नवरात्रि में चौथे दिन का रंग क्यों है पीला?
नवरात्रि के रंग‑पट्ट में चौथे दिन का पीला रंग अक्सर दिखाई देता है और यह कई लोगों के लिए उत्सव का एक पहचानने योग्य पल बन गया है। पर यह सवाल कि क्यों चौथे दिन पीला पहना जाता है — केवल फैशन या कंटेम्पररी कैलेंडर की आदत है या इसका कोई आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार भी है — समझने योग्य है। इस लेख में हम क्रमिक रूप से देखेंगे: पारंपरिक ग्रंथों और लोकपरंपराओं में नवरात्रि के दिन‑दिन के देवत्वों का संदर्भ, चौथे दिन की देवी से जुड़े प्रतीकत्व (विशेषकर कुशमांडा के साथ जुड़ाव), पीले रंग का वैदिक‑आयुर्वेदिक और खगोलीय अर्थ, मौसमी और भौगोलिक कारण (जैसे सरसों के फूलों का खिलना), और समकालीन सामाजिक व्यवहार — साथ ही यह भी कि विभिन्न क्षेत्रों में यह रीत कितनी मौलिक है। हम अलग‑अलग व्याख्याओं को सम्मानपूर्वक रखेंगे क्योंकि हिंदू परंपरा में त्योहारों की विविधता और स्थानीय रीतियाँ अक्सर एक ही प्रश्न के कई उत्तर देती हैं।
चार दिन और देवी — पारंपरिक संदर्भ
अधिकांश पौराणिक और देवी‑सम्बद्ध परंपराओं में शारदीय नवरात्रि के नौ दिन नवरूपा देवी‑रूपों को समर्पित होते हैं: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुश्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। चौथे दिन को पारंपरिक रूप से कुश्मांडा से जोड़ा जाता है। कुश्मांडा का वर्णन ऊर्जा, सर्जनात्मक शक्ति (प्रणव/सृष्टिकारी हँसी) और सूर्य‑समान प्रकाश करने वाली देवी के रूप में मिलता है। इस प्रकार वैश्विक‑प्रकाश और सृजन के अर्थ कुश्मांडा को पीले रंग से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ना तार्किक माना जा सकता है।
पीला रंग — क्या अर्थ हैं?
- सौर और प्रकाशीय संबन्ध: पीला रंग सूर्य और प्रकाश का प्रतीक है। कुश्मांडा की विस्तारवाणी में उसे ब्रह्मांड में प्रकाश भरने वाली देवी कहा गया है; इसलिए पीला उसकी ऊर्जा और ऊष्मा का प्रतीक बनता है।
- चैत्यिक और वैदिक परिप्रेक्ष्य: वैदिक संस्कारों में पीला/हल्दी‑पीला Auspiciousness (शुभता), ज्ञान और पवित्रता के साथ जुड़ा है। कई संस्कारों में हल्दी का प्रयोग शुभता और रोगनिग्रह के लिए होता है।
- चक्र और तत्व: आयुर्वेद और योग‑परम्परा में मणिपूर चक्र (नाभि‑क्षेत्र) का रंग पीला माना जाता है और यह पाचन, ऊर्जा व सक्रियता से जुड़ा है। कुश्मांडा के सर्जन‑प्रवृत्ति वाले अर्थ मणिपूर की ऊर्जा से संगत माने जा सकते हैं।
- मौसमी‑कृषि कारण: शारदीय नवरात्रि आमतौर पर फसल कटाई और सरसों के पीले फूलों के समय पड़ती है; ग्रामीण दृश्यशैली में पीला मौसम‑रंग बन जाता है, इसलिए स्थानीय लोकाचार ने इस रंग को दिन के लिए अपनाया।
ग्रंथीय बनाम लोकप्रथा — कहाँ से आया रंग‑क्रम?
यह महत्वपूर्ण है कि किसी मानक शास्त्रीय ग्रन्थ में विशेष दिन पर पहनने वाले रंग का अनिवार्य नियम मिलने का प्रमाण सीमित है। कई प्रचलित रंगसूचियाँ आधुनिक लोककलेंडर‑प्रथाओं, सामाजिक‑माध्यमों और स्थानीय परम्पराओं का परिणाम हैं। कुछ समुदायों ने देवीं ऊर्जा के गुणों, ग्रहों (जैसे बृहस्पति/गुरु का पीला), और मौसमी सूचक के मिश्रण से रंग‑सूची बनाई। इसलिए कहा जा सकता है कि पीला चुनना एक संयोजन है: देवी‑गुण (कुश्मांडा की रोशनी), ग्रह‑प्रभाव (गुरु/पीला), और कृषि‑दृश्य (सरसों)।
क्षेत्रीय विविधताएँ
विभिन्न राज्यों में अलग‑अलग रंग क्रम चलते हैं। पश्चिमी भारत, बंगाल, उत्तर भारत और दक्षिण भारत में त्योहार के व्यवहार में रंगों का चयन बदलता रहता है। कुछ स्थानों पर चौथा दिन अन्य रंगों से जुड़ा होता है; कुछ जगहों पर रंग‑पद्धति अपेक्षाकृत नवीन फैशन‑प्रवृत्ति है। इसलिए किसी व्यक्ति के लिए यह लाभकारी होगा कि वे अपनी स्थानीय परंपरा और विवेक दोनों को देखें न कि एक सामान्यीकृत “नियम” को अवश्य मान लें।
रितु, आस्था और व्यवहार — पीला पहनने के साधारण तरीके
- मंदिर या पूजा‑स्थल पर पीले वस्त्र चढ़ाना, पीले फूल (गुलदाउदी/गेंदा) और हल्दी‑आधारित प्रसाद देना।
- पीले रंग के खाद्य पदार्थ — हलवा, बेसन‑लड्डू, मूंग दाल आदि — परंपरागत रूप से परोसे जाते हैं।
- आध्यात्मिक ध्यान: प्रकाश, सृजन और आंतरिक ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करना — कुश्मांडा की विशेषता के अनुरूप।
निष्कर्ष — क्या पीला सिर्फ रंग है या स्मृति‑चिह्न?
चौथे दिन पीला पहनने की प्रथा एकाधिक कारणों का समुच्चय है: देवी‑विशेष (कुश्मांडा) से प्रतीकात्मक मेल, ग्रह और चक्र‑सम्बन्धी संकेत, तथा मौसमी‑कृषि दृश्य। परंतु यह भी स्पष्ट है कि शास्त्रों ने पक्का रंग‑अनुशासन नहीं दिया; यह अधिकतर लोकिक, क्षेत्रीय और समकालीन सांस्कृतिक विकास का भाग है। इसलिए अगर कोई पीला पहनकर उस दिन देवी की सर्जनात्मक ऊर्जा और प्रकाश को स्मरण करता है, तो वह परंपरा का मान्य और सार्थक उपयोग है। और यदि किसी समुदाय में दूसरे रंगों का चलन है, तो वह भी वैध और अर्थवत्त है — हिंदू त्योहारों की लचीली और स्थानीय रूपान्तरशील परंपरा का यही सार है।