Hindi Blogs, Navaratri

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ कब करें?

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ कब करें?

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ कब करें?

नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती (देवीमाहात्म्य) का पाठ करने का मूल प्रश्न दो तरह से पूछा जाता है: किस तिथि/मुहूर्त पर शुरू करें और पाठ का कितना और किस रूप में पाठ करें। पारंपरिक स्रोतों में देवीमाहात्म्य को मार्कण्डेय पुराण का अंश माना जाता है (प्रायः अध्याय 81–93 के रूप में उद्धृत), इसमें कुल लगभग 700 श्लोक हैं और पाठ का अर्थ मात्र उच्चारण नहीं बल्कि अर्थ और भावना से जुड़ी साधना भी माना जाता है। परम्पराएँ क्षेत्रीय और संवैधानिक रूप से भिन्न पाई जाती हैं: कुछ स्थानों पर महालया (बंगाल सहित) को महत्त्व दे कर बड़ी पाठ-परम्परा रहती है, तो कई परिवार नवरात्रि के प्रतिदिन छोटे-छोटे अध्याय पढ़ते हैं या अष्टमी/नवमी को पूर्ण पाठ करते हैं। नीचे व्यवहारिक, पारंपरिक और वैकल्पिक मार्ग सुझाये जा रहे हैं, ताकि पाठ समझदारी और संदर्भ के साथ—अपने स्वास्थ्य, समय और परंपरा के अनुरूप—किया जा सके।

तिथि और अवसर

  • नवरात्रि के दिन: पारंपरिक रूप से शारदीय नवरात्रि शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से नवमी तक चलती है; अगर आप नवरात्रि के दौरान पाठ करना चाह रहे हैं, तो प्रतिपदा से नवमी के बीच किसी भी दिन नामकरण और संकल्प के साथ शुरू कर सकते हैं।
  • महालया/प्रारम्भ: कुछ ब्राह्मणिक और बंगाली परंपराओं में महालया (पितृ पक्ष के अंत के समय) को देवी आगमन की सूचकता माना जाता है और तब भी पाठ शुरू किया जाता है। यह परंपरागत विकल्प है, पर नवरात्रि के दिनों में करना सामान्यत: अधिक व्यापक अभ्यास है।
  • विशेष दिन — अष्टमी/नवमी: अष्टमी और नवमी को शक्ति-सम्बन्धी सबसे प्रभावी दिनों में गिना जाता है; कई लोग इन दिनों पर संपूर्ण सप्तशती का एकसाथ पाठ या विशेष भाग (युद्धखंड) का पाठ करते हैं।

दिन का कौन-सा समय (मुहूर्त) उपयुक्त है?

  • ब्रह्म मुहूर्त: पारम्परिक रूप से सबसे शुभ माना जाता है—सूर्योदय से लगभग डेढ़ से ढाई घंटे पहले। यह मन-एकाग्रता के लिये अनुकूल समय है।
  • प्रातः स्नान के बाद: सुबह स्नान, पूजा और संकल्प के बाद पाठ करने को भी उचित माना जाता है; अगर ब्रह्म मुहूर्त सम्भव न हो तो यह दूसरा उत्तम विकल्प है।
  • संध्या/शाम: कई घरों में संध्या के समय (सायंकालीन आरती के साथ) पाठ किया जाता है—यदि दिन में समय न मिल सके तो यह व्यवहारिक और स्वीकृत विकल्प है।
  • तिथि-समायोजन: यदि आप किसी विशेष तिथिकर्य (जैसे प्रतिपदा के उद्देश्‍य से) कर रहे हैं, तो यह ध्यान रखें कि पाठ उसी तिथि के भीतर हो—कैलेंडर या पंचांग से मुहूर्त-पुष्टि कीजिये।

