नवरात्रि से पहले घट स्थापना की तैयारी कैसे करें?
नवरात्रि से पहले घट (कलश) स्थापना का निर्णय आध्यात्मिक रूप से एक तैयार होने की अभिव्यक्ति है — न केवल सामग्री इकट्ठा करना बल्कि मनोभाव, समय-निर्धारण और पवित्रता का ध्यान रखना। परम्पराओं में भिन्नता होने के बावजूद सामान्य नीतियाँ स्थिरता, शुद्धता और संकल्प पर टिकती हैं। इस लेख में मैं व्यावहारिक, क्रमबद्ध और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील तरीके से बताऊँगा कि घट स्थापना की तैयारी कैसे करें: कब करें (तिथियाँ व मुहूर्त), किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी, घर की सफाई और मंडप की व्यवस्था, संकल्प-प्रक्रिया और प्रत्येक दिन की साधना के लिए सरल अनुशासन। जहाँ प्रथाएँ अलग होंगी (उदाहरण के लिए Śākta बनाम Smārta या Vaiṣṇava परिवारों में), वहाँ वैकल्पिक उपाय, सांकेतिक अर्थ और आधुनिक, शहरी परिवेश के लिए व्यवहारिक विकल्प दिए गए हैं ताकि पाठक अपने विश्वास और परिस्थिति के अनुरूप निर्णय ले सकें।
घट स्थापना का धार्मिक-सांकेतिक अर्थ
घट या कलश को साधरणत: ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म प्रतीक माना जाता है — पानी जीवन का प्रतिनिधि, नारियल आत्मा/शिरस्, आम के पत्ते इन्द्रियों का प्रतीक और कलश शरीर। Śākta परम्परा में कलश देवी का सिंहासन माना जाता है; Smārta और Vaiṣṇava परिवारों में यह समर्पण और पूजा का केन्द्र होता है। यह समझना उपयोगी है कि घट स्थापना का उद्देश्य देवी-आराधना के लिए एक केंद्र तैयार करना है, न कि सिर्फ एक रस्म का पालन।
कब और किस तिथि को करें (तिथियाँ व मुहूर्त)
- आम रूप से घट स्थापना नवरात्रि के प्रथम दिन (श्राद्धात्मक: प्रतिपदा तिथि) पर की जाती है—Sharad (अश्विन) नवरात्रि में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा।
- यदि प्रतिपदा का समय अनिष्टकाल में आ रहा हो या पञ्चांग के अनुसार दोष हो, तो कुछ परिवार महालया या नवरात्रि के पूर्व संध्या पर घट स्थापित करते हैं।
- अच्छे मुहूर्त: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह जल्दी), प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) या प्रातः काल के बाद का शुभ समय।
- राहु काल, अशुभ नक्षत्र या अनिष्ट योग के समय से बचें—स्थानीय पंचांग देखें या पंडित से सलाह लें।
आवश्यक सामग्री (साफ-सूची रूप में)
- एक कलश/घट (कांसे/तांबे/मिट्टी/स्टील/कांच — परम्परा व बजट अनुसार)
- पवित्र जल (संभव हो तो गंगा का); नहीं तो स्वच्छ नल का पानी
- नारियल (ऊपर छिलका हटाकर थोड़ा सिर दिखता हुआ), उस पर लाल कपड़ा और सिंदूर/केसर
- आम के पत्ते (5 या 7 पत्ते—परिवार परम्परा के अनुसार)
- हल्दी, चावल (कुठला या कच्चा), कुमकुम, सिंदूर, रोली
- दूर्वा या तुलसी के पत्ते (जहाँ अनुशासन हो)
- दीपक, अगरू-बत्ती और नैवैद्य (फल/सादा प्रसाद)
- छोटा चौक/लकड़ी का आधार या लाल कपड़ा कलश रखने हेतु
- मोलि/कपडा बन्धन के लिए धागा, सिक्के/छोटे वस्तु (आशीर्वाद के लिए)
स्थापना से पहले की तैयारी
- घर की सफाई: पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करें, दीवारों और फर्श को झाड़-पोंछ करें।
- वस्तुओं का शुद्धिकरण: कलश व अन्य सामग्री को स्वच्छ पानी से धोकर रखें; जहाँ संभव हो धूप और कपूर से संक्षेप में शुद्ध करें।
