नवरात्रि में अष्टमी और नवमी की कथा क्या है?
नवरात्रि के नौ दिन हिन्दू धर्म में देवी के विभिन्न रूपों की आराधना का प्रतीक हैं, और इनमें अष्टमी तथा नवमी के दिन विशेष महत्त्व रखते हैं। इन दोनों तिथियों की कथाएँ केवल एक ही परंपरा तक सीमित नहीं हैं; विविध पौराणिक ग्रंथ, स्थानीय लोककथाएँ और क्षेत्रीय रीति-रिवाज इन दिनों के अर्थ को अलग‑अलग तरीके से व्याख्यायित करते हैं। सामान्य रूप से शारदीय नवरात्रि के दौरान देवी को महिषासुर वध के संघर्ष के रूप में देखा जाता है — नवरात्रि को नौ रातों का युद्ध माना जाता है जिसमें आठवें और नौवें दिन संघर्ष अपने उत्कर्ष व निर्णायक मोड़ पर पहुंचता है। वहीं दक्षिण और पूर्व भारत तथा उत्तर के कुछ भागों में नवमी का संबंध अगले दिन विजयादशमी के साथ जुड़ी तैयारी, आयुध पूजा या राम‑रावण कथा से भी जोड़ा जाता है। नीचे हम ग्रंथीय संदर्भ, लोकश्रुति, तिथिगत तकनीकी बातें और आचार‑विचार के विविध पहलुओं को संभावित व्याख्याओं के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।
तिथि और ज्योतिषीय आधार
- तिथि की परिभाषा: अष्टमी और नवमी क्रमशः चंद्र महीने की आठवीं और नौवीं तिथि हैं। तिथि का गणित सूर्यम्‑चंद्रमा के कोणीय विभाजन पर आधारित होता है; प्रत्येक तिथि लगभग 12° चंद्र‑सूर्य विभव (लागभग 0.8‑1.2 दिन वास्तविक समय में) की दूरी को कवर करने पर बनती है।
- नवरात्रि का संदर्भ: शारदीय नवरात्रि प्रायः अश्विन शुक्ल पक्ष की नवतियों/अष्टमी–नवमी में आती है (सितम्बर‑अक्टूबर)। चैत्र नवरात्रि चैत्र शुक्ल पक्ष में होती है (मार्च‑अप्रैल)।
ग्रंथीय और पुराणिक कथाएँ — एक संक्षिप्त विवेचन
- देवी माहात्म्य/दुर्गा सप्तशती: मार्कण्डेय पुराण के इस भाग में देवी के अनेक रूपों और उसके महाकाव्य संघर्षों का वर्णन है। पारम्परिक व्याख्याओं में नवरात्रि की नौ रात्रियाँ महिषासुर से लेकर अन्य राक्षसों तक की लड़ाइयों का प्रतीक मानी जाती हैं। कुछ पाठों में देवी के विशेष रूपों — काली, चंडी, चामुंडा आदि — का वर्णन अष्टमी‑नवमी के आसन्न युद्धों से जोड़ा जाता है।
- रामायण/रामचरितमानस: लोकप्रिय परंपरा और तुलसीदास की रचनाओं में श्रीराम का दशरथ‑कथा से लेकर रावण‑वध के पूर्व देवी पूजा का संदर्भ मिलता है। कई स्थानों पर कथन है कि राम ने नवमी के दिन देवी की आराधना करके विजय की कामना की, और विजयादशमी के दिन रावण पर विजय पाई।
- स्थानीय कथाएँ: कई क्षेत्रीय मिथक अष्टमी को देवी के किसी विशेष वैरु/राक्षस के संहार से जोड़ते हैं और नवमी को उसके फल/उत्सव या पुढ़ल चरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अष्टमी का धर्म‑कर्म और अर्थ
- अष्टमी को पराक्रमी संघर्ष, घोर तपस्या और देवता‑शक्ति का निर्णायक संघर्ष बताया जाता है। देवि माहात्म्य की कथाओं में कई बार अष्टमी के दिन कंकालवादी रूप तथा रक्तबीज/चण्डमुण्ड ने प्रचण्ड मुकाबला किया।
