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Choti Diwali 2025: छोटी दिवाली पर यम का दीपक किस समय जलाएं? जानें सही दिशा और नियम, टल जाएगी अकाल मृत्यु

Choti Diwali 2025: छोटी दिवाली पर यम का दीपक किस समय जलाएं? जानें सही दिशा और नियम, टल जाएगी अकाल मृत्यु

छोटी दिवाली, जिसे स्थानीय बोलचाल में नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है, अनेक घरों में अँधेरी रातों में दीपक जलाने, दोष निवारण और यमराज की शांति के लिए विशेष आचरण का अवसर है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन यम का दीपक (या यमदीपक) जलाने से अकाल मृत्यु और अनिष्ट घटनाओं से रक्षा होती है — पर यह प्रथा क्षेत्रीय रूप से भिन्न है और विभिन्न पुराणिक व सामुदायिक व्याख्याओं पर निर्भर करती है। इस लेख में हम व्यवहारिक नियम, सही समय जानने का तरीका, दीपक रखने की दिशा और साधारण पाठ-प्रक्रिया संक्षेप में देंगे, साथ ही स्पष्ट कर देंगे कि कब पंडित या स्थानीय पंचांग की सलाह अनिवार्य है।

कब जलाएँ — समय और तिथि का बोध

  • तिथि की पहचान: छोटी दिवाली सामान्यतः कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) की संध्या/रातरात्रि को आती है। यमदीपक उसी चतुर्दशी तिथि के समय में जलाना शुभ माना जाता है।
  • सूर्यास्त के बाद का सामान्य नियम: अधिकांश परंपराओं में यमदीपक सूर्यास्त के बाद चतुर्दशी तिथि विद्यमान होने पर शाम को जलाया जाता है। यदि चतुर्दशी तिथि सूर्यास्त से पूर्व समाप्त हो जाए तो उस दिन का संध्या‐समय अनुकूल नहीं होता — ऐसी स्थिति में स्थानीय पंचांग से पारस्परिक मार्गदर्शन लेना चाहिए।
  • तिथिक्रम की जटिलताएँ: कभी-कभी चतुर्दशी तिथि दिन के कुछ समय बाद समाप्त हो कर रात के किसी हिस्से में चलती है; ऐसे में नियम यह है कि दीपक उस समय पर जलाएँ जब चतुर्दशी तिथि चल रही हो — चाहें वह रात का प्रथम भाग हो या मध्यरात्रि तक।
  • नियमित सलाह: 2025 के लिए सटीक आरंभ-अवसान समय हर स्थान के लिए अलग होगा — इसलिए स्थानीय हिंदू पंचांग या पुजारी से चतुर्दशी तिथि के सूर्यास्त के बाद किस समय सक्रिय है, यह अवश्य सत्यापित कर लें।

किस दिशा में रखें — पारंपरिक विविधताएँ

  • उत्तर की प्रथा: कई घरों में दीपक मुख्य द्वार पर रखा जाता है और दीपक की लौ उत्तर-दिशा की ओर मुख करके रखते हैं। ऐसा करने का भाव यह है कि उत्तर दिशा रक्षा, आयु और स्थिरता का प्रतीक मानी जाती है।
  • दक्षिण से जुड़ी मान्यताएँ: कुछ ग्रंथों में यमराज का सम्बन्ध दक्षिण दिशा से भी जोड़ा गया है; इसलिए कुछ समुदायों में दीपक घर के दक्षिणमुखी स्थान पर या यमुना/कब्रिस्तान के निकट सीमित क्रियाओं का स्मरण कर के जलाते हैं।
  • व्यावहारिक सुझाव: दिशा को लेकर मतभेद होने पर स्थानीय परिवारिक परंपरा या गुरू-आचार्य की सलाह प्राथमिक रखें। सबसे महत्त्वपूर्ण है नीयत (इच्छा) और तिथि का पालन।

