नवरात्रि की तैयारी में घंटी और शंख का महत्व क्यों है?
नवरात्रि के दौरान घंटी और शंख की उपस्थिति लगभग हर घर और मंदिर में देखने को मिलती है। इन दोनों वाद्य‑वस्तुओं का प्राक्टिकल और प्रतीकात्मक अर्थ दोनों ही परतों में गहरा है: एक ओर वे पूजा का क्रम चिन्हित करते और ध्यान को केंद्रित करते हैं, दूसरी ओर उन्हें शुभता, शुद्धि और दिव्य आह्वान के संकेत के रूप में देखा जाता है। इस लेख में हम शास्त्रीय, सांस्कृतिक और साधारण‑जीवन के संदर्भ से घंटी और शंख के महत्व को समझने की कोशिश करेंगे — यह भी बताएंगे कि नवरात्रि जैसी शक्ति‑उत्सवों में इन्हें किस तरह और क्यों उपयोग किया जाता है, किन परंपरागत नियमों का पालन किया जाता है, और आधुनिक ध्वनि‑विज्ञान इस प्रथा को कैसे देखता है। ध्यान रखें कि हिन्दू धार्मिक अनुशासन अनेक मत और प्रथाएँ समेटता है; यहाँ प्रस्तुत विचार कई परंपराओं का सम्मिश्रण हैं और स्थानीय रीति‑रिवाजों में भिन्नता बनी रहती है।
घंटी और शंख: शास्त्रीय संकेत और परंपराएँ
घंटी (घन्टि/घंजी) मंदिर‑आगमों तथा घरेलू पूजा‑पद्धतियों में प्रमुख है। कई आगमग्रंथों और शास्त्रीय निर्देशों में पूजा‑कर्म के आरम्भ‑समाप्ति, देव आवाहन और ध्यान‑संकेतन के लिए घंटी बजाने की सलाह मिलती है। घंटी के तीन या अधिक टन, उसकी लगातार गूँज और क्लैपिंग‑अवधि को ध्यान लगाने और मानसिक अशांति दूर करने वाला माना जाता है।
शंख (शङ्ख) पुराणों और इतिहास में भी अत्यन्त प्रतिमानात्मक है—विष्णु के पंचजन्य, राम‑लक्ष्मण के शंख, युद्धों में शंख की ध्वनि का उल्लेख महाभारत में मिलता है। शंख को समुद्री जंतु‑शरीर का भाग मानकर उसे पवित्रता का चिन्ह भी माना गया है; वैष्णव परंपरा में शंख वैकुण्ठ तथा विजय का संकेत है। हालांकि शंख की उपयोगिता केवल वैष्णव सीमाओं तक सीमित नहीं है—कई शाक्त और स्मार्त परिवारों में भी शंख का प्रयोग होता है।
ध्वनि का आध्यात्मिक अर्थ
हिन्दू आध्यात्मिक परंपरा में ध्वनि (नाद) को ब्रह्म के अभिव्यंजक रूपों में देखा गया है—उपनिषदों और नादबिंदु सिद्धांतों में ‘नादब्रह्म’ की चर्चा मिलती है। इसी विचार से घंटी की तेज, स्पष्ट तरंगें और शंख की गहरी, लंबे समय तक चलने वाली प्रतिध्वनि को शुद्धिकरण और चेतना‑जागरण के साधन के रूप में माना जाता है।
विभिन्न पारंपरिक व्याख्याएँ बताती हैं कि घंटी का खनन внешि‑इन्द्रियों को टोकता है और मन को वर्तमान पल में लाने का संकेत देता है, जबकि शंख की ध्वनि स्थानिक सीमाओं को पार करते हुए व्यापक, कोस्मिक‑शब्द का अनुभव कराती है—दोनों मिलकर पूजा के भीतर ‘आमंत्रण’ और ‘स्थितिकरण’ का कार्य करते हैं।
नवरात्रि में प्रयोग — कब और कैसे?
