लक्ष्मी जी के 108 नाम, दिवाली पूजा के समय जरूर करें जाप
दिवाली के समय लक्ष्मी पूजन पर विशेष ध्यान देने का परंपरागत महत्व है। यही वह रात होती है जब परिवार मिलकर दीप प्रज्वलित करते हैं, घर-सोच साफ करते हैं और सम्पन्नता, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवी लक्ष्मी का स्मरण करते हैं। लक्ष्मी के 108 नामों का जाप (अष्टोत्तर शतनामावली) आत्म-संयम, श्रद्धा और ध्यान के साथ करने पर मानसिक और आर्थिक दोनों ही रूपों में स्थिरता लाने का विधान माना जाता है। विभिन्न शास्त्रों और पारंपरिक स्तोत्रावलियों में नामों की सूचियाँ थोड़ी अलग मिलती हैं; यहां प्रस्तुत सूची और सुझाव एक प्रचलित परंपरा पर आधारित हैं—परंपरागत रीति, समय और मंत्र-उच्चारण का पालन करते हुए परिवार या गुरुदेव से पुष्टिकरण कर लेना उपयुक्त रहेगा।
शास्त्रीय संदर्भ और वैकल्पिक परंपराएँ: वेदों में श्री सूक्त(ऋग्वेद/तैत्तिरीय संहिता में प्रचलित) का महत्त्व बताया गया है; पुराणिक और स्तोत्र ग्रंथों में लक्ष्मी-स्तोत्र, लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम और महालक्ष्मी स्तोत्र के अलग-अगल रूप मिलते हैं। शैव, वैष्णव और शाक्त परंपराओं में लक्ष्मी की आराधना के अलग अर्थ और विधि होते हैं — शैव-वाचक स्थानों पर लक्ष्मी को भी शिव-शक्तिकोण से देखा जाता है, वैष्णव परंपरा में वे श्रीविष्णु की संगीनी के रूप में पूजित हैं। इसलिए स्थानीय रीति और परिवार की परंपरा का सम्मान करते हुए जाप करें।
कब और कैसे जपेँ (दिवाली पूजन संदर्भ):
- तिथि/समय: पारंपरिक रूप से लक्ष्मी पूजन कार्तिक माह की अमावस्या (दिवाली की रात) के दिन शाम के समय या नक्षत्र-समाय में किया जाता है। इस अमावस्या की शुक्ल/कृष्ण पक्ष का पालन स्थानीय पंचांग के अनुसार करें।
- पूर्वतैयारी: स्नान, घर की सफाई, पूजन-स्थल पर स्वच्छ कपड़ा और दीपक रखें। अगर संभव हो तो लक्ष्मी-स्तोत्र/अष्टोत्तर का मुद्रित पाठ साथ रखें।
- जाप-विधि: 108 माला का प्रयोग करें; एक माला के एक चक्कर में 108 बार जप पूरा करें। यदि समय कम हो तो 3, 11 या 21 क्रम (क्रमिक बिन्दु) भी किये जाते हैं—किन्तु दिवाली पर पूरा 108 करना श्रेष्ठ माना जाता है।
- संकल्प और समर्पण: प्रारम्भ में संकल्प लें—किस उद्देश्य से जाप कर रहे हैं (परिवारिक कल्याण, अर्थिक स्थिरता, आध्यात्मिक प्रगति इत्यादि)। जाप के उपरांत देवी को पुष्प, अक्षत और दीप अर्पित करें।
लक्ष्मी जी के 108 नाम — एक प्रचलित अष्टोत्तर शतनामावली
नोट: नामों के उच्चारण में सूक्ष्म भिन्नता विभिन्न परंपराओं में मिल सकती है। परिवार या मंदिर की देवनागरी/संस्कृत प्रतिलिपि मिल पाए तो उसी का पालन करें।
- 1. श्री
- 2. महालक्ष्मी
- 3. श्रीदेवी
- 4. पद्मा
- 5. पद्मावती
- 6. पद्मिनी
- 7. कमला
