दिवाली की रात काजल लगाना क्यों है जरूरी? जानें परंपरा
दिवाली की रात काजल लगाने की परंपरा अनेक परिवारों में आज भी जीवित है। यह केवल सजावट का हिस्सा नहीं है, बल्कि सामाजिक, धार्मिक, चिकित्सीय और आत्मिक स्तर पर कई अर्थ जोड़े जाते हैं। कुछ स्थानों पर यह रीत–रिवाज पीढ़ियों से चली आ रही लोककथा और घरेलू मान्यताओं से जुड़ी है; कहीं इसे देवी लक्ष्मी के स्वागत के साथ जोड़कर देखा जाता है। साथ ही आयुर्वेद और लोकचिकित्सा में नेत्र की सुरक्षा और झपकी से बचाने के रूप में अंजन का एक प्राचीन हिस्सा रहा है। इस लेख में हम संस्कृति, धर्मशास्त्र, लोकविश्वास और आधुनिक सुरक्षा परस्परता के साथ समझेंगे कि दिवाली की रात काजल लगाने को क्यों जरूरी माना जाता है — और किन सीमाओं और सावधानियों के साथ इसे आज अपनाया जा सकता है।
परंपरागत और धार्मिक कारण
दिवाली सामान्यत: कार्तिक अमावस्या की रात मनाई जाती है; यह वह समय है जब अँधेरा गहरा होता है और घरों में दीप जलाकर आलोक फैलाया जाता है। परंपरा के कई स्तर हैं जिनसे काजल लगाने की प्रथा जुड़ी है:
- आकर्षण और स्वागत: कई समुदायों में यह माना जाता है कि देवी लक्ष्मी और अन्य देवताएँ स्वच्छ और सज्जित घर में वास करती हैं। इसलिए लक्ष्मी पूजन से पहले स्त्रियाँ और परिवार के लोग सुसज्जित होते हैं। काजल को सौंदर्य एवं पूजन की तैयारी का हिस्सा माना जाता है।
- बुरी नजर से सुरक्षा: लोकविश्वास में काजल का प्रयोग नेत्रों को बुरी नजर (नजर-उत्पन्न प्रभाव) से बचाने के उपाय के रूप में आता है। ऐसे मान्यताओं के अनुसार विशेष अवसरों पर आंखों पर काजल लगाने से नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होता है।
- राक्षसी और आत्मिक सुरक्षा: कुछ तांत्रिक और लोक-रिवाजों में अंजन को नेत्र-संरक्षण का साधन माना गया है — यह धारणा है कि अंजन नेत्रों की प्रतिरोध क्षमता बढ़ा कर अशुभ प्रभावों से रक्षा कर सकता है।
ऐतिहासिक और चिकित्सीय संदर्भ
परंपराओं के साथ-साथ अंजन/काजल का ऐतिहासिक उपयोग आँखों की सुरक्षा और चिकित्सा दोनों से जुड़ा रहा है। आयुर्वेदिक और लोकचिकित्सा के ग्रंथों में नेत्रसंरक्षण के साधनों का उल्लेख मिलता है; विभिन्न आयुर्वेदाचार्य और नेत्र-विशेषज्ञों ने पारंपरिक नुस्खों में सूरजमुखी, मिश्री, मिट्टी या औषधीय पदार्थों से बने अंजन का उल्लेख किया है। तथापि यह याद रखें कि ऐतिहासिक संदर्भ और आज के कॉस्मेटिक उत्पाद अलग हैं — पुराने विधियों का वैज्ञानिक परीक्षण सीमित है।
समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पहलू
काजल लगाने की प्रथा का समाजशास्त्रीय महत्व भी है:
- सामूहिक पहचान: त्योहारी तैयारी में समान रीति-रिवाज अपनाने से समुदाय में एकता और पहचान बनती है।
- अनुष्ठानिक ताजगी: किसी पूजा व अनुष्ठान के पहले साज-श्रृंगार करने का भाव स्वयं को और परिवार को तटस्थ और सकारात्मक रूप से तैयार करने का साधन है। यह मनोवैज्ञानिक रूप से आत्मविश्वास बढ़ाता है।
