Diwali in Indian Cities: अयोध्या की देव दीपावली से जयपुर की सजावट तक, इन 6 शहरों में देखें दिवाली का असली जश्न
दिवाली केवल दीपों और पटाखों का उत्सव नहीं है; यह कई परंपराओं, धार्मिक समझों और लोकाचारों का मिश्रण है जो भारत के शहर-शहर में अलग-अलग रूप ले लेते हैं। मासिक पखवाड़े के अनुसार, सामान्यतः दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या (नवपक्ष का अंतिम दिन) को आती है, पर क्षेत्रीय विवेचनाएँ और स्थानीय पर्व‑रिवाज इसे अलग पहचान देते हैं। कुछ समुदायों के लिए यह राम की अयोध्या वापसी का स्मरण है, कुछ के लिए लक्ष्मी पूजन और व्यवसायिक वर्ष‑प्रारम्भ, कुछ के लिए शक्ति‑पूजा का त्यौहार तथा सिख समुदाय के लिए बन्धि छोड़ दिवस से संबंधित है। नीचे छह शहरों की तस्वीर में हम देखें कि किस तरह इतिहास, धर्मशास्त्र, लोककथा और शहरी जीवन मिलकर दिवाली को अलग‑अलग रंग देते हैं — और किन पारंपरिक तथा समकालीन चुनौतियों और संवेदनाओं का ध्यान रखने की जरूरत रहती है।
अयोध्या — रामचरित और दीपोत्सव
अयोध्या की दिवाली की चेतना प्राचीन रामायण कथाओं से जुड़ी है; कई वैष्णव परंपराओं में यह दिन प्रभु राम की अयोध्या वापसी और राज्याभिषेक से जोड़ा जाता है। शहर के मुख्य मार्ग, रामगढ़ चौक और विभिन्न मंदिरों पर घरों और बाजारों में अविरल दीपमालाएँ लगती हैं। स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएँ व्यापक प्रकाश‑व्यवस्थाएँ करती हैं, साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम और रामलीला के मंचन होते हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह दिन अक्सर *कार्तिक अमावस्या* से जुड़ा होता है; पर कई कार्यक्रम प्रातः‑सायं, संध्या‑काल और पूजन के बाद आयोजित होते हैं। पर्यावरण और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अब कई आयोजक पटाखों के वैकल्पिक सांस्कृतिक‑प्रदर्शनों, इलेक्ट्रॉनिक रोशनी और कम‑ध्वनि विकल्पों का उपयोग बढ़ा रहे हैं।
वाराणसी — गंगा घाटों पर देव दीपावली
वाराणसी में दिवाली का एक अलग आयाम है: यहाँ *देव दीपावली* कार्तिक पूर्णिमा (पौर्णिमा) पर मनाई जाती है, जब गरमी की पूर्णिमा से लगभग पंद्रह दिन पहले घाटों पर अनगिनत दीये जलते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार देवता इसी रात गंगा तट पर स्नान करने आते हैं; इसलिए घाटों, घाट‑सीढ़ियों और मंदिरों को बड़ी संख्या में लकड़ी, तेल और मिट्टी के दीपों से सजाया जाता है।
यह धार्मिक उत्सव गंगा आरती, स्मारक‑दीप प्रज्वलन और पंडों द्वारा आयोजित श्राद्ध/श्रद्धांजलि कर्मों के साथ जुड़ा होता है। कुछ वैदिक और पुराणिक ग्रंथों का हवाला देते हुए विद्वान बताते हैं कि यह परंपरा पौराणिक समय से विकसित हुई है; आधुनिक रूप में यह शहर की सांस्कृतिक और पर्यटन पहचान बन चुका है।
जयपुर — शाही सजावट और बाजारों की रौनक
जयपुर में दिवाली का स्वरूप शहरी रंग‑रूप, शाही सजावट और बाजारों की रौनक से जोड़ कर देखा जाता है। हवेलियों, राजपरिवार से जुड़े स्मारकों और बाजारों को लाइटिंग, फेटों और रंगीन बाजारों के साथ सजाया जाता है; जौहरी बाजार, बापू बाज़ार जैसे बेचे‑खरीदे स्थान विशेष रूप से जीवंत दिखते हैं।
