नवरात्रि से पहले देवी दुर्गा के वाहन का प्रतीकवाद
नवरात्रि के आगमन से ठीक पहले देवी दुर्गा के वाहन—वहन या vāhana—पर चर्चा करना केवल कलात्मक या लोक-रिवाज़ों का ही नहीं, बल्कि त्योहार के आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थों में भी एक प्रधान प्रवेशद्वार है। वahan का अर्थ शाब्दिक रूप से “वाहन” है, पर हिन्दू चित्र-शास्त्र, पुराण और लोक-धार्मिक व्याख्याओं में यह अक्सर देवता के सक्रिय होने, शक्ति के संसार में उतरने और समाज-व्यवहार को आकार देने के प्रतीक के रूप में पढ़ा जाता है। नवरात्रि से पहले जो तैयारी होती है—घट-स्थापना, प्रतिमाएँ बनना, भक्ति-संगतियों का आयोजन—उन सबमें वाहन का चयन, उसकी सजावट और उसके साथ जुड़ी कथाएँ समुदाय की स्मृति, क्षेत्रीय पहचानों और गुरु-परंपराओं के संवाद को दिखाती हैं। नीचे हम परंपरागत सूत्रों, शास्त्रीय संदर्भों और लोक-व्याख्याओं को मिलाकर यह देखेंगे कि दुर्गा के वाहन का प्रतीकवाद किस तरह से अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों में समझा जाता है।
शास्त्रीय संदर्भ और ग्रंथीय पृष्ठभूमि
देवी दुर्गा और उसके योद्धा रूपों का विस्तृत चित्रण Devi Mahatmya में मिलता है, जो मार्कण्डेय पुराण के अध्यायों में संग्रहीत है (प्रायः Markandeya Purana के अध्यायों 81–93 के रूप में उद्धृत)। वहां महिषासुर वध और देवि के पराक्रम के प्रसंगों में उनका सिंह या व्याघ्र (बाघ) पर आरोहण बार-बार आता है—यह सशक्त और नियंत्रित शक्ति का एक सुस्पष्ट चिह्न है। शिल्प-ग्रंथ (आगम और शिल्पशास्त्र) भी मूर्तिकला और मन्दिर-विग्रहों के लिए वाहन निर्धारित करते हैं, यद्यपि क्षेत्रीय विविधता के कारण स्थानीय परंपराएँ इन्हें संशोधित कर देती हैं।
सिंह/बाघ: साहस, अनुशासन और अधिकार
शारदीय नवरात्रि में दुर्गा का सबसे आम वाहन सिंह या बाघ है। कई शाक्त और सामुदायिक व्याख्याओं में सिंह को indra-समान राजसी शक्ति, भय-हरण और धर्म-संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। एक सामान्य पठनीयता यह है कि देवी का वाहन उस ‘जीवात्मा’ या ‘मन-इन्द्रिय’ को संकेत करता है जिसे साधक नियंत्रण में लाकर सामाजिक कार्यों के लिए चालित करता है—यानी शक्ति ने जो भय और लालसा उत्पन्न करती है, उसे अनुशासित कर धर्म की रक्षा के लिए तैनात करना।
महिष और वाहन का द्वैतात्मक अर्थ
महिषासुर का वध न केवल एक ऐतिहासिक कथा है, बल्कि प्रतीकात्मक स्तर पर अहंकार, असत््य और अनियंत्रित प्रवृत्तियों का पराभव भी है। देवी का सिंह पर बैठे हुए महिषा का संहार करना यह सिखाता है कि शक्ति का उच्चतम रूप हिंसा का उत्थान नहीं, बल्कि विकारों का विवेकपूर्ण पराभव है। कुछ शास्त्रीय टिप्पणियाँ यह बताती हैं कि वाहन अक्सर उस शक्ति का रूप है जिसके माध्यम से देवी संसार-क्रिया करती हैं—संसार में उतरने का माध्यम और साधना का उपकरण दोनों।