- व्यक्तिगत शुद्धि: स्नान करें, साफ कपड़े पहनें और भोज्य सामग्री बनाते समय हाथ साफ रखें।
- मंडल/चौकी लगाना: कलश के नीचे लाल कपड़ा या छोटी चौकी रखें; स्वास्तिक या ओम का चिह्न चावल/कुंकुम से बना सकते हैं।
घट स्थापना का क्रम — चरणबद्ध
- 1) संकल्प: शांत मन से बैठकर संकल्प लें। उदाहरणार्थ — “मैं (नाम) देवी (विशेष नाम) की स्थापना इसी स्थान पर आज (तिथि) कर रहा/रही हूँ। मैं नवरात्रि के लिए शुद्ध मन से उपवास/आराधना करूँगा/करूँगी।”
- 2) कलश भरना: कलश को तीन-चौथाई तक पानी से भरें (अधिक नहीं), उसमें हल्दी का छोटा गोला या थोड़ा चावल डालें।
- 3) पत्ते और नारियल: कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और ऊपर नारियल रखें; नारियल पर लाल कपड़ा और लावा/सिंदूर लगायें।
- 4) आवरण और बन्धन: कलश के गले पर मोलि बाँधें, सिक्के व कुछ चावल रखें।
- 5) विधि-पूजन: दीपक जलाएं, प्रसाद और फ्रूट रखें, वंदना या देवी स्तुति का पाठ करें। लोकप्रिय मわत्रों में आप देवनागरी में “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः” का उच्चारण कर सकते हैं या अपने पारंपरिक स्तोत्र का जाप करें।
- 6) समापन: आरती कर के प्रणाम। घट को पूजा स्थल पर पूर्वनिर्धारित स्थान पर स्थिर रखें—आम तौर पर पूर्व या उत्तरमुखी स्थान अनुकूल माना जाता है।
दैनिक अनुशासन (नवरात्रि के नौ दिन)
- हर सुबह कलश के आगे दीपक जलाना और संक्षेप में 5–11 मंत्रों का जाप।
- यदि समय मिलता है तो दुर्गा सप्तशती के श्लोक, या देवी के नामों का जाप (Namavali) करना श्रेष्ठ।
- प्रसाद और फूल रोज बदलें; पानी परिक्षण करें—यदि दूषित हो तो बदल दें।
- उपवास/भोजन: अपने स्वास्थ्य व धर्म-परम्परा अनुसार व्रत रखें; अनित्य नियमों में मतभेद होते हैं—समुदाय के अनुसार पालन करें।
निष्कासन / विसर्जन और आगे की परम्परा
- कई परिवार विजयदशमी पर कलश विसर्जित करते हैं; कुछ लोग साल भर तक भीतर रखकर अगली स्थापना पर ही बदलते हैं। यदि विसर्जन किया जा रहा हो तो पवित्र जल का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल स्थल चुनें—बहुत से शहरी लोग नालों में न करें।
- कई परम्पराएँ कलश का जल तुलसी के पास डालने या खेत-उपयोगी स्थान पर निकालने का निर्देश देती हैं—स्थानीय रीति अनुरूप करें।
शहरी वैकल्पिक उपाय और समावेशी सुझाव
- यदि बड़ा कलश न हो तो छोटा ग्लास कलश या मिट्टी का छोटा घड़ा लें।
- नारियल न उपलब्ध हो तो फल या प्रतीकात्मक प्रतीक रखें और स्पष्ट इरादा रखें कि यह देवी का प्रतिनिधित्व है।
- यदि आप मौलिक मंत्र नहीं जानते तो सरल स्तुति, ध्यान या मंत्र-नाम का आवर्तन भी श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है—नियत मन का महत्व अधिक है।
अंतिम बातें—संरक्षण और विविधता का सम्मान
घट स्थापना एक लचीला परन्तु गहन कार्य है: तकनीकी अनुशासन महत्त्वपूर्ण है, परन्तु सबसे प्रमुख है संकल्प और मन की शुद्धि। विभिन्न साम्प्रदायिक पाठ एवं विधियाँ अलग-अलग होंगी—Śākta स्रोत कलश को विशेष देवतास्वरूप देखते हैं, जबकि Smārta परिवारों में यह समग्र पूजा का केन्द्र होता है। यदि आप किसी विशेष पारिवारिक या सांप्रदायिक पद्धति का पालन करते हैं, तो स्थानीय पंडित या परिवार के वरिष्ठों से मार्गदर्शन लेना उत्तम रहेगा। नवरात्रि की यह तैयारी केवल विधि-परायणता नहीं बल्कि आंतरिक परिवर्तन, आत्म-संयम और सामुदायिक जुड़ाव का अवसर है।