माँ चंद्रघंटा और राक्षस युद्ध की अनसुनी कथा
माँ चंद्रघंटा का रूप नौरूपा दुर्गा के तीसरे स्वरूप के रूप में बहुत परिचित है: माथे पर अर्धचंद्र, गरदन पर घंटी जैसी आकृति और अस्त्रों से सुसज्जित परन्तु शांत और दयालु मुखावेश। पर उनके एक युद्ध की जिसे लोककथाएँ, स्तोत्र और पौराणिक संकेत बार‑बार बयां करते हैं, व्यापक साहित्यिक उद्धरणों में कम मिलता है — इसलिए इसे अक्सर “अनसुनी कथा” कहा जाता है। इस लेख में मैं पारंपरिक स्त्रोतों (Devi Mahatmya जैसी महाकाव्य परंपराओं से जुड़े सामान्य युद्ध‑मोटिफ), क्षेत्रीय लोककथाओं और चिह्नात्मक (iconographic) व्याख्याओं का संयोजन करते हुए माँ चंद्रघंटा और एक तंतुओं में भय फैलाने वाले राक्षस के बीच के युद्ध की एक सावधानीपूर्ण पुनरावृत्ति प्रस्तुत करूँगा। साथ ही मैं बताऊँगा कि यह कहानी धर्मशास्त्रीय मान्यताओं में किस प्रकार व्याख्यायित की जाती है, पूजा‑प्रथाओं में इसका स्थान क्या है, और आधुनिक आध्यात्मिक पाठ में इसके क्या संदेश हैं — सभी दृष्टिकोणों का सम्मान करते हुए तथा व्याख्यात्मक विविधता को स्वीकार करते हुए।
कथा का परिदृश्य — लोककथाओं का संश्लेषण
कई उत्तर भारतीय लोकश्रुति और स्तोत्र परंपराओं में माँ चंद्रघंटा को एक ऐसी चुनौती का सामना करते दिखाया जाता है जो केवल बाह्य राक्षस नहीं, बल्कि भीतरी भय और भ्रम का रूप भी था। इन किस्सों की आम रूपरेखा कुछ इस तरह है: एक काल में गाँव‑नगर पर एक राक्षस का आतंक था — उसका नाम स्थानानुसार बदला जाता है, पर उसकी विशेषता एक ही रहती है: यह राक्षस लोगों के अंतःकरण में भय डाले, सामर्थ्य को विघटित कर दे और धर्म तथा अनुशासन की नींव हिला दे।
देवी प्रकट होती हैं, पर चंद्रघंटा का आगमन अलग तरह से होता है। वह न केवल तेज और विकराल है, बल्कि चन्द्रमा के शांत प्रकाश की तरह स्थिर भी। उस रात जब राक्षस ने नगर पर मंडराया, माँ ने अपने घण्टे (घण्टी के स्वर) से आत्मबुद्धि जगाई। लोककथाओं के अनुसार वह शंख, त्रिशूल और कमल के साथ नहीं, बल्कि घण्टे की आवाज़ से प्राणियों के मन में पड़े जड़ भय को भेदती हैं। घण्टे की गूंज मानो सम्मोहनभंग करे — वह ध्वनि जो माया और तिमिर्भरित चेतना को हिला दे।
युद्ध आरंभ हुआ तब राक्षस ने रूप बदले, अनेकों प्रेतात्माओं का आवरण धारण कर लिया। पर चंद्रघंटा ने अपनी शीतल दृष्टि और अर्धचंद्र की शान्त छाप से उसके भ्रमित रूपों को पहचानकर काट दिया। लोककथाओं में वर्णित एक मोड़ यह है कि राक्षस की शक्ति उसके नाम और पहचान पर निर्भर थी — उस घण्टे की ध्वनि ने उसकी पहचान बार‑बार विस्मृत करवा दी, जिससे वह कमजोर हुआ। अन्ततः माँ ने उसे परास्त कर दिया; पर हत्या जैसा दृश्य कम मिलता है — अधिकतर कथा में राक्षस का ‘विनाश’ आत्मीय चेतना के सन्धान, पापों के क्षरण और ग्राम‑लोक तथा देवताओं की पुन:स्थापना के रूप में दिखता है।
प्रामाणिकता और स्रोत‑संदर्भ
यह याद रखना आवश्यक है कि चंद्रघंटा के इस युद्ध का विशिष्ट, शब्दशः वर्णन महापौराणिक ग्रन्थों जैसे Markandeya Purana (Devi Mahatmya) में सीमित रूप से मिलता है। Devi Mahatmya में जहाँ दुर्गा के अनेक रूपों और रूपांतरणों का विस्तृत वर्णन है, वहीं नौरूपा की स्थानीय रूपरेखाएँ और स्तोत्रों में मिलने वाली कहानियाँ बाद के समय में शरीराधारित और क्षेत्रीय परंपराओं के साथ जुड़कर विकसित हुई हैं। इसलिए इस “अनसुनी कथा” को एक संश्लेषणीय लोक‑पारम्परिक व्याख्या के रूप में पढ़ना अधिक उपयुक्त है।
चिह्नात्मक और आध्यात्मिक व्याख्या
- चन्द्रमा: शांत चंद्र का अर्थ है मन की शान्ति; वह अस्मिता और भावनात्मक व्यवधानों को शान्त करता है।
- घण्टा: घंटी की ध्वनि को सनातन वैदिक‑नाद‑शास्त्र में पवित्र माना गया है; यहाँ वह घृणा, भय और अज्ञान के अनाहुत आवरण को भेदने वाली जाग्रति का सूचक है।
- वाघ/शेर पर आस्था: माँ का सिंह/वाघ पर आना शक्ति के साथ धर्मपरायणता का संकेत है — क्रोध उत्पन्न होने पर भी वह केन्द्रित और न्यायप्रिय रहती हैं।
- राक्षस का विनाश: अक्सर इसे बाह्य शत्रु का नाश न मानकर आन्तरिक अशुद्धियों, मोह, और अहंकार का नाश‑प्रतीक माना जाता है।
पूजा‑प्रथाएँ और वर्तमान प्रासंगिकता
चंद्रघंटा की पूजा विशेषकर नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है। परंपरा में उस दिन घंटी बजाना, सफेद या हल्की रंगत के पुष्प अर्पित करना, और माँ की शांत छवि पर ध्यान करना सामान्य है। कई क्षेत्रीय भजन‑स्तोत्र और चंद्रोघंटा‑स्तोत्र मौजूद हैं जिनमें माँ की गुणगान और लोककथात्मक युद्ध का वर्णन मिलता है।
आधुनिक पाठ में यह कथा हमें एक स्पष्ट संदेश देती है: बाहरी संघर्ष से पहले, भीतरी भय और अज्ञान का सामना आवश्यक है। ध्यान में घंटी बजाना, चन्द्रमा के शांत प्रतीक पर मन केंद्रित करना, तथा संकट के समय शान्त परन्तु निर्णायक कदम उठाना — यही चंद्रघंटा का समकालीन पाठ है।
निष्कर्ष
माँ चंद्रघंटा और राक्षस युद्ध की अनसुनी कथा न केवल एक लोककथात्मक घटना है, बल्कि एक प्रतीकात्मक शिक्षण भी है जो अलग‑अलग परंपराओं में विविध रूपों में मिलती है। शास्त्रीय ग्रन्थ जहाँ व्यापक ढंग से देवीय युद्धों का वर्णन करते हैं, वहीं क्षेत्रीय कथाएँ और स्तोत्र उन पहलुओं को उजागर करते हैं जो स्थानीय समुदायों के जीवन और आस्था से सीधे जुड़े होते हैं। इसलिए इस कथा को पढ़ते समय ऐतिहासिक‑पौराणिक सन्दर्भ और लोकवैचारिक विविधता दोनों को ध्यान में रखकर, इसे एक जीवित परंपरा के हिस्से के रूप में समझना चाहिए।