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माँ कुष्मांडा के आठ हाथों का रहस्य

माँ कुष्मांडा के आठ हाथों का रहस्य

माँ कुष्मांडा का व्यक्तित्व नवरात्रि के नयनाभिराम पैनोरमा में एक ऐसा अध्याय है जिसकी अभिव्यक्ति सरल होने के साथ-साथ गहन भी है। देवी के नाम में निहित शब्द ‘कुष्माण्ड’ का अर्थ प्राचीन स्थानीय बोलियों और संस्कृत व्युत्पत्तियों में केला-पकौड़ी के समान फलों या लौकी/कद्दू जैसे फल-सब्जियों से जोड़ा गया है; यही कारण है कि लोक आख्यानों में कहा जाता है कि देवी ने एक छोटे से कुसुमण्ड (कद्दू/लौकी) से जगत् की सृष्टि आरम्भ की या उसका रूपांतरण किया। देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) और नवरात्रि पर प्रचलित पुराणिक-भक्ति कथा इस रूप को सृष्टिकर्ता और प्रकाश-वार्तक के रूप में प्रस्तुत करती है—इतनी सरल मुस्कान से विश्व का निर्माण हुआ। इसी रूप में माँ का आठों हाथों वाला (अष्टभुजा) रूप प्रश्न उठाता है: आठ हाथ क्यों, वे क्या वस्तुएँ धारण करते हैं, और उनका आध्यात्मिक-सांस्कृतिक अर्थ क्या है? इस लेख में हम पुराणिक, तांत्रिक, मूर्तिकला और लोक-भक्ति की परतों को मिलाकर इन सवालों का संतुलित विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

पुराणिक और शास्त्रीय पृष्ठभूमि

देवी कुष्मांडा का सबसे प्राचीन संदर्भ मुख्यतः देवी महात्म्य के भीतर और नवरात्रि-प्रथाओं में मिलता है। देवी महात्म्य, जो मार्कण्डेय पुराण के भीतर स्थित है, में नारी-शक्ति के विविध रूपों का वर्णन है और वहाँ नवरूपियों के रूप में स्तुतियाँ मिलती हैं। पारंपरिक शाक्त परंपराओं में कुष्मांडा को चौथे दिन विशेष रूप से पूज्य माना जाता है। शैव और वैष्णव परंपराओं में भी देवी की उपासना को स्वीकार्यता मिली है, पर व्याख्या के केन्द्र भिन्न होते हैं—जहाँ शाक्त ग्रंथों में उनका तांत्रिक तथा सृष्टि-जनक रूप प्रमुख है, वहीं कुछ वैष्णव और स्मार्त परम्पराएँ उन्हें जगत्-रक्षिणी और दयालु शक्ति के रूप में देखती हैं। मूर्तिकला और मंदिर-प्रतिमाओं में भी यह रूप क्षेत्रीय शैली और शिल्पकार की परंपरा के अनुसार बदलता है।

आठ हाथ—एकाधिक व्याख्याएँ और प्रतीक

कठोर ऐतिहासिक-दस्तावेज़ी प्रमाण सीमित हैं कि कुष्मांडा के आठ हाथों में सटीकतः कौन-कौन सी वस्तुएँ मूलतः थीं; यही कारण है कि विभिन्न शिल्पकारों और ग्रंथकारों ने क्षेत्रीय स्वाद और देवता की स्थानीय महिमा के अनुसार भिन्न-भिन्न वस्तुएँ अंकित कीं। फिर भी कुछ सामान्य वस्तुएँ और उनकी व्याख्या अक्सर मिलती हैं:

  • कमण्डल (जल-कलश): तप, संयम और जीवनदायी जल का चिन्ह; आत्म-अनुशासन व साधना का प्रतीक।
  • जपमाला (माला): स्मरण, ध्यान और निरन्तर भक्ति-अभ्यास; ध्यान-शक्ति और बिंदु-आचरण का संकेत।
  • कमल (पद्म): शुद्धि, आत्मा की स्वच्छता और सांसारिक माया से ऊपर उठने की क्षमता।
  • धनुष-बाण: इच्छाशक्ति और लक्ष्य-प्राप्ति; न केवल युद्ध के उपकरण बल्कि साधक के भीतर केन्द्रित ऊर्जा का प्रतीक।
  • चक्र/संकटमोचक चिह्न: कालचक्र, व्यवस्था और धर्म की रक्षा—ब्रह्माण्ड की संतुलनकारी शक्ति।
  • खड़्ग/कृपाण (तलवार): अज्ञानता का नाश, विवेक और भेदभाव-बुद्धि का चिन्ह।
  • गदा (मुष्टि-शक्ति): नीति और अधिकार; सृष्टि में ताकत और शक्ति लागू करने की योग्यता।
  • वर व अभय मुद्रा (हाथ का आशीर्वाद): करुणा, सुरक्षा और भक्तों को आश्वासन देने का प्रतीक।

