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नवरात्रि में पांचवे दिन का रंग क्यों है हरा?

नवरात्रि में पांचवे दिन का रंग क्यों है हरा?

नवरात्रि के रंगों की परंपरा आधुनिक भारत में तेजी से लोकप्रिय हुई है: हर दिन विशेष रंग पहनने की प्रथा ने उत्सव में एक दृश्य अनुशासन और सामूहिकता जुड़ दी है। पाँचवें दिन हरा रंग क्यों चुना जाता है, यह सवाल न केवल लोक संवेदनाओं से जुड़ा है बल्कि देवी-रूपों, ऋतु-चक्र, आध्यात्मिक प्रतीक और क्षेत्रीय प्रथाओं के मिलन का परिणाम भी है। शास्त्रों में रंगों की अनिवार्य सूची आमतौर पर नहीं मिलती, फिर भी लोकधर्म और सामुदायिक रीतियों ने अर्थनिर्माण कर दिया है। इस लेख में हम विविध परंपराओं को सटीकता के साथ प्रस्तुत करेंगे, स्कंदमाता (पाँचवें दिन की पारंपरिक देवी) से हरे रंग के प्रतीकात्मक संबंधों, हृदय-चक्र और कृषि-ऋतु के संदर्भों तक के तर्कों को देखेंगे, तथा बताएंगे कि क्यों यह प्रथा क्षेत्र और समुदाय के अनुसार बदलती रहती है। उद्देश्य है समझ देना — निर्णायक नहीं, बल्कि विवेचनात्मक और संवेदनशील रेखांकन।

रिवाज़ों का विविध स्वरूप

सबसे पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि नवरात्रि‑रंगों की आज प्रचलित सूची एक अख्तियारी, लोक-और-व्यावसायिक संयोग है, न कि किसी एक शास्त्रीय निर्देश का प्रत्यक्ष अनुवर्त्तन। गुजरात में गरबा‑घोषणाओं के साथ अलग‑अलग रंगों की सूची लोकप्रिय है; महाराष्ट्र और उत्तर भारत की कई सार्वजनिक व सामाजिक समूहों ने अपने अनुकूल रंगतालिका अपनाई है। इन सूचियों में मतभेद सामान्य हैं — इसलिए यह कहना कि “पाँचवाँ दिन हमेशा हरा होता है” सर्वमान्य सच नहीं होगा।

स्कंदमाता और हरे रंग का जुड़ाव

पौँचवें दिन की पारंपरिक देवी स्कंदमाता हैं — स्कंद के, अर्थात् कार्तिकेय के माता। उनके आंचल में शिशु को धारण किए होने का जो चित्र मिलता है, वह मातृत्व, पोषण और जीवन‑रक्षा की प्रतिमा है। हरा रंग पारंपरिक रूप से जीवन, वृत्ति, प्रजनन और हरितता का प्रतीक रहा है। इसलिए कुछ पंडितों और भक्तों के लिए स्कंदमाता के साथ हरे का चयन तात्विक रूप से समझ में आता है — हरा माँ के पोषण, वनस्पति और जीवनचक्र से मेल खाता है। यह व्याख्या लोककथात्मक और रूपक‑आधारित है और इसे अनेक पारंपरिक पुजारियों-भक्तों द्वारा स्वीकार किया जाता है।

हृदय‑चक्र, संतुलन और आध्यात्मिक अर्थ

आध्यात्मिक-मानचित्रों में रंगों का प्रयोग चक्र‑वाणियों के माध्यम से भी किया गया है। आयुर्वेदिक‑तथ्य या योग‑विवरणों में हरा अक्सर हृदय चक्र (अनाहत) से जुड़ा बताया जाता है, जो प्रेम, करुणा और संतुलन‑भाव का केन्द्र माना जाता है। नवरात्रि जैसी देवी उपासना में पाँचवाँ दिन मध्य‑दिन या केंद्र के समान होता है — इसलिए कुछ विचारक इसे हृदय‑स्थिरता और प्रेम की प्रतीकात्मकता से जोड़ते हैं। यह व्याख्या वेदांतिक या पुराणिक आदेश नहीं कहेगी पर मंत्र‑अनुभूति और तान्त्रिक मनोविज्ञान में प्रयुक्त होती है।

