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नवरात्रि से पहले माँ दुर्गा का आवाहन मंत्र क्यों पढ़ा जाता है?

नवरात्रि से पहले माँ दुर्गा का आवाहन मंत्र क्यों पढ़ा जाता है?

नवरात्रि आरम्भ होने से पहले माँ दुर्गा का आवाहन मंत्र क्यों पढ़ा जाता है—यह प्रश्न धार्मिक भाव, कर्मकाण्ड और आध्यात्मिक समझ के बीच खड़ा होता है। धार्मिक परंपराओं में आवाहन (आवाहन) केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि साधक और देवता के बीच एक सांकेतिक संवाद है। नौ रातों का पर्व शारीरिक उपवास, सामुदायिक पूजा और दैवीय ऊर्जा—शक्ति की अनुभूति का समय माना जाता है; इसलिए कई समुदायों में नवरात्रि से पहले जप, पाठ या आवाहन कर के उस ऊर्जा को आमंत्रित किया जाता है ताकि पूजा के दौरान मन, स्थान और कर्मसूत्र शुद्ध रहें। इस अभ्यास के पीछे शास्त्रीय ग्रन्थों से लेकर स्थानीय तान्त्रिक रीति-रिवाज और मनोवैज्ञानिक कारणों तक का मिश्रण मिलता है। नीचे हम ग्रंथीय-ऐतिहासिक, तांत्रिक, सामुदायिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों से इस परंपरा की बहु-आयामी समझ प्रस्तुत करेंगे—सावधानी के साथ और विभिन्न समप्रदायों की विविध व्याख्याओं को मान्यता देते हुए।

आवाहन क्या है—परिभाषा और कार्य

आवाहन संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ‘आमंत्रण’ या ‘आने के लिए बुलाना’। पूजा-विन्यास में आवाहन का उद्देश्य देवत्व को साधक के उपस्थित स्थल पर आमंत्रित कर, उसे पूजा का केंद्र बनाना है। शास्त्रीय कुली रूप से यह विधि देवता की उपस्थिति को प्रतीकात्मक और अनुभवात्मक दोनों रूपों में स्थापित करती है—यानी देवता को ‘वास्तव में’ बुलाने के बजाय, आन्तरिक मनोवृत्ति और वातावरण ऐसा बनता है कि पूजा करने वाले को देवत्व की उपस्थित महसूस होती है।

शास्त्रीय और तान्त्रिक आधार

शाक्त परम्परा में, विशेषकर देवि महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) और विभिन्न तन्त्रग्रन्थों में आवाहन की प्रथा का वर्णन मिलता है। कई पुराण और तन्त्र उपाय बताते हैं कि मंत्र-जप और आवाहन से साधक की ऊर्जा (प्राण) और मंत्र-ऊर्जा का समन्वय होता है। तन्त्रशास्त्रों में बीज-मंत्रों (जैसे ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) का विशेष स्थान है—इन्हें शक्ति का संक्षेप कहा जाता है और सही साधना से ठीक-ठीक दिशा देने पर वे विशेष प्रभाव दर्शाते हैं। वहीं स्मार्त परम्पराएं अधिकतर स्तोत्र-पूजन और श्लोकों के माध्यम से आवाहन करती हैं—जैसे देवी स्तुति “या देवी सर्वभूतेषु…” (दुर्गा सप्तशती से लिया गया) जो व्यापक रूप से आरम्भिक आवाहन के रूप में पढ़ा जाता है।

भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारण

धार्मिक क्रियाएँ केवल बाह्य नहीं होतीं—वे मन के ध्यान और भाव को केंद्रित करने का साधन भी हैं। नवरात्रि से पहले आवाहन करने पर साधक का मन पूजा के उद्देश्य पर संरेखित होता है; यह ध्यान को स्थिर करता है, भय और द्वंद्व को घटाता है, और समुदाय में साझा दृष्टिकोण बनाता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह देखा गया है कि नियमित मंत्र-उच्चारण से स्ट्रेस कम होता है और अनुभूति-आधारित आध्यात्मिक अनुभवों की सम्भावना बढ़ती है।