- रितुअनुष्ठान: अष्टमी को “महा अष्टमी” कहा जाता है जहाँ दुर्गा‑पूजा, हवन, कथा‑पाठ और कन्या‑पूजन का विशेष आयोजन होता है। कई स्थानों पर अष्टमी पर संध्या‑जलूस और दुर्गा के भव्य आराधना होते हैं।
- सांस्कृतिक वैरायटी: कुछ समुदायों में अष्टमी पर जीव‑बलि का प्राचीन संदर्भ मिलता है; समकालीन सुधारवादी व संवेदनशील परंपराओं में उसे प्रतीकात्मक वैकल्पिक प्रस्तुतियों (फल‑भोग, कुक्कुट रूपक आदि) से बदला जा चुका है।
नवमी का धर्म‑कर्म और अर्थ
- नवमी को सामान्यतः युद्ध का अंतिम चरण, वरदान‑प्राप्ति या निर्णायक विजय से जोड़ा जाता है। शारदीय परंपरा में नवमी के बाद दशमी आती है, जिस दिन विजया दशमी मनाई जाती है।
- आयुध पूजा: दक्षिण भारत और कुछ पश्चिमी क्षेत्रों में नवमी/विजया‑दशमी से जोड़कर आयुध पूजा (हथियार, औजारों की पूजा) की परंपरा है — यह कर्म‑उन्नति और विद्या‑आध्यात्मिकता का सम्मिश्रण बताती है।
- लोकनाटक और मंचीय परंपराएँ कई जगह नवमी को राम‑रावण के निर्णायक संवाद, या देवी के आशीर्वाद का दिन मानती हैं।
क्षेत्रीय विविधता और व्याख्यात्मक बहुलता
- बंगाल में अष्टमी‑नवमी दुर्गा पूजा के चरम हैं: अष्टमी पर विशेष रात्रि जागरण और “नवमी” पर पारंपरिक अनुष्ठान होते हैं, परन्तु विजयादशमी में प्रतिमा विसर्जन का महत्त्व है।
- गुजरात में नवरात्रि मुख्यतः गरबा और डांडिया नृत्य के रूप में मनाई जाती है; अष्टमी‑नवमी के दिन भी समुदायिक नृत्य और साधना प्रमुख रहती है।
- दक्षिण भारत में नवमी‑विजया से जुड़ी आयुध पूजा और विद्या‑पूजा की परंपराएँ प्रचलित हैं।
आधुनिक विमर्श: अनुष्ठान, नैतिकता और संवेदनशीलता
- पारंपरिक प्रथाओं में कुछ स्थानों पर जीव‑बलि का उल्लेख मिलता है; समकालीन समाज में यह विवादास्पद रहा है और कई समुदायों ने वैकल्पिक, प्रतीकात्मक या नॉन‑हानीकारी रूप अपनाए हैं।
- नवरात्रि की कथा‑व्याख्याएँ अक्सर नारी‑शक्ति, न्याय की स्थापना और दुष्टता पर विजय की सार्वभौमिक नैतिकताओं को उजागर करती हैं। आधुनिक अध्यापक और धर्म‑समाज इन्हें नारी‑सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के संदर्भ में भी पढ़ते हैं।
निष्कर्ष
अष्टमी और नवमी की कथाएँ एक स्थिर, एकल अर्थ वाली नहीं हैं बल्कि ग्रंथीय कथन, लोकश्रुति और क्षेत्रीय रस्मों के मिश्रण से बनती हैं। देवी माहात्म्य जैसी ग्रंथीय परंपराएँ युद्ध‑कथाओं के माध्यम से अनेक रूपों में इन दिनों का धार्मिक महत्व स्पष्ट करती हैं, जबकि रामकथाएँ और स्थानीय मिथक इन्हें विजय और तैयारी के तौर पर जोड़ते हैं। आज के संदर्भ में इन दोनों दिनों का अभ्यास आराधना, सामुदायिक उत्सव और व्यक्तिगत आध्यात्मिक निरीक्षण—तीनों के संयोजन के रूप में देखा जा सकता है, साथ ही परम्परागत प्रथाओं की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या और संवेदनशील परिवर्तन भी जारी हैं।