नवरात्रि में सातवें दिन का रंग क्यों है नीला?
नवरात्रि के दिन-प्रतिदिन के रंग आजकल व्यापक लोकप्रचलन में हैं: समाजिक‑मीडिया पोस्ट, परिवारों के ड्रेस‑कोऑर्डिनेशन और मंदिरों की सजावट में हर दिन के लिए एक रंग सुझाया जाता है। सातवें दिन के लिए जो रंग अक्सर सुझाया जाता है वह है नीला — या अंग्रेज़ी में रॉयल ब्लू/इंडिगो टोन। यह प्रथा इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि बहुत से लोग सोचते हैं कि यह रंग शास्त्रीय या पौराणिक नियमों पर आधारित है। सच्चाई थोड़ी जटिल और बहुपरतित है: कुछ पुराणिक और शाक्त विवरणों में देवी के भीतरी अर्थों की वजह से नीलता का तार्किक स्थान है, वहीं बहुत कुछ आधुनिक सांस्कृतिक प्रतीकवाद, रंगों का इतिहास और क्षेत्रीय परम्पराओं से आया है। नीचे हम धार्मिक-आधार, प्रतीकात्मक अर्थ, ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक कारण और स्थानीय विविधताओं को संतुलित और तथ्यपरक तरीके से समझाने का प्रयास करेंगे।
पौराणिक और शास्त्रीय संकेत
शक्ति‑परम्परा (शाक्त) की ग्रन्थावली—जैसे देवी महात्म्य और कुछ पुराण—देवी के तमाम रूपों का वर्णन करती हैं। इन लेखों में तात्कालिक रूप से खड़ी हुई और रौद्र स्वरूप वाली देवियाँ अक्सर “रात्रि”, “अंधकार” या “काल” जैसी शब्दावलियों से जुड़ी बतायी गयी हैं। उदाहरण के लिए काली/कालरात्रि जैसे रूपों का वर्णन अंधकार या रात के समान त्वचा‑रंजित रूप में मिलता है: यह अंधकार शत्रुओं, अहंकार और जड़ता का विनाश करने वाला प्रतीक है। इस अर्थ में नील/काला रंग देवी की विनाश‑शक्ति और संरक्षणात्मक ऊर्जा का संकेत दे सकता है।
दूसरी ओर, हिंदू धार्मिक प्रतीकशास्त्र में नीलता का सम्बन्ध ब्रह्माण्डीय गर्भ, अनन्तता और दिव्यता से भी जोड़ा गया है। विष्णु‑रूप (कृष्ण/नारायण) और शिव के कुछ रूप (जैसे नीलकण्ठ) की नीलिमा को लोकमान्य धार्मिक कल्पनाओं में व्यापक स्थान मिला है। इसलिए नील रंग को एक ही समय में ‘विनाशक शक्ति’ और ‘ब्रह्माण्डीय विस्तार/शांति’ दोनों के संकेतक के रूप में पढ़ा जा सकता है—और यह भावना नवरात्रि के सातवें दिन के प्रतीकात्मक अर्थ से मेल खा सकती है।
प्रतीकात्मक अर्थ: क्यों नीला समझा जाता है
- रात्रि/कला‑विषयक अर्थ: ‘सातवाँ दिन’ जब देवी का रौद्र पक्ष प्रबल माना जाता है (उदा. कालरात्रि), तब नील/काले‑नीले रंग को अंधकार के विनाश और भयहरण के रूप में समझा जाता है।
- ब्रह्माण्डीयता और शीलता: नीला विस्तार, शांति और अनन्तता का संकेत भी है—यह बताता है कि उग्र शक्ति का लक्ष्य केवल विनाश नहीं, बल्कि नवीनीकरण और संतुलन है।
- रक्षा और संजीवनी ऊर्जा: लोकमान्य व्याख्याओं में नीला एक सुरक्षात्मक रंग भी माना जाता है; यह बुरी शक्तियों, नकारात्मकता को दूर करने का प्रतीक बनता है।
- ज्योतिष एवं ग्रह‑सम्बन्ध: कुछ लोकपारम्परिक व्याख्याओं में नील को शनिदेव (शनि) अथवा कुछ विशिष्ट ग्रह प्रभावों से जोड़ा जाता है; यह जोड़ सार्वभौमिक शास्त्रीय मान्यता जितना दृढ़ नहीं है, परन्तु स्थानीय आस्थाओं में दिखाई देता है।
ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक कारण
रंगों का व्यवहार केवल धार्मिक नहीं होता—उसका इतिहास, उपलब्धता और सामजिक अर्थ भी मायने रखते हैं। भारत में इंडिगो (नीर/नील) के रंग का कृषि‑वाणिज्यिक और हस्तकला का लंबा इतिहास है: सूती वस्त्रों पर नीले रंग के पिगमेंट का व्यापक प्रयोग रहा। इसलिए सामाजिक रूप से नीला पहनना आसान और परंपरागत भी रहा है।
एक और महत्वपूर्ण बिंदु: ‘रंग‑दिन’ की प्रथा अपेक्षाकृत आधुनिक लोकप्रियता प्राप्त कर रही है। विशेषकर शहरी‑समुदायों में फैशन, मिडिया और सामूहिक आयोजन‑रुचि से यह रिवाज़ तेज़ी से फैल रहा है। पारंपरिक मठों/मंदिरों में नवरात्रि के लिए स्पष्ट शास्त्रीय निर्देश कम ही मिलते हैं; इसलिए समकालीन परम्परा‑निर्माण का बड़ा हाथ है।
क्षेत्रीय विविधताएँ और धार्मिक सहमतियाँ
भारत के विभिन्न हिस्सों में नवरात्रि के रंगों का चलन अलग है। बंगाल में दुर्गा‑पूजा की व्यवस्थाएँ रंग‑दिन पर टिकी नहीं रहती; गुजरात‑महाराष्ट्र जैसे स्थानों पर नौरात्रि के प्रत्येक दिन के लिए रंग तय करना अधिक आम है। यह भी देखें कि कई पुरातन ग्रन्थों में दिव्य‑पूजा के रंगों पर स्पष्ट अनुदेश नहीं होता—यहाँ पर स्थानीय साधु, परिवार या मठ की परंपरा निर्णायक होती है।
निष्कर्ष: नवरात्रि के सातवें दिन का रंग ‘नीला’ होने की प्रथा एक मिश्रित कारण‑समूह से आती है: शाक्त प्रतीकात्मकता (काली/कालरात्रि और अंधकार व विनाश), ब्रह्माण्डीय नीलिमा (विवेक और अनन्तता), ऐतिहासिक सामग्री‑उपलब्धता (इंडिगो) और आधुनिक सांस्कृतिक निर्माण (ड्रेस‑कोऑर्डिनेशन) — सभी का योग। शास्त्रों में यह एक अनिवार्य नियम नहीं है; बल्कि यह एक जीवंत, संवेदनशील और क्षेत्रानुसार बदलने वाली परम्परा है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति सातवें दिन नीला पहनता है तो वह देवी की उस ऊर्जा से सामंजस्य बनाने का एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संकेत है—not a mandatory prescription but a devotional choice rooted in layered meanings.
ध्यान: अलग‑अलگ साधना‑समुहों और ग्रन्थों में व्याख्याएँ भिन्न हो सकती हैं; किसी विशेष मठ या गुरु की परम्परा का आदर करना उपयुक्त होता है।