सम्प्रदायिक विविधताएँ—कौन क्या क्यों पढ़ता है

  • शाक्त/तान्त्रिक परिवार: बीज-मंत्र, आह्लादक स्तोत्र और तन्त्र-आवाहन विधियाँ प्रचलित। उद्देश्य साधना के दौरान देवी-शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त करना होता है।
  • स्मार्त/वैदिक समुदाय: अधिकतर स्तोत्र, दैवीय नामावली और शान्ति-प्रार्थनाएँ पढ़ी जाती हैं; उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक नियमों के अनुरूप सामूहिक आरम्भ करना है।
  • स्थानीय लोक-परंपराएँ: गांवों में लोक-भजन, देवी-गाथाएँ और भविष्यवाणी-संबंधी अनुष्ठान होते हैं; आवाहन सामुदायिक सुरक्षा और समृद्धि का आग्रह भी होता है।
  • वैष्णव/शैव दृष्टिकोण: कुछ वैष्णव और शैव समुदाय नवरात्रि का सम्मान करते हुए भी अपने पारंपरिक स्तोत्रों या देवी के सम्मिलित रूपों का पाठ करते हैं—यहां आवाहन का स्वरूप और उद्देश्य अलग-हो सकता है।

विशेष मंत्र और उनके अर्थ (संक्षेप में)

  • या देवी सर्वभूतेषु — यह श्लोक माँ की सर्वव्यापिता और करुणा का स्मरण कराता है; साधारणतः दुर्गा सप्तशती के प्रसंगों में आरम्भ के रूप में पढ़ा जाता है।
  • ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे — तान्त्रिक बीज-मंत्र, जिसे शक्ति-अभ्युदय और रक्षक स्वरूप के लिए माना जाता है; प्रयोग में मार्गदर्शक की सलाह महत्त्वपूर्ण है।
  • दुर्गा सप्तशती पाठ — नवरात्रि पर व्यापक रूप से पाठ किया जाता है; इसका आरम्भ और समापन आवाहन-विधियों से जुड़ा रहता है।

कब और कैसे पढ़ें—आम व्यवहारिक सुझाव

  • नवरात्रि आरम्भ से कुछ दिनों पहले आवाहन करने का मतलब है मानसिक और पारिस्थितिक तैयारी—घर, स्थल और साधक की शुद्धि।
  • सम्प्रदायिक परंपरा के अनुसार मंत्र और विधि अपनाएँ; तान्त्रिक बीज-मंत्रों का प्रयोग गुरु की परवर्ती सलाह के बिना सीमित रखें।
  • भाषा और स्वर में स्पष्टता रखें—उच्चारण और नीयत दोनों महत्वपूर्ण हैं।
  • सामुदायिक पूजा में आवाहन सामूहिक एकरूपता और सहानुभूति का माध्यम बनता है; व्यक्तिगत साधना में यह ध्यान और आत्म-समर्पण को प्रेरित करता है।

निष्कर्ष (विविधता और आस्थाओं का सम्मान)

नवरात्रि से पहले माँ दुर्गा का आवाहन मंत्र पढ़ने का अभ्यास कई परतों में समझा जा सकता है—ग्रंथीय प्रमाण, तांत्रिक ऊर्जा-संवेग, मनोवैज्ञानिक तैयारी और सामाजिक एकात्मता। विभिन्न परंपराएँ इसे अलग उद्देश्यों के लिए प्रयोग करती हैं और इसलिए व्याख्या में विविधता स्वाभाविक है। किसी भी धार्मिक अभ्यास की तरह, नीयत, संदर्भ और समुदाय की मान्यताएँ महत्त्वपूर्ण हैं। शास्त्रीय और लोक अनुभव दोनों हमें यह बताते हैं कि आवाहन का मूल उद्देश्य साधक और देवी के बीच एक जितना आध्यात्मिक, उतना ही सामाजिक-नैतिक सम्बन्ध स्थापित करना है—ताकि नौ दिनों की यह यात्रा व्यवस्थित, सुरक्षित और फलप्रद हो।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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