नवरात्रि से पहले घट स्थापना का शुभ मुहूर्त
नवरात्रि में घट स्थापना (घटस्थापना/घट पूजा) का अनुष्ठान देवी की उपासना की शुरुआत माना जाता है और घर-समाज दोनों में गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता रखता है। कई परंपराओं में यह अनुष्ठान नवरात्रि के पहले ही किया जाता है ताकि पहले दिन से ही देवी की स्थिर उपस्थिति सुनिश्चित रहे। परंपराओं, क्षेत्र और पुराण-शास्त्रों में घट स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त के बारे में विविधताएँ मिलती हैं। इस लेख का उद्देश्य पञ्चाङ्गीय तत्वों, व्यवहारिक नियमों और व्यवहार में आने वाली विविधताओं को स्पष्ट, नपे-तुले और संवेदनशील ढंग से बताना है ताकि पाठक स्थानीय पण्डित या पंचाङ्ग से परामर्श करते समय समझ के साथ निर्णय ले सकें। नीचे दिए सुझाव सामान्य प्रथाओं पर आधारित हैं; किसी विशेष तिथि-समय के लिए अपने क्षेत्र का पंचाङ्ग देखें या योग्य ज्योतिष/पुरोहित से सलाह लें।
घट स्थापना के लिए पञ्चाङ्गीय प्राथमिकताएँ
- तिथि (Tithi): कई शास्त्रीय और लोक परम्पराओं में घट स्थापना के लिए शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को श्रेष्ठ माना जाता है। यदि प्रतिपदा नवरात्रि की प्रातःकालीन तिथि है, तो प्रातःसंज्ञा के बाद उस तिथि में घट स्थापना करना उपयुक्त होता है।
- वार (Vaar): सोमवार, मंगलवार और शुक्रवार को देवीपूजा के लिए अनुकूल माना जाता है; पर यह पारिवारिक परंपरा और क्षेत्र अनुसार बदलता है।
- नक्षत्र व योग/करण: शुभ नक्षत्रों (सामान्यतः लाभदायक नक्षत्र) में करना अच्छा माना जाता है; उसी तरह अशुभ योग या करण से बचना चाहिए।
- मुहूर्त और अवधि: पारंपरिक मुहूर्त का एक अंग लगभग 48 मिनट (एक मुहूर्त = 48 मिनट) मानकर चलता है। अभिजीत मुहूर्त (मध्याह्न के आसपास का छोटा शुभ अवधि) को कई स्थानों पर शुभ माना जाता है।
- राहुकाल, यमघंट (यमगण्ड) और गुलिका: इन अशुभ कालों से परहेज करें। इनके समय का निर्धारण स्थानीय सूर्योदय पर निर्भर करता है—इसलिए पंचाङ्ग देखना आवश्यकीय है।
- दिक्पाल/प्रवेशकाल: यदि घर में विशेष दिशाओं का विधान हो (जैसे उत्तर-पश्चिम न खोले इत्यादि), तो स्थानीय रीति-रिवाज का पालन करें।
व्यावहारिक मार्गदर्शक — किस समय घट स्थापना करें
- सामान्यतः प्रातःकालीन समय (सूर्योदय के बाद का पहला शुभ मुहूर्त) सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि दिन की शक्ति और पवित्रता का भाव प्रबल रहता है।
- यदि प्रतिपदा तिथि नवरात्रि के आरम्भ से पहले शाम को आरंभ होती है, तो कई परिवार घट स्थापना पूर्वसंध्या (शाम) में भी कर लेते हैं; ऐसी स्थिति में संध्या-समयानुसार शुभ मुहूर्त और नक्षत्र देखना आवश्यक है।
- मध्याह्न का अभिजीत मुहूर्त (लगभग सूर्य के मध्य समय के आस-पास) भी शुद्धि-संकल्प के लिए स्वीकार्य है, विशेषकर जब प्रातः का समय अनुकूल न हो।
- चंद्रका/तिथि परिवर्तन के समय घट स्थापना करने से बचें—यदि तिथि बदलने वाली हो और आपका अनुष्ठान उसी बदलाव के दौरान अधूरा रहेगा तो सही तिथि में स्थापन करें।
