नवरात्रि में छठे दिन का रंग क्यों है नारंगी?
नवरात्रि के छठे दिन को कई जगहों पर नारंगी रंग से जोड़ा जाता है। यह सवाल इसलिए रोचक है क्योंकि रंग-प्रथाएँ अक्सर उत्सव की दृश्य पहचान बन जाती हैं — भजन‑कीर्तन, सजावट, परिधान और फूलों की थालों में यही रंग दिखता है। लेकिन क्या यह रंग‑निर्देश प्राचीन ग्रंथों में निर्धारित है, या यह सामाजिक‑सांस्कृतिक विकास का परिणाम है? और अगर नारंगी चुना गया है तो उसकी आध्यात्मिक, प्रतीकात्मक और सामुदायिक वजहें क्या हैं? इस लेख में हम परंपरा, प्रतीकवाद, तांत्रिक और चक्र‑सम्बन्धी व्याख्याएँ तथा क्षेत्रीय विविधताओं को संतुलित और सम्मानपूर्ण तरीके से देखेंगे — साथ ही यह भी बताएँगे कि आधुनिक आध्यात्मिक व्यवहार में इस रंग का क्या स्थान है।
क्या यह प्रथा शास्त्रीय ग्रंथों में निहित है?
देवी की नवरात्रि‑कथाएँ (जैसे कि देवी महात्म्य / चंडीदास्य) नौ रूपों की विवेचना करती हैं, परन्तु पारंपरिक स्मार्त या पुराणिक ग्रंथ एक‑एक दिन के लिए किसी निश्चित वस्त्र‑रंग का नियम नहीं देते। शास्त्रों में देवी के गुण, रूप और युगों के अनुसार पूजा‑विधि या स्तोत्र मिलते हैं, किन्तु दैनिक रंग‑प्रथा का प्रमाण दुर्लभ है। इसलिए यह कहना उपयुक्त रहेगा कि मंदिर‑केंद्रित और वर्णनात्मक शास्त्र नवरात्रि के रंग‑कोड को अनिवार्य नहीं ठहराते।
नारंगी का प्रतीकात्मक अर्थ — पारंपरिक संकेत
नारंगी या केसरिया (saffron) का अर्थ हिन्दू संस्कृति में कई स्तरों पर तय हुआ है:
- अग्नि तथा तेज़‑उर्जा: नारंगी अग्नि, तेज और परिवर्तन का रंग माना जाता है; यह शुद्धिकरण और रूपांतरण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
- त्याग और साधना: सन्यासी‑वेश (केसरिया कपड़ा) त्याग और समर्पण का संकेत देता है; इसलिए आध्यात्मिक संकल्प से भी जुड़ा है।
- वीरता और सक्रियता: नारंगी में साहस और सामर्थ्य का भाव है — युद्ध, रक्षा और साहसी कार्रवाई के लिए उपयुक्त रंग।
- फसल और लोक‑रंग: शरद ऋतु में खड़ी फसलें और गेरुआ‑सूरजमुखी/गेंदे के फूलें दृश्यात्मक रूप से नारंगी‑पीली होती हैं; त्योहार की सजावट में इन्हीं का प्रयोग होता है।
छठे दिन (कात्यायनी/शष्ठी) और नारंगी का तात्पर्य
उत्तरी भारतीय पारंपरिक अनुक्रम में नवरात्रि की छठी देवी कात्यायनी मानी जाती हैं — एक युद्धरूप, साहसी देवी जो प्रायः महिषासुर तथा अन्य दुष्ट बलों से लड़ीं। इस कठोर और सक्रिय स्वरूप से नारंगी का सामंजस्य स्पष्ट होता है: युद्ध‑शक्ति और तेज का रंग।
तांत्रिक और चक्र‑आधारित व्याख्याएँ
तांत्रिक परंपराओं और योग‑चक्र सिद्धांतों में रंगों का प्रयोग मनोऊर्जा (psychospiritual energy) के अभिव्यक्ति‑माध्यम के रूप में होता है। विशेषकर:
- मणिपूर चक्र (solar plexus): इसे पीला‑नारंगी श्रेणी से जोड़ा जाता है और यह शक्ति, इच्छा शक्ति, आत्म‑विश्वास और रूपांतरण से सम्बन्धित है — कात्यायनी के सक्रिय स्वरूप से मेल खाता है।
- तांत्रिक साधना में अग्नि तत्व: जप, हवन, तेज कार्य और परिवर्तन के लिए नारंगी/केसरिया का उपयोग उपयुक्त समझा जाता है।
क्षेत्रीय और लोकपरम्परागत विविधता
रंग‑दिनों की आधुनिक सूची (जिसमें हर दिन के लिए एक विशिष्ट रंग दिया जाता है) ज़्यादातर बीसवीं सदी से लोकप्रिय हुई और विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और शहरी‑केंद्रित मीडिया‑संस्कृति में फैली। पश्चिमी भारत में कपड़ों और सामूहिक पहरावे के चलते इन रंग‑सूचनाओं को प्रचार‑माध्यम ने स्थायीत्व दिया। पर कई क्षेत्रों—बंगाल, कर्नाटक, तमिल‑नाडु, पूर्वोत्तर—में ऐसी रंग‑रहीत या अलग रंग‑राखी परंपराएँ रहती हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि नवरात्रि‑रंगों को सार्वत्रिक शास्त्रीय नियम न मानकर क्षेत्रीय और सामुदायिक रीति के रूप में देखा जाए।
आधुनिक कारण: दृश्यता, सामूहिकता और मार्केटिंग
समकालीन प्रयोग में रंग‑सूचियाँ सामाजिक जुड़ाव का साधन बन चुकी हैं: हर दिन एक रंग पहनने से उत्सव की एकरूपता बढ़ती है, समूह‑फोटो और समुच्चय पूजा में आकर्षक दृश्य बनते हैं। फैशन और रिटेल ने भी इस पर ध्यान दिया — इसलिए कुछ रंग‑प्रथाएँ तेजी से लोकप्रिय हुईं। यह ध्यान रखने योग्य है कि इसका आध्यात्मिक प्रभाव भक्त की निष्ठा पर निर्भर करता है, न कि केवल रंग पर।
उपसंहार — व्यावहारिक सुझाव और सम्मानजनक दृष्टिकोण
नारंगी की छठे‑दिन सम्बद्धता कई कारणों का संगम है: देवी के वीर रूप की प्राचीन व्याख्या, अग्नि‑तत्त्व और मणिपूर चक्र से मेल, शरद‑ऋतु के लोक‑तत्व (गेंदे, केसर), तथा आधुनिक सामुदायिक व्यवहार और दृश्य‑संस्कृति। पर यह ध्यान देने योग्य है कि शास्त्रों में कोई अनिवार्य रंग‑नियम नहीं मिलता। इसलिए सबसे संतुलित और सम्मानजनक दृष्टि यही है कि रंग को एक सहायक‑प्रतीक के रूप में अपनाया जाए — पूजा की निष्ठा, भक्ति और आचरण कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि आप उत्सव में हिस्सा ले रहे हैं तो नारंगी पहनना या केसरिया वस्त्र चढ़ाना एक अर्थपूर्ण विकल्प हो सकता है; साथ ही स्थानीय परंपरा और समुदाय की मान्यताओं का सम्मान रखना भी आवश्यक है।