- 8. कमलामयी
- 9. कमलासना
- 10. पद्मोद्भवा
- 11. श्रीविधाता
- 12. श्रीविवर्धिनी
- 13. श्रीधरा
- 14. श्रीप्रिया
- 15. श्रीकरा
- 16. श्रीवाणी
- 17. श्रीनिधि
- 18. श्रीगोप्ता
- 19. श्रीप्रसादी
- 20. श्रीदायिनी
- 21. धनलक्ष्मी
- 22. वैभवलक्ष्मी
- 23. ऐश्वर्यलक्ष्मी
- 24. विजयलक्ष्मी
- 25. ज्ञानेन्द्रलक्ष्मी
- 26. सत्यलक्ष्मी
- 27. सुन्दरलक्ष्मी
- 28. विभूषितलक्ष्मी
- 29. वसुन्धरालक्ष्मी
- 30. धनधान्यप्रदा
- 31. भक्तवन्द्या
- 32. चिरंजीवनी
- 33. सुखप्रदा
- 34. कल्याणप्रदा
- 35. सौभाग्यप्रदा
- 36. लक्ष्म्यै नमः
- 37. श्रीशक्ति
- 38. निर्गुणलक्ष्मी
- 39. सुमंगललक्ष्मी
- 40. शोभा
- 41. प्रभा
- 42. चन्द्रिका
- 43. तेजोमयी
- 44. वरप्रदा
- 45. करुणामयी
- 46. क्षमाशील
- 47. संततिप्रदा
- 48. कुलदैवता
- 49. गृहलक्ष्मी
- 50. परिवारकांता
- 51. औदार्यलक्ष्मी
- 52. उदारहृदया
- 53. समृद्धिदायिनी
- 54. नैषधप्रिया
- 55. व्रतप्रिया
- 56. धर्मलक्ष्मी
- 57. अर्थलक्ष्मी
- 58. कामलक्ष्मी
- 59. मोक्षलक्ष्मी
- 60. धर्मवती
- 61. पर्सिद्धा
- 62. लोकप्रिय
- 63. संस्कृतिवात्सल्या
- 64. मातृवत्सल
- 65. देवप्रिया
- 66. विष्णुपत्नि
- 67. सर्वात्ना
- 68. सर्वज्ञप्रिया
- 69. सर्वशक्तिमया
- 70. सर्वकारिणी
- 71. सुखैकदा
- 72. शान्तिदायिनी
- 73. सौम्या
- 74. श्रीयुक्ता
- 75. श्रीविभूषा
- 76. श्रीपादुका
- 77. आशिषा
- 78. आराध्या
- 79. पूजा-युक्ता
- 80. स्तवप्रिया
- 81. यशस्विनी
- 82. तेजस्विनी
- 83. श्रद्धालु
- 84. भक्तिसुधा
- 85. कल्याणिनी
- 86. परोपकारी
- 87. मित्रजा
- 88. नैतिकलक्ष्मी
- 89. सुखसागर
- 90. सम्पत्तिस्थापिका
- 91. दोषहान्त्री
- 92. पापहरत्री
- 93. पुण्यदायिनी
- 94. पुण्यवर्धिनी
- 95. नारायणप्रिया
- 96. श्रीवन्दिता
- 97. मंगलाचरणी
- 98. स्वर्णप्रिया
- 99. ऐन्द्रियवती
- 100. शत्रुशमनिणी
- 101. आरोग्यवती
- 102. लोकमोहनिनी
- 103. दृढवल्ली
- 104. श्रीयुत्क्षेत्रवासी
- 105. समाहितवृत्ति
- 106. ध्यानलक्ष्मी
- 107. कृपालु
- 108. सर्वलक्ष्मी
जाप के बाद की साधना और व्यवहारिक सुझाव: जाप के बाद कुछ क्षण मौन रहें और देवी को अपने हृदय से समर्पित फल, फूल व नैवेद्य आज़माएँ। नियमितता महत्वपूर्ण है—यदि दिवाली पर 108 जप कठिन हो तो प्रतिदिन 21 या 11 जप कर महीने भर लगातार करने का विधान भी लाभकारी माना जाता है।
अंत में — नम्रता और विवेक: लक्ष्मी-आराधना भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आचार, सदाचार और कर्तव्यपरायणता से जुड़ी हुई है। विविध परंपराओं के मत भिन्न हो सकते हैं—इसलिए परिवारिक रीति या आश्रित गुरु के मार्गदर्शन में जाप और पूजन करें, और यदि आवश्यक हो तो स्थानीय पुजारी या संस्कृत-प्राप्त ग्रंथ से शुद्ध पाठ का सहारा लें।