क्या है देव दीपावली? जानें तिथि, महत्व और पूजा विधि
देव दीपावली हिंदू धार्मिक परंपरा में कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है। यह त्यौहार प्रायः दीपों और आरती के दृश्य से जुड़ा होता है और विशेष रूप से बनारस (काशी) में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, जहाँ घाटों पर हजारों मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। नाम में ही स्पष्ट है: “देव” यानी देवता और “दीपावली” यानी दीपों की पंक्ति — कहा जाता है कि इस दिन देवता गंगा स्नान और दर्शन हेतु उतरते हैं। देव दीपावली का धार्मिक और सामाजिक महत्व कई आयाम रखता है: तिथि और ज्योतिषीय सन्दर्भ, पौराणिक कथाएँ और स्थानीय लोकमान्यताएँ, सार्वजनिक आराधना व गंगा-घाटों पर होने वाले अनुष्ठान, तथा व्यक्तिगत पूजा और दान-पुण्य की प्रथाएँ। नीचे तिथि, महत्व और घर-गृहस्थ व सार्वजनिक पूजा-विधि को संक्षेप में लेकिन पकड़ के साथ पेश किया गया है।
तिथि और पंचाङ्गीय विवरण
देव दीपावली सामान्यतः कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा (कार्तिक पूर्णिमा) को होती है। पंचाङ्ग के अनुसार यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। चूँकि हिंदू लूनर-समय कैलेण्डर पर आधारित हैं, इसलिए Gregorian (अंग्रेजी) तिथि हर साल बदलती रहती है — प्रायः अक्टूबर के अंत से लेकर नवंबर के मध्य तक। ध्यान दें कि तिथि का आरम्भ और अंत स्थानीय सूर्योदय/सूर्यास्त के आधार पर पञ्चाङ्ग में अलग हो सकता है; इसलिए स्थानानुसार स्थानीय पञ्चाङ्ग या मंदिर-सूचना देखकर ही ठोस समयावलोकन करें।
ऐतिहासिक व पौराणिक संदर्भ: कई व्याख्याएँ
देव दीपावली के उत्सव के संबंध में अलग‑अलग पुराणिक व लोककथात्मक व्याख्याएँ मिलती हैं:
- स्थानीय बनारसी परंपरा कहती है कि इस रात देवता गंगा स्नान के लिए उतरते हैं और बनारस में दीपों से रास्ता बनाते हुए दर्शन करते हैं—इसी कारण घाटों पर विशाल दीप सजाए जाते हैं।
- कुछ पौराणिक ग्रन्थों और लोककथाओं में कार्तिक पूर्णिमा को शिव की त्रिपुरारि विजय (ट्रिपुरा दहन) से जोड़ा जाता है — इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह व्याख्या शैव समुदायों में प्रचलित है।
- वैष्णव और अन्य परंपराओं में भी कार्तिक मास को पुण्य माना गया है; अनेक गीता‑भाष्यकारों व भक्तिकालीन रीतियों में कार्तिक की उपासना और दीपक-पूजन का विशेष स्थान है।
- सामाजिक दृष्टि से यह पर्व प्रकाश से अज्ञान का निवारण, पितृपूजा/तर्पण और दान‑पुण्य का समय भी माना जाता है।
महत्व — आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों
देव दीपावली का धनात्मक महत्व अनेक स्तरों पर समझा जा सकता है:
- आध्यात्मिक: प्रकाश का प्रतीकात्मक अर्थ — भीतर के अन्धकार (अज्ञान, आसक्ति) का निवारण और आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होना।
- धार्मिक: गंगा स्नान का पुण्य विशेषकर कार्तिक मास में माना गया है; पूजा-पाठ, अभिषेक, व्रत-निर्वाह का विशेष फल बताया गया है।
