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नवरात्रि में घट स्थापना के समय कलश में क्या-क्या रखा जाता है?

नवरात्रि में घट स्थापना के समय कलश में क्या-क्या रखा जाता है?

नवरात्रि की प्रारम्भिक क्रिया—घट स्थापना (कलश स्थापना)—महत्व में केवल रीतिबद्ध कार्य नहीं है, बल्कि यह देवी की उपस्थिति को आह्वान करने का प्रतीकात्मक साधन है। घट/कलश को समुच्चयात्मक रूप में समस्त सृष्टि का सूचक माना गया है: जल जीवन का स्रोत, नारियल आत्मा का प्रतीक और आम के पत्ते जीवन-ऊर्जा के संकेत। विभिन्न समुदायों और ग्रंथों में घट स्थापना की सूक्ष्म-भिन्नताएँ मिलती हैं, किन्तु मूल आशय एक-सा रहता है—शुद्धि, श्रद्धा और देवी-शक्ति का आवाहन। नीचे दिए गए विवरण में सामान्यत: कलश में रखे जाने वाले पदार्थ, उनके प्रतीकात्मक अर्थ, स्थापना की संक्षिप्त विधि, क्षेत्रीय भिन्नताएँ और कुछ व्यवहारिक सावधानियाँ दी गई हैं। मैं मानता/मानती हूँ कि परम्परागत और स्थानीय प्रथाएँ भिन्न होंगी; जहाँ आवश्यक होगा मैंने उन विविधताओं का उल्लेख किया है ताकि पाठक अपने परिवेश के अनुसार समझ सकें।

घट (कलश) में सामान्यतः रखे जाने वाले पदार्थ और उनका अर्थ

  • कलश/घट: तांबे, कांसे, तांबे-पीतल के मिश्रण या स्टील का बर्तन प्रयोग होता है। परम्परागत रूप से ताम्र या कांस्य शुभ माने गए हैं। कलश सृष्टि और स्थिरता का प्रतीक।
  • जल (गंगाजल/पवित्र जल): कलश में पानी भरा जाता है। गंगाजल को शुद्धता और तत्त्व-समाहार माना जाता है; न मिलने पर साफ जल प्रयोग कर सकते हैं। जल जीवन और भाव-प्रवृति का प्रतिनिधित्व करता है।
  • नारियल: कलश के मुख पर रखा जाता है; आत्मा, शुचिता और देवी की उपस्थिति का संकेत। अनेक स्थानों पर नारियल को ऊपर लाल कपड़ा बाँधकर रखते हैं।
  • आम के पत्ते (या अन्य पत्ते): सामान्यतः 5-7 पत्ते कलश के मुख के चारों ओर लगाए जाते हैं। आम के पत्ते जीवन-शक्ति और समृद्धि का सूचक हैं। दक्षिण तथा कुछ स्थानों पर तुलसी/पेड़ के स्थानीय पत्तों का उपयोग भी होता है।
  • अक्षत (अनाजी चावल): चावल को कलश में या नारियल के चारों ओर छिड़का जाता है। अक्षत सुचिता और आशीर्वाद का प्रतीक है।
  • हल्दी और कुमकुम/सिंदूर: मंगल-चिन्हों और देवी-पूजा के लिए उपयोग; शांति और ऊर्जा का संकेत।
  • सुपारी (बेल पिस्ता/सुपारी): कई परम्पराओं में नारियल के ऊपर या कलश के पास रखा जाता है; जनन-शक्ति और समृद्धि का प्रतीक।
  • सिक्के/दाने (रुपया/मोती): कुछ परिवारों में कलश में सूखे सिक्के अथवा धातु के सिक्के रखे जाते हैं—समृद्धि और आर्थिक शुभता के लिए।
  • लाल कपड़ा/वस्त्र: कलश पर लाल या पीला कपड़ा ओढ़ाया जाता है; रंग देवी-ऊर्जा और मंगल का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • फूल और दीप/कपोर: फूल कलश के पास तथा दीप पूजन के समय अराधना के लिए।
  • बीज/जौ/अनाज (विविधता अनुसार): कुछ क्षेत्रीय रीति-रिवाजों में कलश के भीतर अनाज या भीगे जौ रखे जाते हैं ताकि नवरात्रि के अंत में अंकुरित कर जीवन-चक्र दिखाया जा सके।