ऋतु, कृषि और हरियाली का संदर्भ

नवरात्रियाँ दो प्रकार की आती हैं: चैत्र (वसन्त) और शारदीय (शरद)। चैत्र नवरात्रि वसन्त के समीप आती है जब प्रकृति नवीन हरियाली से समृद्ध होती है; शारदीय नवरात्रि षट्‑ऋतु परिवर्तन के बाद होती है और क्षेत्रीय कृषि‑चक्रों के अनुसार भी हरी उपज या फसल‑छुटनी का समय बदलता है। कई ग्रामीण और कृषि‑समुदायों में हरा रंग उपज, उर्वरता और धन के साथ जुड़ा होता है — इसलिए उस दिन हरा पहनना या देवी को हरे वस्त्र से सजीव करना शुभ माना जाता है। यह अर्थशास्त्रीय और पारिस्थितिक दृष्टि से समकालीन समझ को भी दर्शाता है।

शास्त्रीय संदर्भों की सादगी: क्या शास्त्रों ने रंग बता दिए हैं?

किसी प्रमुख पुराण, धर्मशास्त्र या तन्त्रग्रन्थ में यह रेखांकित करने वाला प्रमाणिक निर्देश नहीं मिलता कि नवरात्रि के हर दिन कौन‑सा रंग पहना जाए। देवी‑उपासना की विधियाँ, मन्त्र‑सूची और प्रतिमा‑पूजा लगभग सारे शास्त्रों में विस्तृत हैं, लेकिन दैनिक रंगनिर्देशों का उल्लेख लोकपरंपरा के स्तर पर विकसित हुआ। अतः व्यावहारिक निष्कर्ष यही है कि रंग‑प्रथा शास्त्रीय आदेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक मुद्रण और क्षेत्रीय रीति‑रिवाजों की उत्पादकता है।

सामुदायिक और व्यावसायिक प्रभाव

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में समाजशास्त्रीय परिवर्तनों, शहरीकरण और मीडिया‑विपणन की वजह से रंग‑प्रथा और अधिक मानकीकृत हुई। बड़े‑बाजारों और कपड़ा उद्योग ने विशेष “नवरात्रि‑रंग पैकेज” प्रचारित किए, तथा सामाजिक आयोजनों ने एक जैसा पहनावा अपेक्षित कर दिया। यह परिवर्तन पारंपरिक अर्थों पर आधारित तो है, पर इसकी मजबूती का मूल कारण सामूहिक रस्म और दृश्य एकता की इच्छा भी रही है — जो सामाजिक पहचान और त्योहार की दृश्यता बढ़ाती है।

कैसे समझें और अपनाएँ—कुछ सुझाव

  • परंपरा को समझें: यदि आपका समुदाय या परिवार पाँचवें दिन हरा पहनने की प्रथा निभाता है, तो वह स्थानीय अर्थ और भाव से जुड़ी रहती है — उसका मान रखें।
  • आध्यात्मिक अर्थ खोजें: हरे का चयन कर आप स्कंदमाता के मातृत्व, हृदय‑करुणा और जीवन‑ऊर्जा के आयामों को अनुकूल कर सकते हैं।
  • लचीलापन स्वीकारें: शास्त्रीय अनिवार्यता नहीं है; अगर आप किसी अन्य रंग से अधिक सहज महसूस करते हैं तो वह भी स्वीकार्य है।
  • संवाद बनाएँ: युवा पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच रंग‑परंपरा के अर्थ पर बातचीत त्योहार को समृद्ध बनाती है।

निष्कर्ष

पाँचवे दिन हरा रंग पहनने की प्रथा एक मिश्रित कारणों का परिणाम है: स्कंदमाता के मातृत्व‑प्रतीक, हृदय‑करुणा की आध्यात्मिक व्याख्या, कृषि‑ऋतु से जुड़ी प्रतीकात्मकता और आधुनिक सामुदायिक मनोविज्ञान — इन सबका समवेत रूप। किसी एक शास्त्रीय आदेश पर यह आधारित नहीं है, बल्कि लोकपरंपरा और समय के साथ बने सामजिक अभ्यास ने इसे पुष्ट किया है। विविधता का सम्मान करते हुए, हर भक्त या समुदाय अपनी समझ के अनुसार इस प्रथा को अपनाए या न अपनाए, दोनों ही मार्ग पर धार्मिक वैधता है।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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