माँ कात्यायनी को ‘महिषासुर मर्दिनी’ क्यों कहा जाता है?
माँ कात्यायनी को ‘महिषासुर मर्दिनी’ क्यों कहा जाता है—यह प्रश्न केवल नाम का अनुवाद नहीं है, बल्कि हिंदू धर्म में देवी के रूपों, पुराणिक कथाओं और प्रतीकात्मक व्याख्याओं के जटिल नेटवर्क को समझने का मार्ग भी खोलता है। संक्षेप में कहा जाए तो कात्यायनी, दुर्गा के नौ रूपों में छठी देवीं के रूप में प्रतिष्ठित हैं; वहीं “महिषासुर मर्दिनी” वह सामान्य शीर्षक है जो उस देवी को दिया जाता है जिसने महिषासुर (भैस के रूप का दानव) का संहार किया। विभिन्न ग्रंथ, क्षेत्रीय परंपराएँ और पूजा पद्धतियाँ इन दो नामों को कभी अलग, कभी समान रूप से पढ़ती हैं। नीचे हम ग्रंथीय संदर्भ, ऐतिहासिक-आइकॉनिक संकेत, तात्त्विक अर्थ और समकालीन भक्ति परम्पराओं के मद्देनजर व्यवस्थित रूप से बताते हैं कि कात्यायनी को यह उपाधि क्यों मिली और किन मायनों में इसे समझा जाता है।
ग्रंथीय और परंपरागत स्रोत
देवी की महत्त्वपूर्ण परंपरागत कथा देवि-महात्म्य (जो मार्कण्डेय पुराण का भाग है) में विस्तृत है; वहां देवी का रूप दुर्गा/चण्डी/महिषासुरमर्दिनी के रूप में वर्णित है जिसने महिषासुर का विनाश किया। विद्वानों का संकलन इस पाठ को प्राचीन शैव और शाक्त परंपराओं के मेल का उदाहरण मानता है (रचनाकाल के अनुमान 4वीं–6वीं शताब्दी ई. के बीच)। वहीं कात्यायनी का नाम और रूप समुद्र पुराणों, कुछ पौराणिक कथाओं और लोककथाओं में मिलता है: परम्परागत रूप से कहा जाता है कि उन्होंने ऋषि कात्यायन/कात्यायन के तप से उत्पन्न होकर कार्य किया — इसीलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। नवरात्रि में छठे दिन की आराधना और स्कन्द पुराण, पद्म पुराण आदि में नवरूपों का उल्लेख मिलता है; इन परंपराओं में कात्यायनी को सक्रिय, युद्धरत देवी और विवाहप्रदान करने वाली शक्ति के रूप में पूजनीय बताया गया है।
आइकॉनोग्राफी और उपाधि का मेल
महिषासुरमर्दिनी का पारंपरिक चित्रण सुशक्त: सिंह/वाघ पर संवारकर अनेक भुजाएँ और हाथों में अस्त्र-शस्त्र, और अंततः महिषासुर को पकड़े या शिर पर वार करते हुए देवी। कात्यायनी के चित्रों में भी अक्सर देवी को सिंह वाहन पर, कमर से ऊपर सज-धज और दो या चार भुजाओं में शस्त्र, कमल आदि दिखाई देते हैं। इसलिए विजुअल समानता के कारण लोक-भक्ति में इन दोनों की पहचान स्वाभाविक हुई। कई क्षेत्रों में स्थानीय कात्यायनी मंदिरों में महिषासुर-वध की कथा भी सुनाई जाती है या देवी की मूर्ति पर वही दृश्य अंकित मिलता है — इस दृष्टिगत से कात्यायनी को महिषासुरमर्दिनी कहा जाना व्यावहारिक और भक्ति-आधारित समरूपता है।
दर्शनात्मक और प्रतीकात्मक अर्थ