- सामाजिक/सांस्कृतिक: घाटों व मंदिरों पर सामुदायिक आयोजन, भजन‑कीर्तन और स्थानीय अर्थव्यवस्था (दीप, फूल, प्रसाद) को सक्रियता मिलती है।
घरेलू और सार्वजनिक पूजा‑विधि (संक्षेप में)
नीचे सामान्यतः अनुसरण की जाने वाली कुछ प्रथाएँ दी जा रही हैं; परम्परा और समुदाय के अनुसार भिन्नताएँ हो सकती हैं — स्थानीय गुरु या पण्डित से मार्गदर्शन उपयोगी रहेगा:
- स्वच्छता और स्नान: सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो नदियोग्य स्थान पर (विशेषकर गंगा) स्नान किया जाता है।
- संकल्प और देवता‑स्थापन: दीपक/मूर्ति के समक्ष संकल्प लें — किस देवता/देवियों की पूजा करनी है, क्या दान करना है।
- दीपदान: मिट्टी के दीपक अथवा पर्यावरण-अनुकूल दीप जला कर घाटों, घर की आँगन या मंदिर में सजाएँ। परंपरा में संख्याएँ भिन्न होती हैं — 108, 1000 या जो संभव हो।
- आरती और भजन: समूह में आरती, भजन‑कीर्तन, गंगा-आरती का आयोजन। घर में भी छोटी आरती की जा सकती है।
- नैवेद्य और प्रसाद: फलों, मिठाईयों और पेय का अर्पण। मत्स्य/गंगा-जीव सुरक्षा का ध्यान रखते हुए स्थानीय नियम मानें।
- पितृतर्पण व दान: कई परिवार तर्पण या पितोष्ण/स्नान के बाद दान करते हैं — अन्नदान, दीपदान, वस्त्र आदि।
- घाटों पर छठा‑प्रकार: बनारस जैसे स्थानों पर शाम को घाटों पर दीपों की कतार, विशेष आरती और होली‑सीख भिन्न प्रकार के अनुष्ठान होते हैं।
वार्षिक आयोजन व सार्वजनिक सुरक्षा‑विचार
बड़े आयोजनों में स्थानीय प्रशासन, मंदिर समितियाँ और समाजिक संस्थाएँ मिलकर सुरक्षा, भीड़-नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखती हैं। हाल के वर्षों में जलाशयों व नदियों के संरक्षण और प्लास्टिक के प्रयोग को कम करने के लिए पर्यावरण-अनुकूल लक्ष्यों पर जोर दिया जा रहा है — जैसे मिट्टी के दीपक, जैविक सामग्री का उपयोग और दीपक संग्रह की व्यवस्था।
विविध परंपराओं का सम्मान और व्यावहारिक सुझाव
देव दीपावली अलग‑अलग समुदायों में भिन्न अर्थ रखता है। सम्मानपूर्ण दृष्टि से बेहतर यही है कि स्थानीय रीति, मंदिर‑परंपरा और पारिवारिक आदेशों का पालन करें। कुछ व्यावहारिक सुझाव:
- तिथि और शुभ समय के लिए स्थानीय पञ्चाङ्ग या पुजारी से पुष्टि करें।
- यदि नदी किनारे जा रहे हैं तो सुरक्षा‑नियमों और ऊँची लहर/बारिश चेतावनियों का पालन करें।
- दीप और उत्सव में पर्यावरण का ध्यान रखें — गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्री का प्रयोग सीमित करें।
- यदि सार्वजनिक आयोजन में शामिल हों तो स्थानीय समुदाय के नियमों का सम्मान करते हुए सहभागी बनें।
निष्कर्ष
संक्षेप में, देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा का ऐसा त्योहार है जो प्रकाश, स्नान, देव-पूजन और सामुदायिक आराधना को जोड़ता है। धार्मिक ग्रंथों और लोकपरंपराओं में इसकी विवेचना अनेक आयामों में मिलती है; इसलिए इसे समझते समय क्षेत्रीय प्रथाएँ और परंपरागत व्याख्याएँ ध्यान में रखें। श्रद्धा, संयम और पर्यावरण‑दृष्टि से मनाए जाने पर यह पर्व व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों रूपों में सार्थक अनुभव देता है।