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Diwali 2025: लक्ष्मी पूजन का सबसे शुभ मुहूर्त, पंडित जी से जानिए सही समय और पूजा विधि

Diwali 2025: लक्ष्मी पूजन का सबसे शुभ मुहूर्त, पंडित जी से जानिए सही समय और पूजा विधि

दीवाली पर महालक्ष्मी पूजन केवल पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वर्ष का वह छोटा-सा पवित्र समय है जब घर, मन और व्यवस्था को सम्पन्नता और अनुशासन के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया जाता है। मुहूर्त का चुनाव तकनीकी और धार्मिक दोनों दृष्टि से मायने रखता है — पंचांग में दर्शित तिथि (विशेषकर कार्तिक अमावस्या/कृष्ण पक्ष की अमावस्या), नक्षत्र, योग, राहु-काल और स्थानीय सूर्यास्त-उदय के समय मिलकर तय करते हैं कि किस समय पूजन करना शास्त्र-विधिक और फलदायी माना जाएगा। 2025 के दीवाली-वर्ष के लिए भी यही सिद्धांत लागू होंगे: कोई सार्वभौमिक “एक ही” समय नहीं होता; स्थानीय पंचांग और कुंडली-स्थितियों के अनुसार पंडितजी सटीक मुहूर्त बताएँगे। नीचे पूजा-निर्देश, मुहूर्त चुनने के सिद्धांत और व्यवहारिक सुझाव दिए जा रहे हैं, ताकि आप सूचित और शांत मन से तैयारी कर सकें।

शुभ मुहूर्त — सिद्धांत और गणना

शास्त्रों के सामान्य नियम अनुसार लक्ष्मी पूजन के लिए अमावस्या (कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या) तिथि सबसे प्राथमिक आधार होती है। यदि अमावस्या एक दिन में चलती है, तो पूजन उस समय किया जाना चाहिए जब अमावस्या तिथि पार नहीं हुई हो। स्थानीय पंचांग यह बताता है कि अमावस्या किस समय से किस समय तक चल रही है; उसी के अनुरूप पूजन प्रारंभ या समाप्त होना चाहिए।

अन्य महत्वपूर्ण खण्ड-नियम जो पंडितजी देखते हैं:

  • राहु-काल, यमगण्ड, और अशुभ योग — इन कालों में शुभ कार्य टालने का परंपरागत निर्देश है; पंडित इन्हें देखकर पूजन का समय तय करते हैं।
  • नक्षत्र और योग — कुछ शुभ नक्षत्र और योग पूजन-फल को बढ़ाते हैं; विशेषकर विषकुण्डली या पञ्चक की उपस्थिति से बचा जाता है।
  • स्थानीय सूर्यास्त-विकल्प — दीवाली पर अक्सर संध्या (सूर्यास्त के बाद) का समय प्रचलित है; किसी स्थान पर सूर्यास्त-समय के प्रति संवेदनशीलता रहती है।

2025 के संदर्भ में क्या करें

मैं यहाँ किसी एक-लाइन् टाइम नहीं दे रहा क्योंकि अमुक जगह का घटि-गणित, स्थानिक समायोजन और कैलेंडर-संशोधन आवश्यक होता है। इसलिए: पन्धरह दिन पहले से स्थानीय पञ्चांग/अर्चक/पंडित से सम्पर्क कराएँ। पंडित से पूछें — आपकी नगर/गांव का अक्षांश-देशान्तर, अमावस्या की आरंभ और समापन तिथियाँ, तथा प्रस्तावित पूजन का समय क्या रहेगा। यह सुनिश्चित करेगा कि पूजन के आरंभ और समापन के समय अमावस्या तिथि वैध हो।

पंडित जी से पूछने योग्य सटीक बातें

  • मेरे नगर/क्षेत्र के लिए कार्तिक अमावस्या की आरम्भ और समापन तिथियाँ क्या हैं?
  • राहु-काल/यमगण्ड किस समय हैं और क्या प्रस्तावित मुहूर्त उनके अंदर आता है?
  • क्या किसी विशेष नक्षत्र या योग के कारण वह समय पारंपरिक दृष्टि से अधिक उपयुक्त है?
  • यदि अमावस्या रात में बदलती है तो क्या पूजन अमावस्या शुरू होते ही करना चाहिए या सूर्यास्त के बाद निर्धारित समय रखना बेहतर होगा?

