नवरात्रि में अष्टमी पर कन्या पूजन का रहस्य
नवरात्रि की अष्टमी पर होने वाला कन्या पूजन—जिसे कुछ जगहों पर कुमारी पूजन या कंज़क पूजा कहा जाता है—सिर्फ एक लोकरीति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक धार्मिक–सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है जिसमें नारीतत्त्व (शक्ति) की मान्यता, सामाजिक आदर और सामुदायिक दायित्व मिलकर उभरते हैं। अक्सर शारदीय नवरात्रि की अष्टमी (महा-अष्टमी) को देवी शक्तिमान दिवस माना जाता है और उसी दिन बालिकाओं को देवी का रूप मानकर पूजित किया जाता है। इस प्रथा के पीछे कई स्तर हैं: पौराणिक, अनुभवात्मक और नैतिक — जहाँ देवी को विराट ताकत के रूप में देखा जाता है, वहीं स्थानीय समाज में बालिकाओं की सुरक्षा, पोषण और शिक्षा पर ध्यान आकर्षित करने का भी व्यवहारिक आयाम है। इस लेख में हम ऐतिहासिक संदर्भ, तीर्थकालिक महत्त्व, विधि‑विवरण और समकालीन चिंताएँ संयमित और स्रोत‑समर्थित तरीके से देखेंगे, साथ ही विभिन्न परंपराओं में पाई जाने वाली विविधताओं का सम्मान करेंगे।
ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि
पौराणिक साहित्य में देवी‑पूजा और शक्ति‑समीकरण का सबसे विस्तृत ग्रन्थ ‘देवी‑माहात्म्य’ (जो मार्कण्डेय पुराण का हिस्सा है) है; इसमें देवी के रूपों, अभियान और स्तवन का विस्तृत वर्णन मिलता है। हालांकि कन्या पूजन के समुचित विधि‑विवरण सभी पुराणों में सुव्यवस्थित रूप से नहीं मिलते, पर शाक्त परंपरा में कन्या‑कुमारी को अव्यक्त शक्ति का एक जीवंत रूप माना जाना पुरानी मान्यताओं से जुड़ा हुआ है।
अष्टमी का विशेष महत्त्व
शारदीय नवरात्रि में अष्टमी विशेष रूप से तात्कालिक शक्ति‑संघर्ष और विजय का प्रतीक है—पौराणिक कथाओं में माता ने महिषासुर सहित दुष्टों का नाश अष्टमी/नवमी के आसन्न‑समय में किया। इसलिए अष्टमी को महा‑अष्टमी कहा जाता है और यही दिन कन्या पूजन के लिए शुभ माना जाता है। खगोलीय आधार पर अष्टमी वह तिथि है जब चंद्र माह के आठवें दिन (तिथियों का गणना स्थानानुसार भिन्न हो सकती है) देवी‑व्रत का प्रभाव सर्वाधिक माना जाता है; इसलिए पूजन का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार निश्चित करना चाहिए।
कन्या पूजन के प्रतीक और अर्थ
- शक्ति‑स्वीकार: बालिकाओं को देवी का रूप मानकर पूजना शाक्त दर्शन के अनुसार अनाकार शक्ति के मानव रूप में श्रद्धा दर्शाता है।
- समर्थन और सुरक्षा: परंपरागत सामाजिक संदर्भ में यह विवाह‑पूर्व या बालिकाओं के सम्मान का सार्वजनिक प्रमाण था—आज यह शिक्षा और कल्याण की आवश्यकता की याद दिलाता है।
- सामुदायिक साझेदारी: सामूहिक भोज, दान और आतिथ्य से समुदाय में परस्पर उत्तरदायित्व और दया की भावना को बल मिलता है।
- रूपक अर्थ: ‘कन्या’ कभी‑कभी ब्रह्मचर्य की रक्षा, पवित्रता और पुनर्जन्म की संभावनाओं के प्रतीक के रूप में भी ली जाती है।
