Diwali 2025: नरक चतुर्दशी पर क्यों जलाया जाता है यम का दीया? जानिए पौराणिक कथा
नरक चतुर्दशी की सुबह और शाम भारतीय उपमहाद्वीप में एक विशेष तरह की अलौकिक गूँज लाती है: घरों में दीपक जलते हैं, नहाने-धोने की परम्परा निभाई जाती है और लोककथाओं में वर्णित दानव नरेश नरकासुर की कहानी चर्चा में रहती है। इसी दिन एक और प्रथा है — **यम का दीया** या *यमदीप* जलाना — जो कई समुदायों में प्रिय और बहुविध अर्थों वाला कर्म रहा है। यह केवल एक लोक रीति नहीं; रीति के पीछे मृत्यु, धर्म और जीवन के संरक्षण से जुड़े गहरे प्रतीकात्मक और धार्मिक तर्क हैं। कुछ स्थल पर इसे पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है, कुछ जगहों पर यह मृत्यु के भय को शांत करने और पूर्वजों का सम्मान करने का तरीका माना जाता है। इस लेख में हम पौराणिक कथाओं, वैचारिक व्याख्याओं और स्थानीय प्रथाओं के संदर्भ में यह समझने की कोशिश करेंगे कि नरक चतुर्दशी पर यम का दीया क्यों जलाया जाता है, किन-किन रूपों में यह प्रथा मौजूद है और इसके ऐतिहासिक—सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य क्या हैं।
दिन और पौराणिक पृष्ठभूमि
नरक चतुर्दशी सामान्यत: कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है — यह अमावस्या (दीपावली) के ठीक पहले आता है। पौराणिक साहित्य में इस दिन को नरकासुर के वध से जोड़ा जाता है: कई पुराणों और लोककथाओं के अनुसार, नरकासुर एक अत्याचारी दैत्य था जिसे श्रीकृष्ण (किंवदन्तियों में कभी-कभी बलराम साथ में) ने परास्त किया था; उसकी मृत्यु के बाद लोग उस अन्धकार (नरक) पर विजय के रूप में दीप जलाते हैं। यह कथा विशेष रूप से वैष्णव परंपराओं में केन्द्रित है, परंतु स्थानीय मिथक और देवीकथा-आधारित संस्करण भी प्रचलित हैं।
यम का दीया — परंपरा और विधि
यम का दीया कई स्थानों पर शाम के समय या रात को जलाया जाता है। सामान्य प्रथा में महिलाएँ घर के द्वार, आँगन या चौखट पर मिट्टी का दीपक रखकर उसे जलाती हैं और यमराज के लिए प्रार्थना या कुछ बार पतियों की दीर्घायु हेतु मंत्रोच्चारण करती हैं। कुछ समुदायों में दीपक को खुले आकाश के सामने रखा जाता है, कभी-कभी घर के बाहर किसी पेड़ या चौराहे पर भी लगाया जाता है — यह सब क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार बदलता है।
विवेचनात्मक कारण — प्रतीक और अर्थ
- मृत्यु का भय शांत करना: यम (यमराज) को मृत्यु का दैव-प्राधिकारी माना जाता है। दीप जलाकर उसकी ओर श्रद्धासुमन अर्पित करना एक प्रकार का विनम्र निवेदन है कि अविवेकी, अकस्मात या असमय मृत्यु से रक्षा हो।
- पारिवारिक सुरक्षा और दीर्घायु: कई लोक धाराओं में विशेषकर पत्नियाँ अपने पति की दीर्घायु और सुख-शान्ति के लिए यम को स्मरण कर दीपक जलाती हैं — यह सामाजिक सुरक्षा और वैवाहिक बन्धन के टिकाऊ होने की कामना से जुड़ा हुआ है।