दिए का प्रकार, सामग्री और सुरक्षा

  • मिट्टी या तेल के दिए रोज़ाना उपयोगी हैं; तिल का तेल पारंपरिक रूप से रक्षा के लिए प्रिय माना जाता है।
  • दीपक के साथ लाल या पिंगल फूल, थोड़ी रोली/कुमkum और तिल/चावल का थोड़ा अर्पण किया जा सकता है।
  • अति उन्नत रीतियाँ (हवन, यज्ञ) चाहने वालों के लिए पंडित से परामर्श आवश्यक है; साधारण गृहस्थीय अनुष्ठान हेतु केवल दीपक-ज्योति पर्याप्त मानी जाती है।
  • सुरक्षा: खुले जलते हुए दीयों के आसपास सूखी घास, प्लास्टिक या कपड़े न रखें; छोटे बच्चों व पालतू पशु से दूरी बनाकर रखें।

साधारण पाठ और मनtras (वैकल्पिक)

  • आसान मंत्र: “ॐ यमाय नमः” या “ॐ यमदेवाय नमः” — यह सरल और व्यापक रूप से उपयोगी है।
  • कई परिवारों में कुछ श्लोक या यमस्तोत्र का पठान किया जाता है; यदि आप ग्रंथीय पाठ करना चाहते हैं तो Garuda/Skanda पुराण के सम्बन्धित अंश या लोक-स्तुति परंपरा का सहारा लें और पढ़ते समय अर्थ का ध्यान रखें।
  • दान और प्रसादी: तिल, उड़द, लाल वस्त्र, फल इत्यादि दान देने की प्रथा भी प्रचलित है — यह सामाजिक रक्षा और पुण्य के लिए की जाती है।

विविध परंपराएँ और व्याख्यात्मक फलक

  • इन प्रथाओं की पृष्ठभूमि पुराणिक और लोक-आस्था दोनों से आती है। कुछ पुराणों में मृत्यु देवता के प्रति श्रद्धा व विनय का निर्देश मिलता है; स्थानीय और क्षेत्रीय रीति-रिवाज इन निर्देशों से मिलकर बनते हैं।
  • Śaiva, Vaiṣṇava और अन्य समुदायों में अभ्यास के स्वर अलग हो सकते हैं—किसी समुदाय में यमदीपक पर विशेष उपदेश होते हैं, तो कहीं यह केवल पारिवारिक परंपरा बनकर रह जाता है।
  • धर्मशास्त्रीय सख्ती के बजाय आजकल अधिकांश परिवार मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से ये अनुष्ठान निभाते हैं — सुरक्षा, परस्पर संबंध और जीवन-धारणा को पुष्ट करने के लिए।

निष्कर्ष: क्या निश्चित कहा जा सकता है?

  • सटीक समय का एकमात्र भरोसेमंद स्रोत आपका स्थानीय पंचांग है — इसलिए छोटी दिवाली 2025 पर यम का दीपक किस समय जलाना है, यह तय करते समय तिथि-संक्रांति (चतुर्दशी) की समाप्ति/आरम्भ की पुष्टि अनिवार्य है।
  • दिशा, मंत्र और सामग्री पर कई वैध परंपरागत विकल्प मौजूद हैं; अपने पारिवारिक आचार्य या स्थानिक पुरोहित से परामर्श लेकर उन पर अमल करना सबसे सुरक्षित रास्ता है।
  • अंततः उद्देश्य श्रद्धा और सतर्कता है — दीपक जलाते समय सच्ची श्रद्धा, दान और अग्नि-सुरक्षा का ध्यान रखकर आप परंपरा का सम्मान कर सकते हैं बिना अतिशयोक्ति के।

यदि आप चाहें तो अपना शहर/स्थान बताइए — मैं स्थानीय पंचांग के आधार पर सांकेतिक समय-सीमा बताने में मदद कर सकता/सकती हूँ; पर अंतिम निर्णय के लिए स्थानीय पंडित या पंचांग की परामर्श-सिफारिश हमेशा प्राथमिक रहें।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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