माँ स्कंदमाता को शांति और समृद्धि की देवी क्यों कहा जाता है?
माँ स्कंदमाता—कार्तिकेय/स्कन्द के रूप में विख्यात देवता के जननी रूप—हिंदू धार्मिक कल्पना में एक स्नेहपूर्ण, मातृगत शक्ति हैं जिनको अक्सर शांति और समृद्धि की देवि कहा जाता है। यह संज्ञा केवल भक्तिमय बयान नहीं है, बल्कि उनकी प्रतिमूर्ति, अनुष्ठानिक भूमिका और धार्मिक व्याख्याओं का परिणाम है। मां के रूप में वे सुरक्षा, पोषण और जीवन दीप्ति का प्रतीक हैं; वहीं मातृत्व से जुड़ा संरक्षण भय, असहायता और सामाजिक अशांति को कम कर शांतिपूर्ण जीवन का आधार देता है। सामूहिक और पारिवारिक जीवन में उनकी उपासना आर्थिक और सामाजिक सुदृढ़ता की आकांक्षा से जुड़ती है—यानी जिस तरह एक माँ संतान के विकास के लिए संसाधन, पालन-पोषण और मार्गदर्शन देती है, उसी प्रकार स्कंदमाता को भौतिक तथा मानसिक समृद्धि देने वाला माना जाता है। नीचे इन दावों के ऐतिहासिक, प्रतीकात्मक और अनुष्ठानिक आधारों का संक्षेप में विश्लेषण दिया गया है।
धार्मिक-पारंपरिक संदर्भ
स्कंदमाता पारम्परिक रूप से देवी के नवरात्रि में पूजित नौ रूपों (नवदुर्गा) में पाँचवीं देवी मानी जाती हैं और उनकी पूजा विशेषकर पाँचवीं तिथि पर की जाती है। कई शक्तिशास्त्रीय और पुराणिक परंपराओं—जैसे देवी महात्म्य (जो मार्कण्डेय पुराण का भाग है), देवीभागवतम् और स्थानीय पुराण—में उन्हें पार्वती/दुर्गा का एक मातृरूपी आविर्भाव माना जाता है। इन ग्रंथों और लोकआस्थाओं में वे माँ के समग्र गुण: सुरक्षा, स्नेह तथा विजयप्राप्ति में समर्थ बताई जाती हैं; इसलिए शांति और समृद्धि देने वाली शक्ति के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बनी। हालांकि विभिन्न शैव, वैष्णव और शाक्त पाठों में उनकी व्याख्या भिन्न-भिन्न हो सकती है—कुछ जगह वे विशुद्ध मातृत्व पर ज़ोर देती हैं, कुछ में युद्धविजय के साथ संतानोत्पत्ति का भी अर्थ जुड़ा पाया जाता है।
प्रतीकवाद: क्यों शांति?
- मातृत्व और आसरा: माँ का स्वरूप आत्मिक शरण देता है—भय कम होता है और आन्तरिक शान्ति बढ़ती है। स्कंदमाता का शिशु स्कन्द/कार्तिकेय को गोद में धारण किए रहना इस मातृत्व-आश्रय का स्पष्ट संकेत है।
- निर्वाह और संरक्षण: देवी का संरक्षण सामाजिक अनिश्चितताओं और पारिवारिक संकटों में स्थिरता लाता है; पारंपरिक समाज में ऐसी मातृरक्षा को शांति का आधार माना जाता रहा है।
- धार्मिक अनुष्ठान: उनके स्तोत्र, जप और पूजा में मन की एकाग्रता, पापशमन और मानसिक शुद्धि पर बल दिया जाता है—ये सभी शांति के साधन माने जाते हैं।
प्रतीकवाद: क्यों समृद्धि?
- जनकता और उत्कर्ष का चिन्ह: माँ के रूप में स्कंदमाता जनन-शक्ति, पालन-पोषण और विकास की ऊर्जा देती हैं—जो भौतिक समृद्धि और सामाजिक उन्नति का रूपक है।
- विजय और संसाधन वृद्धि: स्कन्द/कार्तिकेय युद्ध और विजय के देवता हैं; उनकी माँ के रूप में स्कंदमाता की उपासना से पारिवारिक सुरक्षा और सामरिक/आर्थिक सफलता की कामना जुड़ी रही है।
- आदर्श जीवन-नीति: भक्तों के लिए उनकी पूजा मनोबल बढ़ाती, कर्मठता और धैर्य प्रदान करती है—ऐसे गुण आर्थिक समृद्धि और सामाजिक स्थायित्व के व्यावहारिक आधार हैं।
दर्शन और प्रतिमूर्ति (आइकनोग्राफी)
स्कंदमाता की परंपरागत प्रतिमा में अक्सर उन्हें कमल पर मंडराते या सिंह पर विराजमान दिखाया जाता है, गोद में शिशु स्कन्द विराजमान रहता है, और वे दो या चार भुजाओं में कमल, वरदानमुद्रा आदि धारण करती हैं। कमल शुद्धता व आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक है; सिंह (या जंगली वाहन) साहस और सामर्थ्य का; और शिशु गोद में होना स्नेह, पालन और भावी वृद्धि का संकेत। इन प्रतीकों का समन्वय बताता है कि शान्ति (मनोवैज्ञानिक/सामाजिक) और समृद्धि (आर्थिक/आध्यात्मिक) दोनों ही उनकी कृपा से प्राप्त हो सकती हैं।
उपासना, तिथि और लोक-रिवाज
- परंपरागत रूप में स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पाँचवे दिन (पंचमी) की जाती है; कई गृहस्थ और विधिवत् अनुष्ठान इस दिन समर्पित होते हैं।
- भक्त स्तोत्र, जप और दीप-पूजा करते हैं; कुछ प्रथाओं में विशेष भोग—फल, पुष्प, मिश्री इत्यादि—अर्पित किए जाते हैं।
- लोककथाओं और ग्रामीण रीतियों में नवविवाहितों, गर्भवती माताओं या परिवार की समृद्धि की कामना हेतु उनकी विशेष आराधना देखी जाती है।
विविध व्याख्याएँ और सतर्कता
यह ध्यान देना आवश्यक है कि “शांति” और “समृद्धि” की व्याख्याएँ सांस्कृतिक और वैचारिक मतानुसार भिन्न होती हैं। कुछ शाक्तों के लिए यह निहितार्थ आध्यात्मिक विमोचन और शक्ति-साक्षात्कार है; कुछ लोकपरंपराओं में इसका तात्पर्य पारिवारिक सुख-समृद्धि और सुरक्षा से है। ग्रंथात्मक प्रमाणों और स्थानीय उपासना-प्रथाओं में भी अतährungen दिखाई देता है—इसलिए विशिष्ट दावे करते समय पाठ्यसंदर्भ और स्थानीय परंपरा का उल्लेख आवश्यक है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, माँ स्कंदमाता को शांति और समृद्धि की देवी इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनकी मातृछवि और प्रतीकात्मकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक आश्रय तथा सामाजिक-आर्थिक उत्कर्ष के गुणों को एक साथ दर्शाती हैं। पुराणिक और लोकधार्मिक परंपराएँ उन्हें एक ऐसी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं जो भय और अभाव को मिटाकर परिवार और समाज में स्थिरता और विकास लाती है। अलग-अलग सम्प्रदायों और व्याख्याओं में इसका स्वरूप बदल सकता है, पर मूलतः उनकी माँ-प्रकृति ही उन गुणों का आधार है जिनसे भक्त शान्ति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।