माँ महागौरी का श्वेत स्वरूप क्यों है इतना पवित्र?
माँ महागौरी का श्वेत स्वरूप हिंदू धार्मिक कल्पनाओं में एक बेहद सूक्ष्म और बहुआयामी प्रतीक है। पारंपरिक नवरात्रि पर महागौरी को आठवीं रूप में पूजित किया जाता है और उनकी अलबेलि श्वेतता न केवल एक दृश्य विशेषता है, बल्कि शुद्धि, शांतचित्तता और आध्यात्मिक आरोहण के गहरे अर्थों को व्यक्त करती है। जहाँ कुछ पुराणिक कथाएँ और लोककलाएँ उन्हें पार्वती की तपस्या के बाद श्वेत रूप में उदित बताती हैं, वहीँ दर्शनशास्त्र और गुन-व्याख्याएँ इस श्वेतता को आत्मिक शुद्धि, सत्वगुण और दूषणों के नाश का प्रतीक मानती हैं। इस लेख में हम कथात्मक परतें, देव-चित्रण, शास्त्रीय व्याख्याएँ और लोक-प्रथाओं के उदाहरणों के साथ यह समझने का प्रयत्न करेंगे कि क्यों श्वेत रंग को महागौरी के साथ जोड़ा गया है और अलग-अलग परम्पराओं में उसके क्या अर्थ निकलते हैं।
कथा-आधार: महागौरी कैसे बनी श्वेत?
महागौरी से जुड़ी कथाएँ क्षेत्र और साहित्य के अनुसार भिन्न हैं। एक सामान्य पारंपरिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यन्त कठोर तपस्या की; तप की अग्नि और धूल ने उनका शरीर कलुषित कर दिया था। कुछ संस्करणों में बताया जाता है कि पार्वती ने गंगा में स्नान किया या शिव ने उन्हें स्पर्श कर परिमलित कर दिया—तब उनका रूप उज्ज्वल, निर्मल और श्वेत हो गया।
शास्त्रीय ग्रंथों में सभी रूपों का जीवंत विवरण नहीं मिलता, परन्तु देवी भागवत व अन्य पुराणिक और तांत्रिक परम्पराएँ देवी के विभिन्न मूल्याँकनों को सामने रखती हैं। नवरात्रि की लोक-परम्परा ने इन रूपों को क्रमवार व्यवस्थित किया—जहाँ महागौरी को अक्सर आठवें दिन पूजित किया जाता है।
श्वेतता का सूक्ष्म दर्शन
रंग-प्रतीक की व्याख्या करते समय अक्सर संस्कृत दर्शन में प्रयुक्त तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—का संदर्भ दिया जाता है। भगवद्‑गītā के व्याख्यानों में सत्त्व को शुद्धता, प्रकाश और ज्ञान से जोड़ा गया है; इसी तर्क को अपनाकर कई पंडित और टिप्पणीकार महागौरी की श्वेतता को सत्त्वगुण का प्रतीक मानते हैं।
कुछ विद्वान बताते हैं कि श्वेत रंग “रंगों की अनुपस्थिति” भी है—एक तरह से समस्त रंगों का परित्याग। इसलिए महागौरी का श्वेत होना सांसारिक रंगों, मोह-माया और दोषों से परे हटकर आध्यात्मिक शान्ति व आत्म-ज्ञान की ओर इंगित करता है।
आइकोनोग्राफी: रूप, वस्त्र और वाहन
चित्रों और मूर्तियों में महागौरी को सामान्यतः उज्ज्वल, गोरा या श्वेत वर्णवाला दर्शाया जाता है। उनके वस्त्र, अलंकरण और पुष्प भी अक्सर सफेद होते हैं। हाथों की मुद्रा में दो हाथ वरदान और अभय प्रदान करते दिखते हैं, अन्य दो हाथ में त्रिशूल या कमल/दमरु धारण देखने को मिलते हैं—वर्णन परम्परा के अनुसार भेद हैं। वाहन के रूप में गाय/बैल (नंदी से संबंध) का उल्लेख मिलता है, जो शिव-परिवार के साथ उनकी निकटता को दर्शाता है।
शुद्धि और उपचार: लोक-मान्यताएँ
लोकधारणा में महागौरी की पूजा से पापों का शमन, शरीर-शुद्धि और रोगों से मुक्ति की कामना की जाती है। इसलिए आराधक पीले या रंगीन वस्त्रों के स्थान पर सफेद या हल्के वस्त्र पहनकर, दूध, चावल, सफेद फूल अर्पित करते हैं। इन रीति-रिवाजों को क्षेत्रीय भेद के साथ जन-मानस में लोकप्रियता मिली है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि चिकित्सकीय दावों से बचना चाहिए—लोक विश्वासों में त्वचा संबंधी लाभों का वर्णन मिलता है, पर वे प्रामाणिक चिकित्सीय प्रमाण नहीं होते।
विविध व्याख्याएँ: शास्त्र और लोक के बीच
- Śākta दृष्टि: शाक्त परम्पराएँ महागौरी को देवी की शुद्धतारूपी शक्ति के रूप में देखती हैं, जो आन्तरिक क्लेशों का नाश कर मोक्ष-साधक है।
- Śaiva सम्प्रदाय: Śaiva ग्रंथों और लोककथाओं में महागौरी को पार्वती का शांत, सहायक रूप कहा जाता है—शिव के संगत में उसकी सत्त्वात्मकता उभरकर आती है।
- सांस्कृतिक और स्थानीय रूप: ग्रामीण और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों में महागौरी के रंगात्मक और औपचारिक अर्थ भिन्न हो सकते हैं; किसी स्थान पर उनकी कथा और पूजन विधि अलग हो सकती है।
आधुनिक प्रासंगिकता
आज के समय में महागौरी की श्वेतता कई तरह से प्रासंगिक दिखाई देती है—मानसिक शान्ति, पर्यावरणीय सफाई की रूपक समझ और नैतिक शुद्धता की वकालत। नवरात्रि के दौरान श्वेताभुष्ट महागौरी का पूजन लोग आंतरिक स्वच्छता, क्षमा और संयम की प्रेरणा के रूप में लेते हैं।
निष्कर्ष
महागौरी का श्वेत रूप केवल रंग-चिह्न नहीं है; यह एक जटिल प्रतीक है जो पौराणिक कथाओं, तात्त्विक व्याख्याओं और लोक-प्रथाओं के मिलन से बनता है। शास्त्रों और परम्पराओं में विविधता होने के बावजूद एक सामान्य धारा यह मानती है कि श्वेतता शुद्धि, सत्त्व और आंतरिक शान्ति का सूचक है। इसलिए चाहे कोई इसे भक्ति के माध्यम से औपचारिक पूजन में अनुभव करे या व्यक्तित्त्विक चिन्तन में—महागौरी का श्वेत स्वरूप श्रद्धा, शुद्धि और आत्मिक उन्नयन की प्रेरणा देता है।