी-कभी सूर्य-हिमांश या तेज का गोला चित्रित रहता है, जो उनसे जुड़े सौर-ऊर्जात्मक अर्थ को रेखांकित करता है।
प्रतीकात्मक रूप से:
- मुस्कान/हास्य — स्वाभाविक सर्जनशील अभिव्यक्ति, बिना किसी संघर्ष के पहली प्रेरणा।
- सूर्य/ऊष्मा — प्राण, प्रकाश और ताप; जीवन-ऊर्जा जो सृष्टि को सक्षम बनाती है।
- अंडाकार ब्रह्माण्ड — ब्रह्माण्ड का एकक-संकल्प, समग्रता से उत्पत्ति का रूप।
- अष्टभुजता — विविध अधिकार-क्रियाएँ (सृजन, पालन, विनाश, अनुग्रह आदि) और बहु-माध्यमिक शक्ति।
दार्शनिक अर्थ और सम्प्रदायिक दृष्टियाँ
जब हम ‘आदि स्वरूपा’ कहते हैं तो दो तरह के अर्थ सामने आते हैं — एक, समय-आधारित (जो पहले उत्पन्न हुआ) और दूसरा, ontology-आधारित (जो मूल-स्वरूप है)। शाक्त परम्परा में कुश्मांडा आद्यशक्ति का यही ontology है: वह न केवल समय में ‘पहली’ है बल्कि सभी सत्ता/सृजन के आधार-स्वरूप है।
शैव दर्शन, विशेषकर काश्मीरी शैववाद, में भी शक्ति को सत्य के प्रज्वलित रूप के रूप में माना जाता है — वहाँ शाक्ति (शक्ति) और शिव (चैतन्य) की द्वैत-रहित परस्परता पर बल है; कुछ शैव वाङ्मय देवी को आद्यशक्ति के रूप में पहचानते हैं। वैष्णव संदर्भों में देवी अक्सर ईश्वर की सहधर्मिणी या विशिष्ट शक्तिमय स्वरूप के रूप में पूजी जाती हैं; कुछ वैष्णवग्रन्थ भी देवी को माया/शक्ति के रूप में देखें हैं। समकालीन विद्वत्ता इन सभी व्याख्याओं को परस्पर पूरक मानती है: ‘आदि’ का भाव विभिन्न समन्वयों में लागू होता है — प्रथम कारण, प्रथम अभिव्यक्ति और प्रथम-कम्पन/ऊर्जा।
कहने का सार — क्यों ‘आदि स्वरूपा’?
संक्षेप में कहा जा सकता है कि कुश्मांडा को ‘आदि स्वरूपा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि:
- शास्त्रीय कथाओं में वे सृष्टि के आरम्भिक प्रेरक के रूप में वर्णित हैं — ब्रह्माण्ड का ‘अंडा’ उनकी उपस्थिति से बनता है।
- उनका सूचक रूप (मुस्कान + सूर्यात्मक तेज) सृष्टि को जन्म देने वाली पहली ऊर्जा के रूप में पढ़ा जाता है।
- दार्शनिक दृष्टि में वह आद्यशक्ति हैं — जो ब्रह्माण्ड की कारणात्मकता और ज्ञान-ऊर्जा दोनों का मूल हैं।
- सम्प्रदायिक और तान्त्रिक प्रथाओं में उन्हें प्रथम आराध्य माना जाता है, इसलिए ‘आदि’ का संबोधन शास्त्रीय और भक्तिमूलक दोनों अर्थों में उपयुक्त है।
आराधना और जीवन् पर असर
प्रचलित पूजा-परम्पराओं में माँ कुश्मांडा की विशेष आराधना नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है — भक्त उनकी स्तुति करके जीवन-ऊर्जा, स्पष्टता और आरम्भिक प्रेरणा की कामना करते हैं। माला-जप, दीप-आराधना और सरल भोग-वंदनाएँ आम तौर पर प्रचलित हैं। तांत्रिक अभ्यासों में कुश्मांडा के विशिष्ट मंत्रों और ध्यान-प्रथाओं का प्रयोग आन्तरिक ऊर्जा (प्राण/शक्ति) को जगाने के लिए किया जाता है — पर यह प्रथा परम्परा और गुरु-परंपरा के अनुसार भिन्न होती है।
अंततः, ‘आदि स्वरूपा’ की उपाधि केवल एक पुरानी कथा का नाम नहीं है — यह एक सोच है जो कहती है: हर सृष्टि की शुरुआत एक सूक्ष्म, जीवंत, दैवीय प्रेरणा से होती है। चाहे आप इसे आध्यात्मिक-सूत्रों के अनुसार स्वीकार करें, या प्रतीकात्मक रूप में देखें — माँ कुश्मांडा का आद्यत्व हमें उस पहली चमक, उस पहली मुस्कान की ओर इशारा करता है जो अन्धकार में भी सृजन को संभव बनाती है।