नवरात्रि की तैयारी में क्यों की जाती है दीप सज्जा?
नवरात्रि में दीप सज्जा एक बहुआयामी अभ्यास है — यह केवल रीतिकथा या सजावट नहीं, बल्कि दर्शन, समाज और मनोविज्ञान का संयोजन है। परंपरागत रूप से दीप (dīpa) का अर्थ है प्रकाश का स्रोत, जो अज्ञानता को दूर कर जागरण और श्रद्धा का संकेत देता है। नवरात्रि के नौ रातों में दिए जाने वाले दीपों का महत्व अलग‑अलग धार्मिक धाराओं और क्षेत्रीय प्रथाओं में अलग ढंग से समझा जाता है: कुछ स्थानों पर यह देवी के नौ रूपों (नवदुर्गा) के प्रति भक्ति का प्रतीक होता है, तो कुछ जगह पर यह घर और मंदिर को पवित्र करने, समय‑चक्र को चिह्नित करने और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ाने का साधन माना जाता है। इस लेख में हम नवरात्रि में दीप सज्जा के ऐतिहासिक, वैचारिक और व्यावहारिक पहलुओं को देखते हैं — साथ ही यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि अलग‑अलग परंपराएँ किन तत्त्वों पर ज़ोर देती हैं और आधुनिक संदर्भ में लोग किस तरह संतुलन बनाते हैं।
प्राचीन और ग्रंथीय संदर्भ — दीप का धार्मिक अर्थ
वेदिक और अपवैदिक साहित्य में प्रकाश का बिंब बार‑बार मिलता है। दैवीय ज्योति को ज्ञान, चेतना और जीवनशक्ति से जोड़ा गया है। आगमन और प्रकाश की प्रक्रिया को पुराणों, आगमों और स्मार्त ग्रन्थों में पूजा‑अर्चना का अनिवार्य अंग माना गया है। उदाहरण के लिए आगम ग्रन्थ विधियों में दिये (घी, तेल) जलाने, अरती चढ़ाने और दीप के द्वारा देवता का स्वागत करने के विस्तृत निर्देश मिलते हैं; तथापि इन निर्देशों की संख्या‑रचना और आकार समुदायों के अनुसार बदलती रहती है।
नवरात्रि और दीप का प्रतीकात्मक अर्थ
नवरात्रि के दौरान दीप के कई प्रतीकात्मक अर्थ उभरते हैं:
- अविद्या से ज्ञान की ओर: दीप का प्रकाश अंधकार, भय और अज्ञानता की समाप्ति का संकेत मानता है — विशेषकर देवी के शक्ति‑रूप को ऊर्जा और ज्ञान देनेवाली के रूप में देखने पर।
- इन्द्रियों का समन्वय और अन्तर्यात्रा: नौ रातें नौ रूपों और नौ अवस्थाओं को चिह्नित करती हैं; हर रात दीप द्वारा उस रात के देवत्व को आमंत्रित और सम्मानित किया जाता है।
- घरेलू और सार्वजनिक पवित्रता: दीप से घर और मंदिर की सीमाएँ पवित्र मानी जाती हैं — प्रकाश नेगेटिव ऊर्जा को दूर करने और शुभता का संचार करने में मदद करता है।
- समय और चक्र की अनुभूति: रात में दीप जलाना समय‑चिह्न भी है — यह आराधना के नियमों के अनुसार संध्यकाली और रात्रीकाली अनुष्ठान को अंकित करता है।
विविध पारंपरिक प्रथाएँ और क्षेत्रीय भिन्नताएँ
हर समुदाय दीप सज्जा के अलग रूप अपनाता है। शाक्त परंपरा में नवरात्रि देवी के नौ रूपों की प्रतिमा के समक्ष दीपक प्रमुख होते हैं; बंगाल में दुर्गापूजा में शाम‑समय दीपप्रदान और विशेष आरतियाँ होती हैं। गुजरात में गरबा और रास के समय शहरों और घरों को रोशनी से सजाया जाता है। शैव और वैष्णव परंपराओं में भी लिंग या विष्णु‑मूर्ति के समक्ष दीपक रखना सामान्य है, पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि पारम्परिक संख्या, प्रकार और सामग्रियाँ स्थानीय आगम/सम्प्रदाय के अनुसार बदलती हैं।
रिवाज़ी और रीतिगत तत्व — कब और कैसे दीप जलाएँ
कई घरों में नवरात्रि की शुरुआत ‘घटस्थापन’ (कलश स्थापना) के साथ होती है; इस समय कलश के समक्ष दीप जलाकर आराधना आरंभ की जाती है। कुछ जगहों पर पूरे नौ रातों तक ‘अखण्ड ज्योत’ जलाई जाती है। दीपों की संख्या पर भी मतभेद हैं — किसी जगह 9, 18 या 108 दीपक अर्पित किए जाते हैं; कोई समुदाय बहु‑मुखी नौवाले बड़े दीपों का प्रयोग करता है। सामान्य प्रथाएँ यह बताती हैं कि दीप शाम के समय संध्या के बाद जलाना चाहिए, आरती के समय प्रकाश विशेष रूप से महत्त्व रखता है।
आधुनिक संदर्भ: सामग्री, सुरक्षा और पर्यावरण
परंपरागत तौर पर घी और सरसों/तिल का तेल उपयोग में रहता आया है; मिट्टी के दीये (दिया) पारंपरिक होते हैं। आज इलेक्ट्रिक दीयों, मोमबत्तियों और सजावटी लाइटों का भी व्यापक उपयोग होता है। सुरक्षित प्रबंधन—दिये किसी ज्वलनशील वस्तु से दूर रखना, नौजवानों और बच्चों की पहुँच से बाहर रखना—आवश्यक है। पर्यावरण‑सचेत लोग कम धुएँ वाले विकल्पों, जैव‑विकसित मोमबत्तियों या सीमित संख्या में दीयों के प्रयोग की सलाह देते हैं ताकि वायु प्रदूषण और ऊर्जा‑खपत नियंत्रित रहे।
आध्यात्मिक अभ्यास और व्यक्तिगत अर्थ
कई भक्तों के लिए दीप जलाना एक सरल परंतु गहरा आत्मिक अभ्यास है: यह एकात्मकता, सतर्कता और निष्ठा का संकेत बनता है। मनोवैज्ञानिक रूप से दीप का अनुष्ठान ध्यान को केंद्रित करता है, रात की लंबी आराधना में जाग्रति बनाये रखता है, और सामुदायिक समारोहों में सामंजस्य और साझा श्रद्धा को पुष्ट करता है। गीता‑वेदान्त आदि में जहाँ प्रकाश को ज्ञान से जोड़ा गया है, वहीं स्थानीय गुरु‑सम्प्रदाय की व्याख्याएँ भी इस क्रिया को आत्मिक उद्दीपन की क्रिया मानती हैं।
संक्षेप में — क्यों महत्वपूर्ण है दीप सज्जा?
नवरात्रि में दीप सज्जा धार्मिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर काम करती है: यह देवी‑भक्ति की अभिव्यक्ति है, स्थान और समय को पवित्र करती है, और समुदाय के लोगों को मिलाकर एक साझा अनुभूति बनाती है। परंपराएँ और क्रियाएँ स्थानीक रूप से भिन्न हो सकती हैं; इसलिए सम्मानपूर्वक यह देखना उपयोगी है कि आपकी पारिवारिक या मंदिर प्रथा किस प्रकार दीप का अर्थ निर्धारित करती है। आधुनिकता में सुरक्षा और पर्यावरण की बातों को जोड़कर, दीप सज्जा को अर्थपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से जारी रखा जा सकता है।