शक्तिवाद (शाक्त) परंपरा में देवी के कई नाम और रूप हुए हैं, पर सभी अन्ततः परा-शक्ति के विभिन्न अवतरण माने जाते हैं। इस दृष्टि से, कात्यायनी और महिषासुरमर्दिनी दोनों उसी महाशक्ति के रूप हैं — इसलिए उपाधियाँ साझा होना सामान्य है। प्रतीकवाद में महिषासुर जिनेह (भैस) रूप में काम, अहंकार, माया या अज्ञान का प्रतिरूप माना जाता है; देवी का उसका संहार आध्यात्मिक मुक्ति, धर्म की पुनर्स्थापना और सामाजिक-नैतिक अनुशासन के रूपक हैं। कुछ वैकल्पिक पढ़ाइयों में महिषासुर का सामाजिक-पॉलिटिकल अर्थ भी जोड़ा गया है — बलपूर्वक सत्ता, असंयमित हिंसा या अन्याय के रूप में।
सांस्कृतिक विविधता: अलग-अलग परम्पराओं की व्याख्याएँ
– कुछ पौराणिक-स्थानिक परंपराएँ कात्यायनी को विशिष्ट कथागत जन्म और कार्यभूमि के साथ पहचानती हैं (ऋषि कात्यायन की तपस्या से उत्पन्न)।
– देवी महिषासुरमर्दिनी का वर्णन प्रमुखतः देवी-महत्म्य में मिलता है; वहां उनका नाम “दुर्गा/चण्डी” अधिक प्रभावी है और महिषासुर-वध का विस्तृत वर्णन है।
– शाक्त धर्मशास्त्र और लोकभक्ति दोनों में नामों का आपस में विलय और स्थानियकरण सामान्य है — इसलिए कुछ स्थानों पर कात्यायनी को विशेष रूप से महिषासुर का संहारकर्ता मान लिया गया।
त्योहार, अभ्यास और सामयिक प्रासंगिकता
नवरात्रि (विशेषकर शारदीय नवरात्रि) में छठे दिन की आराधना कात्यायनी को समर्पित है; वहीं दशमी/विजया दशमी और बंगाल/पूर्वी भारत में मनाई जाने वाली दुर्गापूजा में महिषासुरमर्दिनी की कथा केंद्रीय है। भक्ति-गीत, स्तोत्र (जैसे महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र/दुर्गा श्लोक), और नाट्य-प्रदर्शन इन रूपों को जीवंत रखते हैं। समकालीन चिंतन में ये कथाएँ सामाजिक अखण्डता, स्त्री शक्ति (Shakti) और अत्याचार के विरुद्ध एकता की प्रेरणा देती हैं—पर पाठन करते समय यह भी याद रखा जाता है कि विभिन्न समुदायों में इन मिथकों का उपयोग विभिन्न राजनीतिक-आधारों पर हुआ है, अतः व्याख्या संवेदनशील और सन्दर्भगत होनी चाहिए।
निष्कर्ष (विनम्र सार)
अंततः कात्यायनी को ‘महिषासुर मर्दिनी’ कहा जाना धार्मिक-आइकॉनिक समानता, ग्रंथीय संदर्भों का आंशिक मेल और व्यापक शाक्त तत्त्ववाद की एक सहज परिणति है। पाठ्य और भक्ति दोनों स्तरों पर ये नाम एक दूसरे के पूरक हैं: एक तरफ कात्यायनी का स्थानीय और विधानबद्ध व्यक्तित्व, और दूसरी ओर महिषासुरमर्दिनी का महाकाव्यात्मक विजय-चित्र। दोनों पढ़ाइयाँ देवी की बहुमुखीता और शक्ति के उस पहलू को उजागर करती हैं जो अन्धकार-व्याधि के विरुद्ध खड़ी होती है—चाहे वह अहंकार रूपी महिष हो या सामाजिक अन्याय। विविध परंपराओं का सम्मान करते हुए कहा जा सकता है कि नाम भिन्न हो सकते हैं, पर साधना और अर्थ अक्सर एक ही स्रोत, परा-शक्ति, से प्रवाहित होते हैं।