Diwali 2025 Lakshmi Puja: रात में इस एक शुभ मुहूर्त पर ही करें लक्ष्मी पूजन, जानें सामग्री लिस्ट और संपूर्ण विधि, ये गलती करने से बचें
दीपावली की रात पर लक्ष्मी पूजन घर-घर में समृद्धि और आध्यात्मिक शुद्धि का अवसर होता है। परम्परागत रूप से यह पूजन कार्तिक मास की अमावस्या (अमावस्या तिथि) की रात्रि को किया जाता है। कई पंक्तियों में मनाया जाने वाला यह आयोजन केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं है; सही तिथि‑तिथि (तिथि), शुभ मुहूर्त और विधिपूर्वक संकल्प से यह धार्मिक तथा सामाजिक अर्थ और अधिक स्पष्ट होता है। नीचे दी गई सलाहें आधुनिक और पारंपरिक दोनों दृष्टि से उपयोगी हैं—पर ध्यान रहे कि मुहूर्त और तिथि स्थानान्तरित होते हैं, इसलिए अंतिम निर्णय के लिए अपने स्थानीय पंचांग या जानकार पुरोहित से पुष्टि करें। मैं यहाँ सामान्यत: मान्य सिद्धांत, आवश्यक सामग्री, संपूर्ण पूजा‑विधि और उन सामान्य गलतियों का उल्लेख कर रहा/रही हूँ जिनसे बचना चाहिए।
कौन-सा शुभ मुहूर्त (सारांश और सावधानी)
मूल सिद्धांत: परंपरा के अनुसार लक्ष्मी पूजन कार्तिक अमावस्या (Diwali की रात) की रात्रि में किया जाता है, और मुख्य अपेक्षित शर्त यह है कि पूजन उस समय किया जाए जब अमावस्या तिथि नष्ट न हुई हो — अर्थात् अमावस्या तिथि रात्रि में जारी हो। अधिकांश पञ्चाङ्गों में यह रात्रि‑अवधि सूर्यास्त के बाद से मध्यरात्रि तक या तिथि के समाप्ति‑समय तक मानी जाती है।
व्यावहारिक सलाह: अमावस्या की तिथि और स्थानीय सूर्यास्त/उदय के कारण मुहूर्त शहर‑शहर बदलता है। इसलिए विशेष मुहूर्त (घंटा‑घंटा) के लिए अपने स्थानीय पंचांग या पुजारी से मुहूर्त अवश्य लें। सामान्य रूप से यदि अमावस्या तिथि रात्रि में विद्यमान हो तो शाम‑रात्र (सूर्यास्त के बाद‑मध्यरात्रि तक) का समय उपयुक्त माना जाता है; कुछ परम्पराओं में रात्रि के प्रथम हिस्से (संध्या‑काल) को विशेष शुभ मानते हैं।
लक्ष्मी पूजन की सामग्री सूची
- आसन/चौकी: स्वच्छ कपड़ा या लकड़ी की चौकी
- मूर्ति/छवि या चित्र: देवी लक्ष्मी और गणेश की
- दीपक: घी या तेल का दीप, अगर संभव हो तो घी
- अर्पण सामग्री: फूल, गुलाल/कुमकुम, हल्दी, चावल, नैवेद्य (मिठाई, फल, तैयार पकवान)
- धुप, अगरबत्ती, कपूर, नैवैद्य के लिए पात्र
- नव वस्त्र, एंकल/मनी‑बॉक्स (अगर अर्पित कर रहे हों)
- नोट/सिक्के और छोटी थाली दान हेतु
- पंचोपचार के लिए चन्दन, अक्षत (चावल), जल, त्रिफला/गंगाजल
- लघु दीपक/रांगोली के रंग
पूजा विधि — संपूर्ण सरल क्रम
- स्वच्छता और सजावट: घर और पूजा‑स्थान को साफ करें, दरवाज़ों पर रंगोली और दीपक रखें। घर में धन‑कोण (मुख्य द्वार के पास) तथा पूजा‑घर की सफाई प्राथमिक होती है।