- प्रातः और संध्या की आराधना: नवरात्रि के दौरान कई घरों और मंदिरों में आरती‑समय घंटी बजती है और आरम्भ/अन्त में शंख फूंका जाता है। यह क्रम पूजा के विभिन्न चरणों (आवाहन, स्तुति, अर्घ्य, प्रदक्षिणा, विसर्जन) को चिन्हित करता है।
- संख्यात्मक प्रथाएँ: कुछ परंपराओं में घंटी के तीन बार बजाने का महत्व है (सृष्टी, स्थिति, संहार की त्रयी का प्रतीक), तो कुछ में पाँच या नौ पंचर्लय‑गणनाएँ पाई जाती हैं—यही विविधता स्थानीय रीति पर निर्भर करती है।
- स्थल‑निर्देश: मंदिर आगमों में घंटी‑स्थापन की दिशा, ऊँचाई, और आकार को लेकर निर्देश मिलते हैं; घरेलू पूजा में सरल, साफ‑सुथरी घंटी और शंख का प्रयोग पर्याप्त माना जाता है।
पारंपरिक नियम और विविधताएँ
धर्मिक नियम हर समुदाय में एक जैसे नहीं होते। कुछ परिवारों में शंख को मस्से से हटाकर स्नान कराना, गाय के दूध या गंगा‑जल से शुद्ध करना आम है। कुछ समुदायों में सिर्फ पुरुष शंख फूँकते हैं, पर कई स्थानों पर महिलाएँ भी शंख और घंटी प्रयोग करती हैं—विशेषकर नवरात्रि जैसी देवी‑उत्सवों में।
आदर्श रूप में दोनों वस्तुएँ साफ़, उचित रूप से रखी और पूजा के बाद विशिष्ट स्थान पर रखी जाती हैं। अगर वास्तविक समुद्री शंख उपलब्ध न हो तो तांबे/पीतल के नक़ल (ब्लोइंग कोंच बोर्ड) या धातु की शंख आकृति का प्रयोग भी सांकेतिक रूप से स्वीकार्य है।
आधुनिक दृष्टि: ध्वनि विज्ञान और मनोविज्ञान
आधुनिक ध्वनि‑विज्ञान बताती है कि घंटी के समृद्ध ओवरटोन और शंख की निम्न आवृत्ति ध्वनि दोनों मनोवैज्ञानिक रूप से ध्यान केंद्रित करने और परिवेश के शोर से अलग करने में सहायक होते हैं। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि पूर्वानुमानित संकेत (जैसे आरम्भ में घंटी बजना) ध्यान और अनुशासन बढ़ाते हैं। यह वैज्ञानिक व्याख्या पारंपरिक व्याख्याओं के साथ विरोध नहीं करती, बल्कि उन्हें अलग आयाम देती है—जहाँ आध्यात्मिक अर्थ और शारीरिक‑संज्ञानात्मक प्रभाव एक साथ चलते हैं।
व्यवहारिक सुझाव नवरात्रि के लिए
- घंटी और शंख के लिए साफ‑सफाई रखें; पूजा से पहले हल्का धुलाई या वस्तु की स्वच्छता कर लें।
- शंख फूंकने की तकनीक: जब तक उपयोग में सहजता न हो, छोटे‑छोटे फुंकें और मुँह का गठन समायोजित रखें—बहुत जोर से फूंकने से सिरदर्द हो सकता है।
- यदि समुद्री शंख उपलब्ध न हो तो तांबे/पीतल के शंख‑नकल या छोटे सीग्नल‑शंख का प्रयोग सुरक्षित विकल्प है।
- स्थानीय नियमों और पारिवारिक परंपराओं का सम्मान करें—अगर किसी स्थल पर विशेष संख्या में घंटियाँ बजानी हों, या शंख फूँकने का समय तय हो, तो वही पालन करें।
- आधुनिक संवेदनशीलता: यदि घर में कोई शोर‑संवेदनशील व्यक्ति या नवजात है तो शंख/घंटी की तीव्रता नियंत्रित रखें; पर्व का अर्थ संतुलन में मनाना भी पूजा का अंग है।
निष्कर्ष
नवरात्रि में घंटी और शंख न केवल धार्मिक उपकरण हैं, बल्कि वे एक सांस्कृतिक‑ध्वनिक भाषा हैं जो पूजा के समय को चिह्नित करती, मन को केन्द्रित करती और सामूहिक अनुभूति को संगठित करती है। शास्त्रीय और लोक‑व्याख्याएँ भिन्न हो सकती हैं, पर सामान्यतः दोनों का उद्देश्य शुभता, शुद्धि और देव‑आह्वान को सुदृढ़ करना ही माना जाता है। स्थानीय रीति‑रिवाजों और आधुनिक सहजता के बीच संतुलन बनाते हुए इन्हें इस्तेमाल करना परंपरा का सम्मान भी है और भक्तिपूर्ण प्रैक्टिस का भाग भी।