माँ स्कंदमाता अपने गोद में क्यों रखती हैं भगवान कार्तिकेय?
माँ स्कंदमाता के रूप में देवी को भगवान कार्तिकेय अपने गोद में लिए हुए दिखाना हिन्दू धार्मिक कला और उपासना की एक चिरपरिचित छवि है। यह प्रतीक केवल मातृत्व की कोमलता नहीं बल्कि शक्ति, संरक्षा और तेज का संयोजन प्रस्तुत करता है। पौराणिक कथाओं में कार्तिकेय (स्कन्द) का जन्म विशेष प्रयोजन से—दानव तारकासुर का संहार करने हेतु—हुआ; परंतु उसकी उत्पत्ति और पालन‑पोषण की धाराएँ विविध ग्रन्थों और स्थानीय परम्पराओं में अलग‑अलग बताई जाती हैं। नवरात्रि के पाँचवें दिन को समर्पित इस रूप की पूजा में भक्त स्त्री‑जननी और युद्ध कौशल, बुद्धि तथा आध्यात्मिक ऊर्जा के स्रोत के रूप में देवी की महत्ता पर ध्यान लगाते हैं। इस लेख में हम स्कंदमाता की गोद में कार्तिकेय को रखने के ऐतिहासिक, आयकोनोग्राफिक और आध्यात्मिक कारणों को पौराणिक स्रोतों, तात्त्विक व्याख्याओं और लोकविश्वासों के संदर्भ में संयमित रूप से समझने का प्रयास करेंगे। विचार आकलन में स्रोत‑संग्रह की पारदर्शिता को प्राथमिकता देंगे। आपका समय सराहनीय है।
पौराणिक पृष्ठभूमि और विविध कथाएँ
पौराणिक साहित्य में कार्तिकेय का जन्म और पालन‑पोषण कई रूपों में वर्णित है। स्कंद पुराण उस कथा‑परंपरा का प्रमुख ग्रन्थ माना जाता है जो स्कन्द (कार्तिकेय) की लीलाओं और युद्ध‑कहानी का विस्तृत विवरण देता है। कुछ कथाओं के अनुसार शिव की उर्जा या तेज से उत्पन्न हुए बच्चे को अग्नि, गंगा या क्रियाओं के माध्यम से जन्म मिलता है और उसे छह कृत्तिकाओं (आकाश के प्लेयाडेस समूह) द्वारा पाला जाता है, इसलिए नाम कार्तिकेय या शणमुख पड़ता है। इन विविध कथाओं में पार्वती/देवी का स्थान भी केंद्रीय है: वे जन्मदात्री, पोषक और शक्तिदात्री दोनों रूपों में निहित हैं। लोक‑परम्परा और स्थानीय रीति‑रिवाजों में भी यह भिन्नता मिलती है—कहीं देवी माँ सीधे माता के रूप में दर्शायी जाती हैं तो कहीं अनुष्ठानिक रूपों में संतानों की संरक्षक मानी जाती हैं।
आयकोनोग्राफी: गोद में बालक का प्रतिरूप क्या बताता है?
मूर्तिकला और चित्रकला में स्कंदमाता को साधारणतः चार भुजाओं वाली देवी के रूप में, सिंह या शेर पर विराजमान दिखाया जाता है; एक ओर वह कमल (पद्म) धारण करती हैं, तो दूसरी ओर गोद में शिशु स्कन्द/कार्तिकेय होते हैं; एक हाथ से आशीर्वाद दिया जाता है। इस दृश्य की आयकोनोग्राफिक व्याख्या कई स्तरों पर की जाती है:
- मातृत्व और करुणा: गोद का संकेत देवी‑माता की कोमल देखभाल, कृपा और पालन‑पोषण को दर्शाता है। भक्तों के दृष्टिकोण से यह संवेदनशीलता और सुरक्षा का संदेश है।
- शक्ति का स्रोत: शास्त्रीय व्याख्याएँ इस रूप को उस तत्त्व के रूप में देखती हैं जो ऊर्जा (शक्ति) को जन्म देती और संहार‑कार्य के लिए मार्गदर्शित करती है। कार्तिकेय यहाँ लक्षित कार्यकर्ता (वीर) है और देवी उसकी ऊर्जा‑जननी।
- संघर्ष और भक्ति का समन्वय: शिशु योद्धा होने के बावजूद माँ की गोद में होना बताता है कि वीरत्व और आत्मिक संरक्षण दोनों साथ हैं—हिंसा केवल सांसारिक विजय नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए मांगी गई शक्ति भी है।
तात्त्विक और तांत्रिक अर्थ
शाक्त और तांत्रिक विवेचनों में माँ‑गोद और शिशु का प्रतिबिम्ब सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के लिए उपयुक्त माना जाता है। कुछ तांत्रिक व्याख्याएँ कहती हैं कि देवी (शक्ति) आधार (मूलाधार या समग्र सृष्टि‑क्षमता) है और वह वही है जो बीज‑ऊर्जा (बोध, तेज, ओज) को पोषित कर देती है; यह बीज अनेक बार साधक के भीतर जागृत होकर प्रत्यक्षता की ओर अग्रसर होता है। इस दृष्टि में कार्तिकेय ‘सक्रिय ऊर्जा’ या ‘दृष्टि‑बल’ का प्रतीक है जिसे माँ‑शक्ति गोद में रखकर संरक्षित करती और उद्देश्य के अनुरूप काम में लाती है। ऐसे सिद्धांत में माता का गोद अपरिवर्तनीय सुरक्षा का स्थल होता है जहाँ ऊर्जा तैयार होती है और फिर दुनिया में कार्यान्वित होती है।
नैतिक‑आध्यात्मिक संदेश और लोक‑विचार
लोकभक्तिमय परंपराएँ स्कंदमाता को विशेषतः उन भक्तों की कृपा देने वाली मानती हैं जो संतान, बुद्धि, साहस और घर‑परिवार के कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं। नवरात्रि के पाँचवें दिन की पूजा में स्त्रियाएँ और परिवारजन देवी से संतति‑संपन्नता, विद्या और आशीर्वाद की कामना करते हैं। आध्यात्मिक स्तर पर यह छवि एक संतुलित आदर्श भी देती है—शक्ति न केवल विनाश करने वाली है, बल्कि पालने और अर्थपूर्ण उपयोग करने वाली भी है।
समाप्ति और सावधानी
स्कंदमाता की गोद में कार्तिकेय का रूप अनेक स्तरों पर पढ़ा‑समझा जा सकता है—पौराणिक कथा, मूर्तिकला, तात्त्विक गूढ़ता और लोकभक्ति, सभी का समन्वय इसमें मौजूद है। विभिन्न स्कूलों—शैव, शाक्त, स्मार्त और स्थानीय बोलियों—में इसके अर्थ और महिमा के रूप कुछ अलग हो सकते हैं; इसलिए स्रोत‑आधारित व्याख्या और सांस्कृतिक संदर्भ समझना उपयोगी रहता है। पूजा‑अनुष्ठान और आध्यात्मिक अभ्यास करने वालों के लिए यह उपदेश बना रहता है कि शक्ति का स्मरण सहानुभूति और जिम्मेदारी के साथ हो: माँ की गोद में रखा योद्धा सिवाय उद्देश्य के कुछ नहीं है।