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क्यों माना जाता है नवरात्रि को पापों का नाश करने वाला पर्व?

क्यों माना जाता है नवरात्रि को पापों का नाश करने वाला पर्व?

नवरात्रि को अनेक समुदायों और परंपराओं में पापों के नाशक पर्व के रूप में माना जाता है। यह धारणा केवल लोकविश्वास नहीं है; इसके पीछे पुराणिक कथाएँ, स्ट्रोट‑पाठ, उपवास‑नियम, और नीतिकल्पनाएँ काम करती हैं। शारदीय नवरात्रि (आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू) और चैत्र नवरात्रि (चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा) में भक्त नौ दिन देवी के नौ स्वरूपों—नवदुर्गा—की आराधना करते हैं। Markandeya Purana में संकलित Devi Māhātmya (अध्याय 81–93), जिसे Durga Saptashati या Chandi Path भी कहते हैं, खास तौर पर इन नौ दिनों में पाठ के लिए परंपरागत है; वहां देवी के अधिष्ठान पर रखे गए व्रत और शत्रु विनाश के प्रसंग मिलते हैं। इस लेख में हम शास्त्रीय, लोक और मनो‑सामाजिक कारणों को अलग‑अलग देखते हुए समझेंगे कि क्यों नवरात्रि को पापों का नाश करने वाला पर्व माना जाता है—और यह समझते हुए कि इस धारणा के अनेक अर्थ और व्याख्याएँ मौजूद हैं।

पुराणिक और आख्यानात्मक आधार

Devi Māhātmya में देवी का हठपूर्वक वर्णन है—महिषासुर, शुम्भ‑निशुम्भ जैसे दैत्यों का विनाश, और धर्म की स्थापना। इन कथाओं में राक्षसी प्रवृत्तियों का प्रमोद, अहंकार और अन्याय देवी के द्वारा नष्ट किए जाने के रूप में दर्शाए गए हैं। लोकधारणा में इन्हें केवल बाह्य भय का निवारण नहीं, बल्कि आंतरिक दोष—अहं, लोभ, द्वेष—का प्रतीक माना जाता है। इसलिए देवी के विनाश को पापों और बुरी प्रवृत्तियों के नाश से जोड़ दिया गया।

व्रत, तप और पुण्य के कर्मकाण्डी तर्क

हिंदू धर्मशास्त्रों में व्रत (vrata) और तप (tapasya) को कर्म‑बन्धन कम करने वाले उपाय के रूप में देखा गया है। नवरात्रि के दौरान उपवास, जप, पाठ और यज्ञ जैसे नियत कर्मों को करने से माना जाता है कि व्यक्ति अपनी मानसिक अनुशासनता बढ़ाता है और अज्ञानजनित कर्मों की पुनरावृत्ति घटती है। कई संस्कृत ग्रंथों और क्षेत्रीय साधनाओं में कहा गया है कि निष्ठापूर्वक किया गया पाठ या मंत्रजप पुण्य अर्जित कराके पूर्वाचारों के प्रभावों को कम कर देता है—यह दावा लोकधार्मिक परंपरा का हिस्सा है।

मंत्र, पाठ और शास्त्रीय वाद

Devi Saptashati (700 श्लोक) का पाठ पारंपरिक रूप से नवरात्रि में किया जाता है; यह पाठ देवी के स्वरूपों और उनके भक्तों पर होने वाले लाभों का वर्णन करता है। तांत्रिक शास्त्रों और स्तोत्र परंपराओं में कुछ मंत्रों को पापक्षयिनी कहा गया है—यानी उनका लगातार जप मनोवैज्ञानिक संस्कार बदलता है और आचार‑विचार में सुधार लाता है। गीता‑व्याख्याकार इस संदर्भ में कहते हैं कि संयमित कर्म और भक्ति से मैं‑बन्धन घटता है; इसलिए धार्मिक अभ्यास कर्म के फलस्वरूप पाप के बन्धन को कम करने में सहायक होते हैं।