यहाँ का लोकसंगीत, लोकनृत्य और शिल्प‑दर्शनी दिवाली के दौरान बढ़ती है। व्यापारी समुदायों में पूजन और नए खाता‑किताब खोलने की परंपरा भी प्रचलित है; वास्तु और आर्थिक शुभता पर आधारित प्रथाएँ कुछ व्यापारियों के बीच अब भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
कोलकाता — काली पूजा और रात का तीव्र अनुष्ठान
पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात को पारंपरिक रूप से *काली पूजा* मनाई जाती है; यह अमावस्या की रात में देवी काली की पूजा‑अर्चना के साथ की जाती है। शाक्त परंपराओं में काली की आराधना का इतिहास अलग है और स्थानीय रूपों में वर्षों से विकसित हुआ है — पंडालों में प्रतिमा‑स्थापन, विधिपूर्वक बलि‑संस्कृतियों के स्थान पर अब अधिकतर सांकेतिक अनुष्ठान और भजन‑कीर्तन होते हैं।
कोलकाता की दिवाली में प्रकाश और आतिशबाज़ी का भी बड़ा योगदान रहता है, पर पूजा का केन्द्र रात का अनुष्ठान और सामुदायिक पंडाल बनता है। कलाकारों और पंडाल‑निर्माताओं की रचनात्मकता इस उत्सव को विशिष्ट बनाती है।
अमृतसर — बन्धि छोड़ दिवस और स्वर्ण मंदिर की शोभा
सिख परंपरा में दिवाली का एक सुदृढ़ इतिहास है: कई सिख समुदाय बन्धि छोड़ दिवस (Bandi Chhor Divas) के रूप में इस समय का स्मरण करते हैं, जब गुरु हरगोबिंदजी को कैदियों के साथ रिहा किया गया था। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर दिवाली/बन्धि छोड़ के अवसर पर जगमगा उठता है; मंदिर परिसर और हरिमंदिर का जलजलेबना और रौशनी दृष्टिगोचर होती है।
यहाँ पर धार्मिक सेवाओं के साथ सामुदायिक langar (भोजन) और ऐतिहासिक कथाओं का स्मरण शामिल रहता है। कई विद्वान बताते हैं कि बन्धि‑छोड़ कथा और दिवाली का मेल सिख‑हिन्दू परंपराओं के सामाजिक इतिहास को दर्शाता है।
चेन्नई — दक्षिण भारतीय रीति‑रिवाज और दिवाली सुबह
तमिलनाडु और कई दक्षिण भारतीय शहरों में दीपावली की परंपरा उत्तर भारत से कुछ अलग रहती है: कई स्थानों पर दीपावली सुबह के समय मनाई जाती है, जिसमें तेल स्नान, नव वस्त्र, लक्ष्मी या भगवान वेंकटेश्वर/कुबेर से सम्बंधित प्रार्थनाएँ और मिठाइयों का आदान‑प्रदान शामिल है। कुछ समुदायों में दीपावली के साथ स्थानीय देवी या ग्रामदेवताओं की पूजा भी जुड़ी रहती है।
दक्षिण के शास्त्रीय ग्रंथों और लोकश्रुति में दीपावली के कारणों पर अलग‑अलग व्याख्याएँ मिलती हैं; इसलिए यहाँ की परंपरा को समृद्ध क्षेत्रीय विविधता के रूप में देखना जरूरी है।
इन छह शहरों की तस्वीर यह बताती है कि दिवाली एकल‑व्याख्या वाला उत्सव नहीं है बल्कि समय‑चर्या, समुदाय, धर्म‑व्यवहार और शहर की सामाजिक संरचना के अनुरूप बदलता‑बनता रहता है। आधुनिक चुनौतियाँ — वायु‑दूषण, शहरी सुरक्षा, और धार्मिक‑सांस्कृतिक संवेदनशीलता — इन परंपराओं के नए रूपों को जन्म दे रही हैं। आदर्श रूप में स्थानीय विविधताओं का सम्मान करते हुए परस्पर सहिष्णुता, पारंपरिक अर्थ‑गम्भीरता और पर्यावरणीय दायित्व का संतुलन बनाए रखना ही समकालीन दिवाली का सार होगा।