- संकल्प: मुहूर्त देखकर स्थान, समय और अपनी जाति/परिवार का संकल्प लें। संकल्प में नाम, वर्ष और उद्देश्य (परिवार की समृद्धि, सुख‑शांति) स्पष्ट बोलें।
- घोषणा और ध्यान: गणेश और लक्ष्मी को आनन्दपूर्वक आमंत्रित करें—पहले गणेश वंदना (विघ्न हरण हेतु), फिर लक्ष्मी‑आवाहन करें।
- अर्पण (पञ्चोपचार): चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य क्रम से अर्पित करें। लाल/पीले रंग का वस्त्र या मकान के लिए लाल धागा देने की प्रथा कुछ स्थानों में प्रचलित है।
- मंत्रोचार और स्तुति: छोटे मंत्र जैसे — ॐ गं गणपतये नमः और ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः का जाप कर सकते हैं; यदि संभव हो तो लक्ष्मी‑सहस्रनाम या श्लोक पढ़ें।
- दीपारती और दान: दीप दिखाकर आशीर्वाद लें और घर में उपयोगी वस्तुओं का, विशेषतः ज्ञान/धन से जुड़ी वस्तुओं का दान करें।
- समापन: प्रणाम, प्रसाद वितरण और आवश्यक समर्पण (दक्षिणा) के साथ पूजन समाप्त करें।
संक्षेप में मंत्र और संकल्प के उदाहरण
- संकल्प (संक्षेप): “मम/हम् (नाम) … वर्षे … स्थान पर आज कार्तिक अमावस्या‑तिथौ लक्ष्मीपूजन संकल्प करामि।”
- गणेश मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः
- लक्ष्मी मंत्र (सरल): ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
ऐसी गलतियाँ जिनसे बचें
- तिथि/मुहूर्त की अनदेखी: जो सबसे सामान्य त्रुटि है—अमावस्या तिथि समाप्त होने पर पूजन न करें; तिथि‑स्थिति जाँचें।
- अपवित्र स्थान: पूजा से पहले स्थान की सफाई और शुद्धि न करना।
- बेले‑बेला दान का अभाव: परम्परा में दान का विशेष महत्व है; केवल पूजा कर लेना और दान न करना संतुलित नहीं माना जाता।
- निराधार मंत्र या प्रतिस्थापन: पुरोहित/ग्रंथानुसार मंत्रों का उच्चारण और अर्थ समझकर करें; अनावश्यक बदलाव से अर्थ बदल सकता है।
- धार्मिक असम्मान: पूजा के समय तेज‑शोर या अशुद्ध खाद्य‑पदार्थ का सेवन आस-पास न करें।
वैचारिक विविधता और समापन‑सलाह
शाक्त परम्पराओं में लक्ष्मी को महाशक्ति के रूप में देखा जाता है और मंत्र‑विधि अधिक विस्तार से होती है; वैष्णव परम्पराएँ लक्ष्मी‑सहवहिनी के रूप में देवी को गम्भीर श्रद्धा से पूजती हैं। कुछ परिवारों में स्थानीय देवी/ग्रामदेवी की भी आराधना इस रात्रि की परम्परा में जुड़ी रहती है। इसलिए अपने पारिवारिक रीति‑रिवाज और स्थानीय पण्डित की सलाह का सम्मान करें।
आखिरकार, लक्ष्मी पूजन का उद्देश्य केवल सामग्री और विधि नहीं, बल्कि मन की श्रद्धा और जीवन में धर्म‑नियम के अनुरूप सतर्कता, परोपकार तथा श्रम‑निष्ठा का भाव जगाना है। मुहूर्त सुनिश्चित कर लें, शुद्ध मन से संकल्प करें और घर में दान‑कर्म को प्राथमिकता दें—यही परम्परा की मूल आशा है।