- लक्ष्मी-आमंत्रण की प्रतीकात्मकता: घर को सजाना और स्वयं को सजाना, दोनों ही आमंत्रण का प्रतीक माने जाते हैं — यह आतिथ्य और सकारात्मकता का संकेत देता है।
विविधताएँ और मतभेद
धार्मिक परंपराएँ एकरूप नहीं हैं। सभी सम्प्रदायों, परिवारों या व्यक्तियों के लिए दिवाली पर काजल लगाना अनिवार्य नहीं है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदु:
- Śaiva, Vaiṣṇava, Śākta और Smārta परंपराएँ अलग-अलग रीति-रिवाज अपनाती हैं; कुछ समुदायों में पुरुष भी पारंपरिक नेत्र-रक्षा चिह्न लगाते हैं।
- क्षेत्रीय भेद हैं — दक्षिण, पश्चिम या पूर्व भारत की लोक-रिवाजों में अंतर मिलता है।
- आधुनिक शहरी परिवेश में कई लोग इसे व्यक्तिगत सौंदर्य या फैशन के रूप में देखते हैं, न कि धार्मिक अनिवार्यता के रूप में।
आधुनिक सुरक्षा और सावधानियाँ
परंपरा की मान्यताओं के साथ-साथ आज स्वास्थ्य और सुरक्षा पर विशेष ध्यान जरूरी है। पारंपरिक काजल में कभी-कभी सीसा या अन्य जहरीले तत्व पाए गए हैं, जो आँखों के लिए हानिकारक हो सकते हैं। इसलिए:
- प्रामाणित उत्पाद चुनें: किसी भरोसेमंद ब्रांड का परीक्षण किया हुआ, आँखों के लिए सुरक्षित लिखा हुआ काजल ही इस्तेमाल करें।
- घरेलू नुस्खों में सतर्कता: पारंपरिक अंजन बनाते समय स्वच्छता और सामग्रियों की शुद्धता सुनिश्चित करें; बिना परीक्षण के समानों का उपयोग बचें, खासकर बच्चों के लिए।
- प्रयोग विधि: काजल को आँख की भीतरी सतह (आइने के अंदर) में लगाने से बचें — बाहर की पट्टी पर हल्का प्रयोग सुरक्षित विकल्प है।
- एलर्जी और संक्रमण का ध्यान: यदि आँखों में जलन, लालिमा या धुँधला दिखना दिखे तो तुरंत रोक दें और नेत्र-विशेषज्ञ से संपर्क करें।
कैसे अपनाएँ यह परंपरा आज
यदि आप दिवाली की रात काजल लगाना चाहते हैं तो निम्न नज़रिए उपयोगी होंगे:
- परंपरागत अर्थों को समझें: इसे सिर्फ सौंदर्य के बजाय स्वागत और सुरक्षा की प्रतीक के रूप में देखें।
- सुरक्षा प्राथमिकता रखें: योग्य मानक वाला काजल चुनें और स्वच्छता बनाए रखें।
- विचारशीलता रखें: सभी परंपराएँ वैधानिक नहीं होतीं; अपने परिवार, स्वास्थ्य और स्थानीय रीति-रिवाज का संतुलन बनाकर निर्णय लें।
निष्कर्ष
दिवाली पर काजल लगाने की परंपरा बहुपरतिगत है — इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक चिकित्सा के तत्व शामिल हैं। कई समुदायों के लिए यह लक्ष्मी के स्वागत, बुरी नजर से सुरक्षा और शुद्धता का प्रतीक है। फिर भी, आज की स्वास्थ्य-सजग दुनिया में पारंपरिक विश्वासों के साथ वैज्ञानिक सावधियों को मिलाकर चलना बुद्धिमानी है। अंतत: यह व्यक्तिगत और पारिवारिक निर्णय है: यदि आप परंपरा अपनाते हैं तो इसे समझदारी और सुरक्षा के साथ कीजिए, और उन विविध दृष्टियों का सम्मान कीजिए जो इस रीत को अलग-अलग समुदायों में परिभाषित करती हैं।