नवरात्रि से पहले देवी दुर्गा को अर्घ्य अर्पण क्यों?
नवरात्रि से पहले देवी को अर्घ्य अर्पण करने की प्रथा गहन प्रतीकात्मकता, धार्मिक व्यवहार और सामुदायिक अनुशासन का संयोजन है। इसे केवल एक अनुष्ठानिक कृत्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि एक तरह से पूजा-स्थल, मन और समाज को त्योहार के लिए तैयार करने की प्रक्रिया माना जाता है। शारदीय नवरात्रि सामान्यतः आश्विन मास के प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होती है (सौर-वर्ष के अनुसार सितंबर–अक्टूबर में) और चैत्र नवरात्रि चैत्र मास की प्रतिपदा पर होती है (मार्च–अप्रैल)। इन प्रारम्भिक क्षणों में देवी को अर्घ्य देना—जल, पुष्प, अक्षत, रोली आदि अर्पित कर स्वागत करना—एक व्यापक परंपरा बन चुकी है जिसका उल्लेख विविध ग्रंथों और लोक-आदतों में मिलता है। इस लेख में हम धार्मिक-वैचारिक कारण, विधि और क्षेत्रीय विविधता पर ध्यान रखेंगें और बताएँगे कि अर्घ्य अर्पण का आध्यात्मिक औचित्य क्या है और इसे कैसे समझा जा सकता है।
## शास्त्रीय और ऐतिहासिक संदर्भ: अर्घ्य की परंपरा कहाँ से आई?
– प्राचीन धार्मिक साहित्य में “अर्घ्य” का अर्थ आतिथ्य और आभार-सूचक भेंट से जुड़ा मिलता है। वैदिक और आगम परंपराओं में पूजा की शुरुआत आदर-सूचक द्रव्यों से करने का चलन रहा है।
– शाक्त ग्रंथ (जैसे देवी-सम्बंधी पुराण और आगम) देवी-पूजा में शुद्धि, स्थापना और निमन्त्रण के महत्व को रेखांकित करते हैं; हालांकि हर ग्रंथ में अर्घ्य का सटीक वर्णन अलग हो सकता है। इसलिए कहना उपयुक्त होगा कि अर्घ्य का रूप और सामग्री क्षेत्र तथा समुदाय के अनुसार बदलती रही है।
– गृह- और संस्कार-सूत्रों में भी अतिथि सत्कार और देवतादि के स्वागत के लिए जल-पुष्प अर्पण का उल्लेख मिलता है; नवरात्रि के प्रातः-अर्घ्य को एक प्रकार का दिव्य-अतिथि सत्कार माना जा सकता है—इसीलिए यह परंपरा लोगों की रोजमर्रा की धारणा से भी जुड़ी है।
## आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक कारण
– **शुद्धि और तैयारी:** जल और अन्य सामग्रियाँ शुद्धि का प्रतीक हैं। नवरात्रि से पहले मंदिर, घर का पूजा-कोण और मन शुद्ध कर के देवी को आमंत्रित किया जाता है। शुद्धि न केवल भौतिक सफाई है बल्कि मनोवैज्ञानिक तैयारी भी है।
– **स्वागत और निमंत्रण:** अर्घ्य एक पारंपरिक स्वागत-संकेत है—देवी को ‘आगमन’ के लिए आमंत्रित करना। इससे भक्त का मन उत्सव के लिए केंद्रित होता है।
– **समय-संघटन:** पर्व आरम्भ पर अर्घ्य देने की क्रिया त्योहार की आधिकारिक शुरुआत का सांकेतिक समय-निर्धारण करती है—इसे समुदाय स्तर पर दृश्यमानता मिलती है (घटस्थापना/कलश-स्थापना के साथ अक्सर जुड़ा)।