ध्यान देने योग्य है कि कुछ प्रतिमाओं में चक्र के स्थान पर शंख, पुस्तक, दण्ड या अन्य तत्त्व भी दिखाई देते हैं। इस विविधता को ग्रंथनिरपेक्ष त्रुटि नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह स्थानीय सोच, सिद्धान्तिक व्याख्या और मूर्तिकार की संवेदना का प्रतिबिम्ब है।

आध्यात्मिक व तांत्रिक पढ़ाई

कुछ तांत्रिक टिप्पणियाँ आठ हाथों को साधनात्मक शक्तियों या अष्टसिद्धियों से जोड़ती हैं—जैसे इच्छा-शक्ति, शक्ति-परिणाम, मानसिक-शुद्धि, इत्यादि। अन्य व्याख्याएँ इन हाथों को अष्ट-दिशाओं (अष्ट-दिक्पाल) में फैली देवी की उपलब्धि के रूप में भी देखती हैं: अर्थात् माँ का प्रभाव सृष्टि के सभी दिशाओं में व्याप्त है। देवी की “मुस्कान” से सृष्टि रचना की कथा को भी कई गुरुपरंपराएँ मूलभूत प्रतीकवाद के रूप में पढ़ती हैं—एक चेतन मुस्कान, जिसने प्रथ्वी में प्रकाश और गति, रूप और पदार्थ की संभावना उत्पन्न कर दी।

कई संप्रदायों में यह भी कहा जाता है कि माता का अष्टभुजा रूप दर्शाता है कि सृष्टि केवल भौतिक क्रिया नहीं है, बल्कि उसमें अनेक आध्यात्मिक पद-प्रकर्ष शामिल हैं और हर हाथ किसी न किसी आध्यात्मिक गुण या साधना का प्रतिनिधित्व करता है।

पूजा, लोक-परंपरा और साधनात्मक सुझाव

नवरात्रि के चौथे दिन कुष्मांडा की पूजा करने की प्रथा व्यापक है—पूजा में भगवती के लिए दीप, फल (विशेषकर स्थानीय तौर पर कद्दू/लौकी या अन्य मौसमी फल), और जप-पूजन शामिल होते हैं। लोक-प्रथाओं में कभी-कभी देवी को कुश्माण्ड की भेंट दी जाती है; यह आदिकालीन लोकभक्ति का एक जीवंत संकेत है कि नाम और प्रतीक का सीधा सामाजिक अनुष्ठान से मेल है। भक्तों के लिए एक साधारण अभ्यास यह हो सकता है कि वे आठ दिनों में से प्रत्येक हाथ के गुण पर एक दिन ध्यान करें—उदाहरणतः एक दिन कमण्डल के माध्यम से तप पर, दूसरे दिन माला के माध्यम से स्मरण पर, और इसी तरह। इससे प्रतीक और आचरण के मध्य एक जीवनदर्शन बनता है।

निष्कर्ष

माँ कुष्मांडा के आठ हाथ केवल मूर्तिकला-शिल्प की शोभा नहीं हैं; वे एक विस्तृत प्रतीकात्मक कविता हैं जो सृष्टि, शक्ति, साधना और दया के बहुआयामी स्वरूप की ओर संकेत करती है। पारंपरिक शास्त्र, लोक-कथा और मंदिर-कला मिलकर यह बताते हैं कि देवी की मुस्कान से उत्पन्न जगत सिर्फ भौतिक प्रक्रियाओं का परिणाम नहीं—बल्कि चेतना, इच्छा और आलोकित करुणा का संगम है। भिन्न-भिन्न परंपराएँ इन हाथों की वस्तुएँ और अर्थ अलग तरीके से समझती हैं; इसलिए अध्ययन में नम्रता और बहुलता की स्वीकार्यता रखना आवश्यक है। भक्त या शोधकर्ता, चाहे वे शास्त्रीय पाठ पढ़ें या मंदिरों की मूर्तियों का अध्ययन करें, इस अष्टभुजा रूप को एक जिज्ञासु और श्रद्धालु नजर से देखकर समृद्ध अंतर्दृष्टि पा सकते हैं।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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