क्षेत्रीय और देव-विशेष विविधताएँ
- बंगाल: यहां माँ दुर्गा आमतौर पर सिंह पर विराजमान दिखाई देती हैं; लोककथाएँ और दस दिन की पूजा में वही रूप केंद्रीय रहता है।
- उत्तर भारत: कुछ जगहों पर दुर्गा को शेर-रूपी ‘शेरावाली’ कहा जाता है—स्थानीय तीज-त्योहारों में शेर का चिह्न विशेष महत्त्व रखता है।
- दक्षिण/पर्वतीय क्षेत्र: विविध शाक्त रूपों में वाहन अलग हो सकते हैं या देवी को रथ/पालकी में बैठाया जा सकता है; ग्रामीण जत्राओं में लोक-चित्रण, मुखौटे और पशु-आधारित वाहनों के रूप में भी वाहन प्रस्तुत होते हैं।
वहन का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पढाई
धार्मिक मनोविज्ञान की अनेक व्याख्याएँ वाहन को अंतःकरण, इन्द्रियों या मानव-सााधन के रूप में पढ़ती हैं। उदाहरण के लिए, लोकप्रिय व्याख्याओं में कहा जाता है कि देवी अपने वाहन के माध्यम से मन की अशांत प्रवृत्तियों को सम्भालती हैं। इसी प्रकार गजानन गणेश के मूषक (चूहा) या सरस्वती के हंस जैसे वाहन भी अलग-अलग मानसिक-आधारों का संकेत माने जाते हैं—मूषक चंचल मन/इच्छा, हंस विवेक/विमर्श। ये व्याख्याएँ शास्त्रीय परिभाषा नहीं, पर विस्तृत लोक-धार्मिक समझ का हिस्सा हैं।
नवरात्रि से पहले की प्रथाएँ और सार्वजनिक अर्थ
नवरात्रि की तैयारी में वाहन की प्रतिकृति बनना या वाहन के प्रतीक को सजाना एक सामुदायिक आयोजन भी है। कई स्थानों पर प्रतिमाओं के साथ पांडालों में वाहन को प्रमुख स्थान दिया जाता है; कुछ समुदायों में नगर-रथ या झांकियों के माध्यम से देवी के वाहन की शोभा यात्रा आयोजित होती है। कलाश-स्थापना (घट-स्थापना) जैसी विधियों में भी वाहन का नाम, ध्वज या चित्र शामिल रह सकता है—यह एक तरह से समुदाय को देवी के सक्रिय रूप में स्वागत के लिए व्यवस्थित करता है।
निष्कर्ष: वाहन—माध्यम से संदेश तक
दुर्गा का वाहन केवल एक दृश्य-सौंदर्य नहीं; वह एक बहुआयामी प्रतीक है जो शक्ति के नियंत्रण, साधना के माध्यम और सामाजिक स्मृति को एक साथ जोड़ता है। शास्त्रीय ग्रन्थों का इतिहास, शिल्प-नियमों की विनियमन और लोक-व्याख्याओं की जीवंतता यह दर्शाती है कि नवरात्रि से पहले वाहन का चुनाव और उसकी प्रस्तुति समाज और साधक दोनों के लिए एक तरह की तैयारी है—देवी को बाह्य रूप में आमंत्रित करने के साथ-साथ आन्तरिक रूप से भी सत्ता, विवेक और समर्पण का अभ्यास आरम्भ करने का संकेत। परम्परागत और आधुनिक दोनों ही स्तरों पर इस प्रतीकवाद की व्याख्या विविध है; इसलिए किसी भी एक व्याख्या को सार्वभौमिक मान लेना बुद्धिमत्ता न होगा। नवरात्रि की तैयारी के पल में वाहन हमें यह याद दिलाते हैं कि शक्ति तब सच्ची बनती है जब वह मार्ग (वाहन) और लक्ष्य (धर्म, परम् लक्ष्य) का समन्वय कर सके।