- प्रकाश बनाम अंधकार का प्रतीक: नरक चतुर्दशी की कथा, जहाँ दैत्य नासूर-सदृश अन्धकार का प्रतिनिधित्व करता है, उसे हराने का प्रतीक है। यम का दीया इस लड़ाई का एक आयाम है — मृत्यु के भय के अन्धकार में भी जीवन-प्रकाश बरकरार रहे।
- पूर्वज-श्रद्धा का समावेश: कुछ व्याख्याएँ कहती हैं कि दीपक जलाकर पूर्वजों (पितृ) का सम्मान भी किया जाता है — यम, जो पितृ लोक और मृत्यु से भी जुड़े हैं, के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
पौराणिक और वैचारिक विविधता
धार्मिक-शास्त्रीय स्रोतों और स्थानीय परम्पराओं में विविधता है। उदाहरण स्वरूप, वैष्णव परंपराएँ नरकासुर-वध और कृष्ण के उत्सव पर जोर देती हैं, जबकि कुछ क्षेत्रीय पुराणिक-खण्डों में यम के साथ संवाद या देवता-आदर की बातें मिलती हैं। शैव, शाक्त या स्मार्थ परिवारों में भी यम को किसी न किसी रूप में स्वीकारा जाता है, पर व्याख्या और कर्म विभिन्न हो सकते हैं। गीता-व्याख्याकारों का ध्यान यदि जीवन-मरण के दार्शनिक मुद्दों पर रहता है, तो लोकपरम्पराएँ व्यवहारिक सुरक्षा और सामुदायिक आत्मिक-चारीत्र की ओर देखती हैं। इन अन्तरों को नकारना उचित नहीं — दोनों ही दृष्टियाँ त्यौहार की समृद्धि को समझाती हैं।
क्षेत्रीय भेद और आधुनिक प्रासंगिकता
देश के विभिन्न भागों में यम-दीप की प्रथा अलग-अलग स्वरूप में घटती है — पश्चिम भारत में यह पति की दीर्घायु के अनुरोध के रूप में प्रचलित है; उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में यह शाम के दीप-समूह का हिस्सा बनता है; दक्षिण में नरकासुर-नाश की कथा पर ज्यादा ज़ोर होता है और यम संबंधी रीति कम देखी जाती है। समकालीन शहरी परिप्रेक्ष्य में कई लोग इसे सांस्कृतिक पहचान और परम्परागत मेलजोल का प्रतीक मानते हैं — धार्मिक अर्थ के साथ-साथ सामाजिक-भावनात्मक मूल्य भी जुड़ा रहता है।
कैसे करें — कुछ सावधानियाँ
- दीप जलाते समय अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें — सूखी पत्तियाँ या कागज दीयों के पास न रखें।
- यदि द्वार-आँगन में दीपक रखा जा रहा है तो वहां से गुजरने वालों के लिए सुरक्षित मार्ग बनाएँ।
- परम्परा का सम्मान करें, परन्तु स्थानीय नियमों (आग निषेध, सार्वजनिक सुरक्षा) का पालन भी आवश्यक है।
निष्कर्षिक टिप्पणी
नरक चतुर्दशी पर यम का दीया जलाना एक बहुस्तरीय धार्मिक-लोकपरम्परा है — इसमें पौराणिक स्मरण, पारिवारिक कामना, मृत्यु के प्रति विनम्रता और सामाजिक सुरक्षा का मिश्रण मिलता है। यह परम्परा दिखाती है कि त्यौहार केवल खुशी नहीं, बल्कि जीवन-मरण के गूढ़ प्रश्नों के साथ सामूहिक संवाद भी होते हैं। परम्पराओं की व्याख्या करने में यह ध्यान देना चाहिए कि स्रोत और अभ्यास स्थान के अनुसार बदलते हैं; अतः किसी एक व्याख्या को सर्वमान्य बताने से बचना चाहिए। अंततः दीप से निहित संदेश — अज्ञान के अन्धकार में भी जीवन का प्रकाश बनाये रखना — सभी परंपराओं में सहमत माना जा सकता है।