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माँ स्कंदमाता के चार हाथों का रहस्य

माँ स्कंदमाता के चार हाथों का रहस्य

माँ स्कंदमाता का रूप—विषमता और कोमलता का समन्वय—हिंदू आध्यात्मिक परंपरा में एक निहित رمز के रूप में उभरता है। पारंपरिक चित्रों में उन्हें चार हाथों वाली देवी के रूप में दिखाया जाता है, जिनमें से एक या दो में कमल का फूल, एक में पुत्र स्कंद/कार्तिकेय और एक वरदान या भक्ति का ज्ञान प्रदर्शित करने वाला मुद्रा होता है। यह रूप केवल एक मातृत्व-छवि नहीं है; यह शक्ति (शक्ति), संरक्षण और मार्गदर्शन का संकेत भी है। विभिन्न शास्त्रीय, पौराणिक और तांत्रिक व्याख्याएँ इस चार-हाथ वाले रूप को अलग-अलग संदर्भों में समझाती हैं—कभी वह चारों वेदों या पुरुषार्थों का प्रतीक बतलाई जाती है, तो कहीं चारों दिशाओं में फैली माँ की सर्वव्याप्ति। आज की धार्मिक प्रथाओं और नौरात्रि उपासना में इस रूप का विशेष स्थान है, परन्तु उसकी व्याख्या समय, क्षेत्र और सम्प्रदाय के अनुसार बदलती रहती है—इसी विभिन्‍नता और गहनता का संकलन इस लेख में संक्षेप में पेश किया जा रहा है।

आकृति-चित्रण: चार हाथों का साक्ष्य और रूपांतर

परंपरागत तस्वीरों में माँ स्कंदमाता को चार भुजाओं (चतुर्भुजा) वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। सामान्यतः निम्नलिखित तत्त्व बार-बार मिलते हैं:

  • कमल के पुष्प: दो हाथों में कमल—शुद्धता, आत्मिक उन्नति और भौतिक जगत से परे उठने का संकेत। कमल पारंपरिक रूप से देवी-शक्ति का चिह्न है।
  • शिशु स्कंद/कार्तिकेय: देवी की गोद में बैठा पुत्र, जो युद्ध-वीरता और दिशा देने वाली शक्ति का प्रतीक है।
  • वरदान/आश्वासन मुद्रा: एक हाथ दृष्टि में भक्तों को आश्वस्त करता है—भय-निवारण (अभय) या वरदान-प्रदाता (वरद)।
  • रञ्जक विविधताएँ: कुछ चित्रों में देवी के अतिरिक्त हाथ जिनमें अस्त्र-शस्त्र या जपमाला होते हैं; कुछ क्षेत्रीय चित्रों में छह या आठ भुजाएँ भी पाई जाती हैं—यह दर्शाता है कि चतुर्भुजा सिद्धान्त एक आदर्श रूप है पर लोकाभिरुचि में भिन्नता बनी रहती है।

चार हाथ—सांकेतिक व्याख्याएँ

चार हाथों की संकल्पना का सरल अर्थ केवल ‘शक्तिशाली’ होना नहीं है। व्याख्याएँ विविध हैं और अक्सर परंपरा विशेष पर निर्भर करती हैं:

  • चतुर्विध मूल्य या पुरuषार्थ: कुछ प्रवचन चार हाथों को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से जोड़ते हैं—माँ समग्र जीवन-गुणों की रक्षा और मार्गदर्शक है।
  • चार वेद या चार दिशाएँ: वैदिक या शास्त्रीय टिप्पणियाँ इसे चार वेदों का प्रतिनिधित्व मानती हैं—देवी समग्र ज्ञान की जननी।
  • मातृत्व + सक्रिय शक्ति: शाक्त परम्परा में माँ की एक भुजा करुणा और पोषण दिखाती है, दूसरी सक्रिय शक्ति/उत्प्रेक्षण का भाव—यह नर्मता और आक्रामकता के एकत्व का दर्शन कराती है।
  • तांत्रिक दृष्टि: कुछ तांत्रिक व्याख्याएँ शिशु को जीव-आत्मा या कुंडलिनी के संभावित जागरण के रूप में पढ़ती हैं; देवी की गोद में वह सत्पथ पर आना प्रतीकात्मक होता है।

ग्रंथीय और पौराणिक संदर्भ

स्कंद माता का नाम और रूप स्कंद/कार्तिकेय की पौराणिक कथाओं से निकटता रखता है। स्कंद पुराण में स्कंद (कार्तिकेय) के जन्म, पालन और देवताओं में उसकी भूमिका का विस्तृत वर्णन मिलता है; वहीं नवदुर्गा उपासना-पद्धतियों और कुछ देवी-पुराण एवं तांत्रिक ग्रंथों में स्कंदमाता का सम्वन्ध और ध्यान श्लोक मिलते हैं। ध्यान रहे कि हर ग्रंथ में एक समान विवरण नहीं मिलता—कुछ ग्रंथों में माँ का सन्देश मातृत्व पर ज़्यादा केन्द्रित है, तो कुछ में वे युद्ध-देवी के मातृत्व-आयाम को उभारते हैं। इसीलिए भाष्यकार और क्षेत्रीय भक्ति-परम्पराएँ अक्सर अलग मार्ग सुझाती हैं।

उपासना और त्योहार: नौरात्रि में स्थान

लोक-धर्म में माँ स्कंदमाता का विशेष स्थान नवरात्रि में माना जाता है—परंपरागत रूप से पांचवे दिन की पूजा कई जगहों पर उनकी स्मृति-अर्पण का समय है। पूजा-विधि में कमल, दीप, फूल और बालक-प्रतिमूर्ति के रूप में कर्य शामिल होते हैं। मंत्र-पाठ और ध्याना श्लोकों के प्रयोग में भी विविधता है—कुछ पारम्परिक अनुष्ठानों में स्कंदमाता का विशिष्ट ध्यानी श्लोक होता है जबकि कुछ लोक-उपासनाएँ सरल भजन-भक्ति पर केंद्रित रहती हैं।

समकालीन और दार्शनिक पठनीयता

आधुनिक व्याख्याएँ माँ स्कंदमाता के रूप को पारिवारिक और सामाजिक विषयों के परिप्रेक्ष्य से भी पढ़ती हैं—न केवल देवी की धार्मिक उपासना बल्कि मातृत्व में निहित नेतृत्व और सामर्थ्य का सामाजिक प्रतीक। दार्शनिक दृष्टि से यह रूप ‘सहानुभूति के साथ कार्य करने वाली शक्ति’ का आदर्श प्रस्तुत करता है: जो पोषण दे और एक ही समय में बाधाओं को हटाकर परिवर्तन की दिशा दिखाए।

निष्कर्ष

माँ स्कंदमाता के चार हाथों का रहस्य एकल-व्याख्या में सीमित नहीं किया जा सकता। शास्त्रीय, तांत्रिक, पौराणिक और लोक-परम्परागत दृष्टांतों में इसका अर्थ बदलता और गहरा होता है। श्रद्धालु और अध्ययन-कर्ता दोनों के लिए उपयोगी यह है कि वे स्रोतों की विविधता को अपनाएँ और समझें कि यह रूप माँ के संरक्षणात्मक, सर्जनात्मक और परिवर्तनकारी आयामों को समेकित रूप में दर्शाता है—एक ऐसी देवी जो भक्त के लिए कोमलता और शक्ति, दोनों का स्रोत है।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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