सामान्यत: उपयोग में आने वाले शुभ विंडो (व्याख्यात्मक)

भिन्न-भिन्न परंपराएँ अलग समय चुनती हैं; कुछ सामान्य रूप से प्रयुक्त विंडो उदाहरण स्वरूप — शाम के प्रातः सूर्यास्त के ठीक बाद से लेकर रात्रि 9–11 बजे तक का समय कई क्षेत्रों में शुभ माना जाता है। बंगाल में प्रायः संध्या बाद के समय पर लक्ष्मी पूजा होती है जबकि उत्तर भारत में भी शाम से मध्यरात्रि तक का समय प्रचलित है। इन विंडो का उपयोग तभी करें जब पञ्चांग पुष्टि कर दे कि अमावस्या तिथि उस समय मौजूद है।

लक्ष्मी पूजन विधि — क्रमबद्ध और संक्षिप्त

  • स्वच्छता और सज्जा — घर को स्वच्छ करें, दीपक-स्थान, मंच या पूजा-ठिकाना सजाएँ; हल्दी, कुंकुम, फूल, अक्षत, अलग थाल रखें।
  • स्नान और शुद्धि — यदि संभव हो तो साधक स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करे; पूजा स्थल पर दीपक और धूप रखें।
  • संकल्प — संकल्प लें (स्थान, देवता, उद्देश्य व समय का उल्लेख करें)।
  • गणेश-वंदना — पूजा की शुरुआत गणेश पूजा से करें; छोटे मंत्र या श्लोक पढ़ें।
  • कालश/घट स्थापना (यदि परंपरा में हो) — कलश में जल, ऐवम्, नारियल व जड़ा समर्पित करते हुए स्थापना करें।
  • महालक्ष्मी-अवाहन — श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त, या पारंपरिक स्तोत्रों के पाठ के साथ लक्ष्मी का आवाहन करें; बीजमंत्र जैसे “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” का जाप सामान्य है।
  • भोग और नैवेद्य — मीठा, फल, चावल व अन्य पकवान चढ़ाएँ; दीपक से आहुतियाँ दें।
  • आरती और प्रार्थना — आरती के बाद परिवारिक एकता, श्रद्धा व दान की बात करें; आवश्यकतानुसार यज्ञ-हवन किया जा सकता है।
  • समापन — दान दें (भोजन, कपड़े, धन), प्रसाद वितरण करें और देवता का आशीर्वाद लेकर पूजा समाप्त करें।

स्थानीय परंपराएँ और वैचारिक विविधता

कुछ समुदायों में लक्ष्मी पूजन केवल वैष्णव-रिवाज़ के अनुरूप किया जाता है, जबकि शाक्त या स्मार्त परंपराएँ पृथक विधियाँ अपनाती हैं (जैसे लक्ष्मी-कालश, श्रीयन्त्र पूजन या विशेष स्तोत्र)। कई ग्रन्थ पूजन-समय को लेकर विस्तृत विवेचन रखते हैं; कुछ शास्त्र बतलाते हैं कि संध्या-काल में दीप ज्यादा फलदायी होते हैं, अन्य ग्रन्थ रात्रीकालीन उपासना की भी अनुमति देते हैं। इन विविधताओं का सम्मान करते हुए पंडित का परामर्श लेना सबसे व्यावहारिक होता है।

सावधानियाँ और व्यावहारिक सुझाव

  • पंचक (विशेषतः शिव-पक्ष पंचक) होने पर परंपरागत नियमों के अनुसार कुछ कर्मों का परित्याग सुझाया जाता है — स्थानिक पंडित से पुष्टि करें।
  • धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामाजिक दायित्व भी जुड़ा है — गरीबों को दान और अन्न-दान करने से पुण्य बढ़ता है।
  • यदि आप पाण्डित्य उपलब्ध न होने के कारण स्वयं पूजन कर रहे हैं, तो साधारण, शुद्ध और मनोयोग से किया गया पूजा-कार्य ग्रन्थों के अनुसार स्वीकार्य माना जाता है।

निष्कर्ष

दीवाली 2025 में लक्ष्मी पूजन का “सबसे शुभ” मुहूर्त स्थानीय पंचांग, अमावस्या की समय-सीमा और राहु/नक्षत्र की स्थितियों पर निर्भर करेगा। पंडितजी से समय लेने से पहले अपना स्थान बताना, अमावस्या की शुरुआत-समापन की पुष्टि लेना और संभावित अशुभ काल-खंडों से बचना बुद्धिमत्ता है। विधिपूर्वक और स्पष्ट संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा पूजन भी श्रद्धा-भरा और उपयोगी होता है। शांत मन, स्वच्छ घर और जरूरतमंदों के प्रति उदारता—यही दीवाली का मूल संदेश है, और यही पूजा के वास्तविक फल का आधार बनेगा।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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