कृत्रिम घटनाएँ व असाधारण स्थितियाँ
- यदि चंद्र ग्रहण या सूर्यग्रहण हो रहा हो तो शास्त्रों का परामर्श लें—कई परंपराएँ ग्रहणकाल में स्थापना टालने का कहती हैं।
- यदि किसी कारणवश नवरात्रि से कई दिन पहले स्थापना करनी पड़े, तो स्थानीय रीति व पारिवारिक परम्परा का पालन करना ठीक रहता है। कुछ समुदायों में घट को पहले ही स्थापित करके दस दिनों तक पूजन जारी रखते हैं।
घट स्थापना का औपचारिक क्रम (संक्षेप में)
- सर्वप्रथम स्थान की शुद्धि (क्षेत्र-शुद्धिकरण)।
- घट (कलश) को साफ पानी से भरे, उसमें गंगाजल/पवित्र जल मिलाया जा सकता है; कुछ परम्पराओं में दूर्वा-पत्ते या अक्षत (चावल) का प्रयोग भी होता है।
- कलश के मुख पर आम के पत्ते और ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है—यह प्रचलित लोक-मार्ग है।
- संकल्प (संकल्पवाचन) कर सम्पूर्ण अनुष्ठान के लिए मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृढ़ता स्थापित की जाती है।
- देवी-नवन्तिक/सप्तमातृकाओं/गणों का आवाहन, यदि आपकी परम्परा में है।
- अन्त में दीप-आरती व नैवेद्य अर्पण तथा मंत्रोच्चारण—विविध परम्पराओं में मन्त्र व पाठ अलग-अलग होंगे; स्थानीय पण्डित से अनुरोध करें।
क्षेत्रीय और सम्प्रदायिक विविधताएँ
- बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु व कर्नाटक आदि में घट स्थापना के पक्व भेद मिलते हैं—किसी जगह घड़ा/घट सीधे पूजा-साधु में रखा जाता है, किसी जगह भूमि पर मिट्टी का कलश स्थापित होता है।
- शाक्त परम्परा में घट को अधिक मंत्रात्मक और ऊर्जा-स्थापना के साथ देखा जाता है, वहीं स्मार्त परम्परा में निर्देशित पद्धति और दैव-शास्त्रिक नियमों पर विशेष जोर रहता है।
- कुछ समुदाय नवदुर्गा के विभिन्न रूपों के अनुसार घट स्थापना के समय अलग-अलग मंत्र/आह्वान करते हैं; इन मतों का आदरपूर्वक पालन करें।
तत्कालीन सुझाव और सूची (चेकलिस्ट)
- स्थानीय पंचांग से: तिथि, नक्षत्र, राहुकाल, सूर्यादि समय देखें।
- यदि संभव हो तो प्रातः के पहले शुभ मुहूर्त चुनें या अभिजीत में करें।
- राहु-काल, यमगण्ड, गुलिका और ग्रहण काल से बचें।
- घर के वरिष्ठों/पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पुरोहित से मार्गदर्शन लें।
- भौतिक तैयारी: स्वच्छ कलश, पवित्र जल, नारियल, आम के पत्ते, अक्षत, दीप और नैवेद्य तैयार रखें।
निष्कर्ष
घट स्थापना का मुहूर्त पञ्चाङ्गीय गणना, पारिवारिक परम्परा और क्षेत्रीय रीति-रिवाज के समन्वय से तय होता है। शास्त्रीय सिद्धांत सामान्य दिशा देते हैं—प्रतिपदा तिथि, प्रातः समय, अभिजीत मुहूर्त का महत्व, और राहुकाल व ग्रहण से परहेज—पर व्यवहार में यह बहुत हद तक स्थानीय परम्परा और उपलब्धता पर निर्भर करता है। अतः किसी निश्चित तिथि-समय के लिए अपने क्षेत्र के पंचाङ्ग और जानकार पुरोहित से परामर्श लेना सबसे सतर्क और उपयुक्त उपाय होगा। इस मार्गदर्शन को व्यापक परंपरागत विवेचनाओं के रूप में लें, न कि किसी एक सम्प्रदायिक निर्णय के रूप में।