पाठ करने के पारंपरिक और व्यावहारिक तरीके

  • पूर्ण पाठ (एक‑सत्र या दो सत्र): 700 श्लोकों का एक पूर्ण पाठ सामान्यतः 3–4 घंटे लेता है (धीमी व मध्यम गति पर)। यह शक्ति-निरूपण और संकल्प के साथ किया जाता है—हवन या विशेष आराधना के साथ भी हो सकता है।
  • नौ दिन विभाजन: जिनके पास प्रतिदिन समय है वे 13 अध्यायों को नौ दिन में बाँटकर पढ़ते हैं—यहां पारम्परिक विभाजन में प्रत्येेक दिन 1–2 अध्याय आते हैं ताकि अंतिम दिनों में प्रमुख युद्ध भाग संजोया जा सके। नीचे एक सुझाया हुआ विभाजन दिया जा रहा है (वैकल्पिक):
  • दिन 1: अध्याय 1–2
  • दिन 2: अध्याय 3–4
  • दिन 3: अध्याय 5–6
  • दिन 4: अध्याय 7
  • दिन 5: अध्याय 8
  • दिन 6: अध्याय 9
  • दिन 7: अध्याय 10
  • दिन 8: अध्याय 11–12
  • दिन 9: अध्याय 13 (समापन) और आरती/संक्षिप्त हवन

यह केवल एक प्रस्तावित योजना है—कई परम्पराएं अध्यायों का अन्यान्य विभाजन करती हैं; स्थानीय पंडित या गुरु से परामर्श उपयुक्त होगा।

आरम्भ करने की विधि और संकल्प

  • पाठ से पहले गौरी-गणेश और अपने गुरु को प्रणाम करना सामान्य परम्परा है।
  • संकल्प: संक्षिप्त शब्दों में अपना नाम, कुल, उद्देश्य (उदा. आरोग्य, आत्म-सशक्ति, परिवार की शांति) और पाठ की संख्या कहकर संकल्प लें।
  • यदि हो सके तो थाली में दीप, पुष्प, जल और थोड़ी भोग सामग्री रखें; पाठ के बाद आरती या संक्षिप्त मंत्र-पूजन कर सकते हैं।

व्यवहारिक सुझाव और सावधानियाँ

  • स्वास्थ्य का ध्यान रखें: पूर्ण पाठ करने से पहले अपनी क्षमता देखें—बुज़ुर्गों या बीमार लोगों के लिये छोटे-छोटे हिस्सों का पाठ या ऑडियो सुनकर संलग्न होना अधिक सुरक्षित है।
  • उच्चारण का महत्व है—यदि संस्कृत ठीक न आता हो तो अर्थ सहित पढ़ना, अनुवाद सुनना या प्रमाणित पाठ-अभिनेता का ऑडियो साथ रखना लाभदायक है।
  • यदि आप वैदिक काव्य/सूर-आधारित पठान का पालन कर रहे हैं तो स्थानीय परंपरा के अनुसार ही करें; वैकल्पिक रूप से सरल पाठ और अर्थ-स्मरण ज्यादा उपादेय होता है।
  • धार्मिक विविधताओं का सम्मान रखें: शाक्त परंपरा में होम/हवन सामान्य है, स्मार्त और वैष्णव परिवारों में संकल्प-मूलक पाठ और दान अधिक प्रचलित हो सकता है—कोई भी उपाय अपनाते समय स्थिति के अनुरूप गुरु/पंडित से परामर्श लें।

निष्कर्ष

सार यह है कि नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का सबसे अच्छा समय वह है जब आप स्थिर मन, शुद्धता और संकल्प के साथ बैठ सकें—परंपराविहीन रूप से ब्रह्म मुहूर्त या सायंकालीन संध्या उपयुक्त मानी जाती है। पाठ का स्वरूप (पूर्ण एकत्रित पाठ, नौ-दिवसीय विभाजन, या चयनित अध्याय) आपकी परंपरा, शारीरिक क्षमता और धार्मिक उद्देश्य पर निर्भर करता है। यदि आप सुनिश्चित होना चाहते हैं तो अपने स्थानीय गुरु, मंदिर के पुरोहित या परम्परागत ज्ञाता से तिथि‑मुहूर्त की पुष्टि कर लें; साथ ही पाठ का अर्थ समझना और संयमित साधना बनाये रखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि मात्र उच्चारण।

author-avatar

About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *