माँ कुष्मांडा की मुस्कान से क्यों बना ब्रह्मांड?
माँ कुष्मांडा की कथा और उनका “मुस्कान से ब्रह्मांड रचना” का रूपक हिन्दू लोक-धारणा, उपनिषद्‑शास्त्र और पुराणों के मिलन से जन्मा एक शक्तिशाली प्रतीक है। सरल लोककथाओं में कहा जाता है कि जब अँधकार और शून्य गोल-चक्र जैसा था, तब देवी ने हल्की‑सी मुस्कान की और उसी मुस्कान में एक अण्डाकार ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न हुआ — आकाश, सूर्य, जीवन और ऊर्जा। यह कथा न केवल देवी‑सक्ति की सृजनशक्ति का वर्णन है, बल्कि हिन्दू ब्रह्माण्डदृष्टि में आनंद (आनन्द)‑आधारित रचना, प्रकाश का उदय और जीवितता के स्त्रोत के रूप में देवी की भूमिका को भी रेखांकित करती है। नीचे हम पौराणिक संदर्भ, भाष्यात्मक अर्थ, तात्त्विक व्याख्या और लोक-आचारों के सिद्धांतों को संतुलित व नम्र ढंग से समझने का प्रयास करेंगे।
कथा का पाराम्परिक और साहित्यिक संदर्भ
कठोर ऐतिहासिक डेटिंग देना कठिन है क्योंकि “कुश्मांडा” का स्वरूप अलग‑अलग ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं में अलग तरह से उभरता है। शाक्त परंपरा में देवी सर्वोपरि सृष्टि‑शक्ति (पराशक्ति) मानी जाती हैं और देवी के क्रियाशील रूपों के कई पुराणिक और मंत्रग्रंथीय विवरण मिलते हैं। देवी महात्म्य (या चंडी), देवी भागवत पुराण जैसे ग्रंथों में देवी के सृजन‑विकल्पों के संकेत या महिमा वर्णित हैं; परन्तु “कुश्मांडा ने मुस्कान से ब्रह्मांड बनाया” जैसा लोक-चित्रण मुख्यतः नवरात्रि‑कथाओं, ग्रामीण कथाओं और बाद के समस्यात्मक पुराणपाठों से लोकप्रिय हुआ।
नाम‑व्युत्पत्ति और प्रतीकशास्त्र
कुश्मांडा नाम का सामान्य व्युत्पत्तिशास्त्रीय अर्थ है “कुश” (छोटा/संग्रह) + “अण्ड/आण्ड” (अंडा, ब्रह्माण्ड-अण्ड) — यानी ‘उसने छोटा‑सा ब्रह्माण्ड‑अण्ड बनाया’। दूसरी व्याख्या में इसे ‘कुश’ (हँसी/मुस्कान के सूक्ष्म भाव) से जोड़ा जाता है — यानि मुस्कान से सृजन। हिन्दू कोस्मोगोनी में ब्रह्माण्ड‑अण्ड या हिरण्यगर्भ का विचार वैदिक स्तोत्रों (हिरण्यगर्भसूक्त) और बाद के पुराणों में मिलता है; कुश्मांडा के मिथक को इसी पुरातन आइडिया के शाक्त रूपांतर के रूप में पढ़ा जा सकता है।
मुस्कान का अर्थ: लाक्षणिक और तात्त्विक पढ़ाइयाँ
- आनन्द‑सृष्टि: मुस्कान यहाँ न केवल भावनात्मक हँसी है, बल्कि आनन्द (आनन्द‑स्वरूप शक्ति) का सूचक है। शाक्त दर्शन में सृजन का मूल कारण ‘आनन्द’ ही माना जाता है—देवी की आनन्दरूप प्रकृति ने ही सृष्टि का उद्भव कराया।
- सहजता और अनाहत शक्ति: मुस्कान से सृजन का चित्रण यह बताता है कि सृजन कोई कठिन यज्ञ या संघर्ष न होकर सहज, स्वतःप्रस्फुटित और आलिङ्गनात्मक है—एक लीलात्मक (लीला) प्रक्रिया।
- प्रकाश और जीवनदायिनी ऊर्जा: कई लोककथाओं में कुश्मांडा को सूर्य की सृष्टि का कारण बताया जाता है—उनकी मुस्कान ने प्रकाश उत्पन्न किया। सूर्य‑सम्बन्धी प्रतीकवाद से जुड़ा यह अर्थ जीवन‑शक्ति (प्राण), उर्ज़ा और आरंभ का सूचक है।
दार्शनिक पहलू: सृष्टि कैसे समझी जाती है?
यह मिथक विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों में भिन्न ढंग से पढ़ा जाता है। उदाहरण के लिए:
- शाक्त/तंत्रिक दृष्टि: देवी (आदिञ्च शक्ति) को सर्वस्रष्टा माना जाता है; सृष्टि उनके निर्विकार आनंद या क्रियाशीलता से उत्पन्न होती है। कुश्मांडा का हँसना सर्जन‑सक्ति के सहज उद्भव का प्रतीक है।
- अद्वैत वेदांत: यहाँ सृष्टि को माया या ब्रह्म की लीलानगरी के रूप में देखा जा सकता है; देवी की मुस्कान अस्तित्व की आभासुक भाषा है—श्रव्य रूपक जो ब्रह्म की चिरंतनता और जगत की आभासिता को बताती है।
- वैष्णव और अन्य परंपराएँ: कुछ परंपराएँ रचना के सूत्र को विष्णु‑नारायण या ब्रह्म के क्रिया रूपों से जोड़ती हैं; फिर भी लोकभक्ति में देवी‑कथाएँ देवी‑साक्षात्कार और संरक्षण के स्तर पर जीवित रहती हैं।
आधुनिक समझ और मनोवैज्ञानिक पठान
समकालीन अध्येता मिथक को प्रतीकात्मक, मनोवैज्ञानिक और रीतिगत दृष्टियों से पढ़ते हैं। मुस्कान के रूपक को रचना‑मनोविज्ञान (creative psychology) से जोड़ा जा सकता है: सृजन का मूल प्रेरणा, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा है। धार्मिक अनुष्ठानों में देवी‑मूर्ति की मुस्कान को जीवन में आशा, उजाला और आरोग्य का संकेत माना जाता है।
मूर्तिकला, पूजा‑पद्धति और लोक-आचार
- चित्रण: परंपरागत चित्रों में माँ कुष्मांडा को अक्सर प्रफुल्लित मुख के साथ दिखाया जाता है—कई भुजाएँ, हाथों में अस्त्र‑अलङ्कार, और पीतल/स्वर्ण जैसा आभा। वे शेर या सिंह पर अभिलेखीय रूप से सवार होती हैं।
- नवरात्रि की प्रथा: उत्तर भारत में नवरात्रि के चौथे दिन माँ कुष्मांडा की पूजा होती है; तिथि चंद्र‑कैलेंडर पर निर्भर करती है। इस दिन कुछ स्थानों पर कद्दू (स्थानीय भाषा में ‘कुश्मांडा’ नाम से जुड़ा फल) अर्पित किया जाता है—यह लोककला और शब्दार्थ का सहज मेल है।
- भक्ति‑गान और स्तोत्र: स्तोत्र और गीतों में उनकी मुस्कान‑रूप सृष्टि का गुणगान मिलता है; साधक इन कथाओं के माध्यम से देवी के साथ सम्बन्ध और आश्रय अनुभव करते हैं।
निष्कर्ष — मिथक का तात्पर्य और उपयोगिता
माँ कुष्मांडा की मुस्कान से ब्रह्मांड बनने की कथा ऐतिहासिक रिपोर्ट नहीं बल्कि एक समृद्ध प्रतीकात्मक कथानक है जो सृजन का आनन्द‑आधारित, प्रकाशमय और सहज स्वरूप बताती है। यह शाक्त दृष्टि में देवी की प्रथम सृजन‑शक्ति को व्यक्त करती है; अन्य परंपराएँ इसे विविध दार्शनिक व धार्मिक भाष्यों के साथ जोड़ती हैं। आज भी यह कथा भक्तों को आशा, जीवन शक्ति और देवी‑संरक्षण का अनुभव देती है—यही इसकी प्रमुख आध्यात्मिक उपयोगिता है।