नवरात्रि में माता के गीत और भजन का महत्व
नवरात्रि केवल नौ दिनों का त्योहार नहीं, बल्कि एक सजीव सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव है जिसमें माता के गीत और भजन केंद्र में होते हैं। इन गीतों का इतिहास पुराणों, स्थानीय परंपराओं और सामूहिक स्मृति के मिलन से बना है। भजन-कीर्तन, स्तोत्रों का पाठ और लोकनृत्य जैसे गरबा/डांडिया, सभी मिलकर देवी की कथाएँ, गुण और शक्ति को सरल भाषा में अगली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं। संगीत केवल मनोरंजन नहीं; वह पूजा की लय है, व्रत के समय का चिन्ह है और समुदाय की भावना को मजबूत करने का साधन भी है। अलग-अलग क्षेत्र—बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, तमिलनाडु—में गीतों के स्वरूप अलग हैं, पर उद्देश्य मिलते हैं: देवी में श्रद्धा जगाना, नैतिक-पौराणिक शिक्षाओं को याद रखना और सामूहिक उत्साह के माध्यम से मनोविज्ञान को केंद्रित करना। इस लेख में हम नवरात्रि के गीतों और भजनों के धार्मिक, सामाजिक और रीतिजन्य महत्व को धर्मशास्त्रीय और स्थानीय परंपरागत दृष्टियों से समझने की कोशिश करेंगे।
नौ रातों का संगीत: पारंपरिक और लोक स्वरूप
नवरात्रि में गाए जाने वाले गीत broadly दो धाराओं में आते हैं: संस्कृत स्तोत्र और स्थानीय/लोक भजन। संस्कृत स्तोत्रों में देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण के अध्याय) से उद्धरण, महा सुदर्शन जैसे श्लोक और आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कुछ स्तोत्र शामिल होते हैं। लोक स्तर पर हर क्षेत्र की अपनी भाषा, लय और राग होते हैं—उदाहरण के लिए गुजरात में गरबा और डांडिया, पश्चिम बंगाल में दुर्गा भजन और बंगाली আরতি, महाराष्ट्र में आभूषण-सी सादगी वाले भजन।
संगीत के रूप:
- स्तोत्र और पाठ: देवी मंत्र, चण्डी पाठ और क്നजिका पाठ।
- भजन–कीर्तन: सरल हिंदी/प्रांतीय भजन, रिपीटेड कोरस से सामूहिक गायन।
- लोक नृत्य गीत: गरबा, डांडिया, गूमर आदि जो सामुदायिक उत्सव बनाते हैं।
- आरती और भेजने के गीत: दिन के आरम्भ और समापन पर गाये जाते हैं।
धार्मिक और वैचारिक महत्व
भजन और गीत देवी-संबंधी कथाओं को स्मरण में रखते हैं। देवी महात्म्य जैसी ग्रंथावलियों में देवी के विभिन्न रूपों—चण्डिका, भगवती, दुर्गा—की कथाएँ मिलती हैं, जिन्हें नवरात्रि के दौरान गाने या सुनने से भक्तों का धर्मबोध प्रबल होता है। कई शास्त्रीय और भक्ति-साहित्यकारों ने देवी गान को मोक्ष या शक्ति-प्राप्ति का माध्यम बताया है। परन्तु यह भी ध्यान देने योग्य है कि शास्त्रीय और तान्त्रिक प्रथाएँ अलग रीतियों को महत्व देती हैं: कुछ तन्त्रपंथी परंपराओं में जप-समयी और मंत्र-न्यासा को गीतों से अलग प्राथमिकता दी जाती है।
रितुदर्शी, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भूमिकाएँ
नवरात्रि वर्ष के दो मुख्य मौसमी चक्रों—चैत्र और शरद—में आती है। संगीत इन चक्रों को चिह्नित कर देता है और सामूहिक व्रत/उत्सव का समय-चिन्ह बन जाता है। सामाजिक दृष्टि से गीत समुदाय को जोड़ते हैं: लोकगीतों में स्थानीय देवी-चरित्र, परोपकार की बातें और नैतिक कथ्य संकलित रहते हैं, जो पीढ़ियों तक जा पहुँचते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से गीत भक्ति-भाव (भावा) को सक्रिय करते हैं; दोहराव, ताल और सामूहिक गायन से एक प्रकार का सामूहिक उछाह पैदा होता है जो व्यक्तिगत चिंताओं को पीछे रखकर आध्यात्मिक एकाग्रता देता है।
आदर्श प्रथाएँ: घर, मंदिर और सार्वजनिक कार्यक्रम
नवरात्रि के प्रथागत आयोजन क्षेत्र और सम्प्रदाय पर निर्भर करते हैं। घर पर पारंपरिक रूप से प्रतिदिन देवी के उस स्वरूप के अनुसार स्तुति या भजन किया जाता है—पहला दिन शैलपुत्री, दूसरा ब्रहмачरीनी इत्यादि। कुछ सामुदायिक मंडलों में शाम को कीर्तन और आरती का कार्यक्रम रहता है; संगीत में अक्सर हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा और घन्टलियाँ प्रयुक्त होती हैं।
- दैनिक व्यवस्था: सुबह/शाम पाठ, आरती और भजन; भोजन और प्रसाद का आयोजन।
- भाषा का चयन: संस्कृत पाठ रीतिभाव बनाए रखता है; स्थानीय भाषाओं के भजन पहुँच और सहभागिता बढ़ाते हैं।
- समावेशन: समारोहों में महिला-पुरुष दोनों की भागीदारी पर जोर देना सामाजिक स्वास्थ्य के लिए सहायक होता है।
विविधधार्मिक और क्षेत्रीय दृष्टियाँ
नवरात्रि की प्रथाएँ एकरूप नहीं हैं। शाक्त परंपराएँ देवी की सक्रिय शक्ति पर ज़ोर देती हैं और उनके मंत्र-स्तोत्रों का विशेष महत्व मानती हैं। वैष्णव और शैव समाज में भी देवी पूजा का अपना स्थान और व्याख्या रहती है—कुछ में देवी को विष्णु या शिव की शक्ति के रूप में देखा जाता है। तान्त्रिक पाठकों के लिए मौन साधना और मंत्र-निष्ठा गीतों से अधिक प्राथमिक हो सकती है। प्रवासी समुदायों में गीतों ने नए रूप लिये हैं: भारतीय डायस्पोरा में गरबा को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ा गया है, पर कथा और अनुष्ठान-विषयक सूचनाएँ बनी रहती हैं।
निष्कर्ष
नवरात्रि के गीत और भजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं; वे एक जीवंत परंपरा हैं जो धर्मशास्त्रीय ग्रंथों, स्थानीय स्मृतियों और सामुदायिक अनुभवों को जोड़ती है। संगीत से आ रही लय और शब्द भक्तों को देवी के प्रति स्मरण, नैतिक शिक्षा और सामूहिक पहचान का अनुभव कराते हैं। साथ ही, क्षेत्रीय विविधता और सम्प्रदायिक व्याख्याएँ इस परंपरा को समृद्ध बनाती हैं—यह याद रखना जरूरी है कि भक्ति की आवाज़ें अलग-अलग स्वर में गूँज सकती हैं, पर उद्देश्य अक्सर एक ही रहता है: शक्ति के प्रति श्रद्धा, सामुदायिक सहवास और आत्म-परिवर्तन।