रूपक‑व्याख्या: देवी का दानवों पर जितना ही आंतरिक अर्थ

कई परंपराएँ देवी की चारित्रिक कथाओं को बाह्य नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से पढ़ती हैं। Mahishasura‑विनाश को अहंकार का नाश माना जाता है; शुम्भ‑निशुम्भ के प्रसंगों से लोभ, क्रोध और असत्य के विनाश का नैतिक सबक मिलता है। इस दृष्टि से नवरात्रि पापों का नाशक इसलिए है क्योंकि वह ‘स्वयं‑परीक्षण’ और ‘चरित्र‑पुनर्निर्माण’ का नौदिनीय अवसर देता है—भक्त अपराधों की ओर किए गए व्यवहारों पर रोक लगाता है और सदाचार के प्रतिरूप अपनाता है।

सामाजिक और नैतिक आयाम

नवरात्रि में पूजा‑पाठ के साथ दान (दान, अन्नदान, कन्या पूजन), सामुदायिक भोजन और मेलजोल भी प्रमुख हैं। सामाजिक रूप से मदद करना और क्षमा करना—ये कर्म समुदाय में पुण्य का संचय करते हैं। लोकशास्त्रीय दृष्टि से ये सार्वजनिक आचरण व्यक्ति को अपने किए पर विचार करने और उसे सुधारने का मंच देते हैं। इसलिए पापों का ‘नाश’ न केवल दिव्य अनुकम्पा बल्कि समाज द्वारा समर्थित नैतिक व्यवहार का प्रतिफल भी माना जाता है।

विविध व्याख्याएँ और सावधानियाँ

यह बताया जाना जरूरी है कि ‘नवरात्रि = स्वतः ही पापों का नाश’ वाली धारणा सभी विद्वानों या परंपराओं द्वारा शाब्दिक रूप में स्वीकार्य नहीं है। कुछ शास्त्री इसे प्रतीकात्मक और मनो‑नैतिक सुधार का माध्यम बताते हैं—यानी धार्मिक अभ्यास वास्तविक जीवन में सुधार लाकर कर्मफ़ल को प्रभावित करते हैं, परन्तु यह कोई स्वतः‑स्फूर्त मेटाफिज़िकल क्लीनस नहीं है जो बिना परिवर्तन के पाप मिटा दे। दूसरी ओर, भक्तियों में यह विश्वास भी है कि देवी की अनुग्रह शक्ति से दोष क्षमा संभव है—यह विश्वास भी हिंदू धर्म की परंपरागत मान्यताओं का हिस्सा है।

किस प्रकार के आचरण से असर बढ़ता है?

  • लगातार और निष्ठापूर्ण साधना—जाप, पाठ, ध्यान और नियम पालन।
  • परोपकार और दान—कन्या पूजन, अन्नदान, जरूरतमंदों की मदद।
  • आत्मिक आत्मावलोकन—अभ्यस्त प्रवृत्तियों को बदलने का संकल्प।
  • समुदाय‑उपक्रम—सामूहिक पूजा और मेलजोल से सामाजिक जिम्मेवारी का अभिवृद्धि।

निष्कर्ष

नवरात्रि को पापनाशक पर्व समझने के पीछे कई कारण हैं: पुराणिक आख्यानों का भाष्य, शास्त्रों में दर्ज व्रत‑फलों का भरोसा, साधना‑आचरण से होने वाला नैतिक परिवर्तन, और सामुदायिक पुण्य के अवसर। विभिन्न परंपराओं में इसका अर्थ अलग‑अलग निकला जा सकता है—कुछ लोग इसे देवी की कृपा से सीधे पापक्षय मानते हैं, जबकि विद्वान और तात्त्विक दृष्टि इसे आचरणीय सुधार का समय समझते हैं। दोनों दृष्टियों में समान मुद्दा यह है कि नवरात्रि व्यक्ति को ध्यान, संयम और दया के रास्ते पर लाने का अवसर देती है—और यही पहले‑पहल पाप‑दोषों के नाश का तात्पर्य भी समझा जा सकता है।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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