– **सहभागिता और स्मृति:** समाज में लोगों का एक साथ पूजा करना, अर्घ्य देना समुदायिक बंधन को मजबूत करता है और परंपरा के निरंतरत्व को सुनिश्चित करता है।
## विधि प्रकार और अभ्यास में विविधता
– आमतौर पर अर्घ्य में पानी (या गंगा जल), दूर्वा/तुरिया, पुष्प, रोली/कुमकुम, अक्षत शामिल होते हैं; कुछ स्थानों पर दीप, फल, नैवेद्य और मोटे दाने भी जोड़े जाते हैं।
– समय: प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के समय) को श्रेष्ठ माना जाता है; कई मंदिर घटस्थापना के क्षण पर अर्घ्य कर देते हैं।
– स्थान: प्रतिमा/इकाना के समक्ष, कलश के पास, या यदि प्रतिमा नहीं है तो स्थान विशेष (पूजा-कोण) के सामने।
– कुछ तांत्रिक/आगामी पद्धतियों में अर्घ्य से पहले संकल्प, न्यास और मन्त्र-उच्चारण का महत्त्व रखा जाता है; स्मार्त परम्परा में सरल प्रणाम और जल-अर्पण पर बल होता है।
## स्कूलों के अनुसार दृष्टिकोण (निरपेक्ष व नम्र অভिवेचना)
– **शाक्त परंपरा:** देवी को केन्द्र में रखकर अर्घ्य को अनिवार्य और तीव्र भाव से किया जाता है—घटस्थापना, मूर्ति-स्थापन और नवाध्यायन के साथ।
– **स्मार्त और वैष्णव परंपरा:** इनमें भी अर्घ्य होता है, परन्तु आयोजन का स्वरूप शास्त्री निर्देशों और स्थानीय रीति पर अधिक निर्भर रहता है। वैष्णवों में कुछ मामलों में देवी-पूजा के बजाय विशिष्ट नामजप और भजन-कीर्तन पर जोर होता है।
– **शैव और तांत्रिक प्रवृत्तियाँ:** इनमें अर्घ्य के साथ मन्त्र-नियंत्रण, विशिष्ट अनुष्ठानि उपकरण और कालसूत्रों का प्रयोग देखा जा सकता है।
## व्यवहारिक और नैतिक पक्ष
– अर्घ्य देना एक बाह्य क्रिया है, पर इसका असली असर भक्त के मन की शुद्धि और त्योहार के उद्देश्य—स्व-नियमन, आत्म-निरीक्षण, भक्ति—पर निर्भर करता है।
– सामुदायिक आयोजनों में अर्घ्य-प्रथा का सामाजिक लाभ है: लोक-एकता, पारंपरिक ज्ञान का स्थानांतरण और धार्मिक-अनुशासन का अनुभव।
– आधुनिक संदर्भ: शहरी परिवेश में लोग छोटे समूहों या ऑनलाइन कार्यक्रमों में भी अर्घ्य अर्पित करते हैं; पर शुद्धता और निष्ठा का भाव अपरिवर्तित महत्व रखता है।
## संक्षेप में—क्यों अर्घ्य पहले?
– यह देवी का स्वागत, पूजा-स्थल और मन की शुद्धि, पर्व की आधिकारिक शुरुआत और सामुदायिक सहभागिता—इन सभी का संयोजन है।
– शास्त्रीय और स्थानीय परंपराएँ रूप-भेद के साथ इस क्रिया को समर्थित करती हैं; इसलिए किसी विशिष्ट विधि को सार्वभौमिक नियम न मानते हुए, स्थानिक रीति और गुरु/पण्डित के निर्देशों का पालन समझदारी है।
यदि आप व्यक्तिगत रूप से अर्घ्य अर्पित करना चाहते हैं, तो सरलता और मन की शुद्धि प्राथमिक रखें: साफ जल, थोड़े पुष्प, कुमकुम/अक्षत और संक्षिप्त प्रणाम—और यदि संभव हो तो उस पूजा-स्थान के पारंपरिक नियमों के अनुसार करें।