स्थापना की संक्षिप्त सामान्य विधि (सहज रूप में)

  • घर/मंदिर स्थान शुद्ध करें और पूजा की सतह पर रंग/ग्राम्य थाल रखें।
  • कलश को साफ करके उसके अंदर गंगाजल या साफ पानी भरें।
  • यदि अक्षत/अन्न रखा जाए तो उतना रखें कि पानी बहने न पाए; कुछ परम्पराओं में पानी पहले भरकर फिर अक्षत डाला जाता है।
  • कलश के मुख पर आम के पत्ते रखकर नारियल रखें; नारियल पर लाल कपड़ा बांधकर सुपारी/कड़कूची रखें।
  • कलश की थोरी पर हल्दी-कुमकुम लगाकर, फूल अर्पित कर, छोटे सिक्के या तिलक रखें।
  • उचित तिथि/समय पर (आम तौर पर नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में) मंत्र-उच्चारण या देवी का आवाहन करें।

क्षेत्रीय और वैचारिक विविधताएँ

  • पश्चिम भारत (गुजरात/महाराष्ट्र): घट स्थापना में जौ/अनाज के अंकुर लगाने की प्रथा, कई बार कलश पर लाल वस्त्र और सोने-चांदी के सिक्के रखे जाते हैं।
  • पूर्व भारत (बंगाल): मिट्टी के घट का उपयोग और विशेषतः दुर्गा स्थापना में बंगाली शैली की देवी-अलंकृति; कुछ स्थानों पर पत्तों के अतिरिक्त बांस के सहारे भी रखा जाता है।
  • दक्षिण भारत: आम के पत्ते के स्थान पर तुलसी या पन्ना-पत्र का प्रयोग, नारियल पर लाल वस्त्र और पारंपरिक शुद्धिकरण के नियम।
  • वैदिक/स्मार्त बनाम शाक्त परम्पराएँ: स्मार्त परम्पराएँ अधिक सर्व-देवी-देवता समावेशी पूजा पढ़ती हैं; शाक्त परम्पराएँ विशेष मंत्रों एवं तत्व-विशेष का उपयोग कर सकती हैं।

ध्यान देने योग्य व्यवहारिक और पवित्रता संबंधी बातें

  • कलश स्थापना से पहले स्थान और बर्तन अच्छी तरह स्वच्छ हों—शुद्धता पर बल अंकित है।
  • जैविक और पारंपरिक पदार्थों (कपड़ा, पत्ते, फूल) का प्रयोग पर्यावरण के अनुकूल रहता है; प्लास्टिक से बचें।
  • यदि विशेष मंत्र या विधि आवश्यक हो तो अपने परिवार या पंडित से परामर्श लें; परम्पराएँ स्थानीय रूप से भिन्न हो सकती हैं।
  • नवरात्रि के दौरान कलश का सम्मान रखें—आखिरी दिन उचित संकल्प/विपुलता के साथ विसर्जन या अन्त्य-क्रिया करें, स्थानीक रीति के अनुसार।

संक्षेप में, घट स्थापना का मूल उद्देश्य देवी-शक्ति का संवाहन करना और घर में पवित्र, समृद्ध वातावरण स्थापित करना है। भौतिक सामग्री—जल, नारियल, पत्ते, अक्षत—सभी प्रतीकों के माध्यम से आत्मिक अर्थ व्यक्त करते हैं। जहां एक ओर सामान्य सामग्री और क्रिया का सार लगभग सर्वत्र समान है, वहीं रीति-रिवाजों में क्षेत्रीय तथा वैदिक-शाक्त मतभेदों का सम्मान करना भी आवश्यक है। व्यक्तिगत या पारिवारिक परम्परा ही अंतिम मार्गदर्शक होनी चाहिए; आवश्यकता हो तो स्थानीय गुरु या पुरोहित से परामर्श लें ताकि विधि और मंत्र दोनों आपकी परम्परा के अनुरूप हों।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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