कन्या पूजन — सामान्य विधि (एक सामान्य रूपरेखा)
- तिथि और समय: स्थानीय पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि की अष्टमी या महा‑अष्टमी की शुभ तिथि व मुहूर्त का निर्धारण।
- आयोजन: साफ‑सुथरा स्थान; कमल, पुष्प और रंगोली/दीप से सजावट।
- कन्याओं का चयन: आयु‑सीमा पर समुदायों में विविधता है—कुछ 2–10 वर्ष, कुछ 0–16 तक चुनते हैं; सहमति, स्वच्छता और बच्चों की सुविधा का विशेष ध्यान आवश्यक है।
- पूजा‑क्रिया: संकल्प, आरती/दीप जला कर स्वागत, जल से पाद‑पुत्र धोकर पुण्यदान—अरघ्य और पुष्प अर्पण; देवीस्तोत्र या दुर्गा चालीसा/दुर्गा‑सप्तशती के अंश का पाठ (परम्परा के अनुसार)।
- भोजन और दान: नैवेद्य (भोजन) परोस कर कन्याओं को आशीर्वाद लिया जाता है; सांकेतिक रूप में वस्त्र, मिठाई, अक्षता और दान (डक्शिना) दिया जाना आम है।
- समापन: सामुदायिक भोजन (भोज) और जरूरतमंदों के लिए अतिरिक्त अनुदान की व्यवस्था—अधिक महत्त्वपूर्ण सामाजिक आयाम यह है कि सामूहिक दान सतत कल्याण में बदले।
क्षेत्रीय विविधताएँ
- बंगाल: कुमारी पूजन सबसे जीवंत रूप में होता है; दुर्गा पूजा के दौरान बालिकाओं को देवी का रूप मानकर विशेष विधि से पूजा किया जाता है।
- नेपाल और उत्तर‑पूर्व: कुमारी परंपरा—कुछ स्थानों पर ‘लिविंग देवी’ की परम्परा मिली हुई है; यह संरचनात्मक भिन्नताओं को दर्शाती है।
- उत्तर भारत: ‘कंजन’ या ‘कन्या पूजन’ नाम से अष्टमी पर अधिकतर घरों में अधिकारी विधि से बालिकाओं को बुलाया जाता है।
- दक्षिण भारत: नवरात्रि के दौरान अलग‑अलग रूपों से कन्या पूजन होता है; कुछ स्थानों पर गुड़ या विशेष व्यंजन परोसे जाते हैं और सामुदायिक भोग रखा जाता है।
आधुनिक चेतना‑मुद्दे: नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व
समकालीन आलोचना और सुधार दोनों मौजूद हैं। कुछ चर्चाएँ यह उठाती हैं कि विधि को सिर्फ अनुष्ठानिक दिखावे तक सीमित न रखा जाए—कन्याओं की शिक्षा, स्वास्थ, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक सम्मान पर भी ठोस कदम उठाए जाएँ। बाल अधिकारों की दृष्टि से सहमति, गोपनीयता और बच्चों का आदर अनिवार्य है। पर्यावरण‑सचेत पूजन (कम प्लास्टिक, पौधरोपण, और आवश्यकता अनुसार कम प्रसाद) और दान को सतत परियोजनाओं‑जैसे छात्रवृत्ति/स्वास्थ्य सुविधाओं में लगाना अधिक प्रभावशाली माना जाता है।
निष्कर्ष
नवरात्रि की अष्टमी पर कन्या पूजन एक बहुस्तरीय परंपरा है जो देवत्व की मान्यता, सामुदायिक जुड़ाव और सामाजिक जिम्मेदारी को जोड़ती है। शास्त्रीय‑दृष्टि में इसे शक्ति‑प्रार्थना की अनुभूति कहा जा सकता है; लोक‑विवर्तन में यह बालिकाओं और समुदाय के कल्याण का अवसर बन चुका है। परंपरा को मानते हुए भी आधुनिक मूल्यों—बाल‑हित, सहमति और दीर्घकालिक सामाजिक निवेश—को समाहित करना तभी उपयुक्त होगा जब पूजा का उद्देश्य केवल अनुष्ठानिक पूर्ति न रहकर जीवन के ठोस रूपांतरण में बदल जाए।