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Diwali 2025: रंगोली के इन 5 डिजाइनों से सजाएं अपना घर, आएगी सुख-समृद्धि

Diwali 2025: रंगोली के इन 5 डिजाइनों से सजाएं अपना घर, आएगी सुख-समृद्धि

दिवाली पारंपरिक रूप से प्रकाश, सफाई और स्वागत का त्योहार है। घर की सफ़ाई, दीयों की व्यवस्था और पूजा‑स्थल की सजावट के साथ रंगोली भी उस तैयारी का एक सशक्त तरीका है। रंगोली सिर्फ़ सौंदर्य नहीं है; यह सीमा‑रचना, देवी‑पूजन और शुभचिन्ह के रूप में काम करती है। अलग‑अलग क्षेत्र‑परंपराओं में इसे रंग, चावल के आटे, फूल और हल्दी‑कुमकुम से बनाया जाता है—कई परिवार इसे लक्ष्मी के स्वागत का संकेत मानते हैं, कुछ लोग इसे ऊर्जा‑व्यवस्था और दृढ़ता का प्रतीक भी समझते हैं। इस लेख में दीवाली 2025 के अवसर पर पाँच खास रंगोली डिजाइनों को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है: प्रत्येक डिजाइन के धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ, बनावट के व्यावहारिक सुझाव, सामग्री‑विकल्प और पूजा में रखने का उपयुक्त स्थान बताया गया है। सलाहें सामान्य हैं; स्थानीय रीतियों व पंडित‑परंपराओं के अनुसार तिथियों और क्रियाओं का निर्वाह करें।

1. लक्ष्मी पदुका‑लotus (Seed of prosperity)

विवरण: इसमें केंद्र में लक्ष्मी के पदुके या कमल का प्रतीक बनता है, जिसके चारों ओर छोटा‑छोटा पेड़ाकार पैटर्न रहता है। धार्मिक दृष्टि से कमल और लक्ष्मी दोनों समृद्धि व शुद्धता के प्रतीक हैं।

  • सामग्री: चावल का आटा (श्वेत), हल्दी‑पीला, कुमकुम‑लाल, सूखे फूलों के पंखुड़ी।
  • बनाने के चरण: पहले सफाई कर, योगी‑समता के साथ एक छोटा वृत्त बनाएं; केन्द्र में कमल या पदुका बना कर चार दिशाओं में विस्तार करें।
  • रखने की जगह: पूजा‑कक्ष के सामने या मुख्य द्वार के अंदर, ताकि श्रद्धा और स्वागत का भाव दोनों समाहित हों।
  • संस्कृतिक वैरायटी: वैष्णव घरों में Shri‑चिन्ह के समीप यह विशेष रूप से लोकप्रिय है।

2. क्लासिक सिक्कु कोलम (Interlaced kolam)

विवरण: दक्षिण भारत की पारंपरिक सिक्कु कोलम बिंदु‑जाल (dot‑grid) के ऊपर झरने जैसी रेखाओं से बनाई जाती है। इसका अर्थ: क्रम, सतत् प्रवाह और समता—जिसे कुछ शास्त्रीय ग्रंथ घरेलू मर्यादाओं के संकेतक रूप में देखते हैं।

  • सामग्री: चावल का आटा (पक्षियों के लिए भी सुरक्षित), बारीक सफेद चाक, प्राकृतिक रंग।
  • बनाने के चरण: पहले दीर्घ बिंदु‑ग्रिड बनाएं; फिर हाथ की गति से लूप और कर्व बनाकर जाल पूरा करें।
  • प्रैक्टिकल टिप: प्रैक्टिस के लिए कागज़ पर ड्राइंग करें; बड़े दरवाजों पर चौड़े पैमाने पर बनाना आसान होता है।
  • धार्मिक संकेत: कुछ Śaiva परंपराओं में कोलम को शुभ ऊर्जा के आवागमन का मार्ग मानते हैं।

3. गणपति‑शंखल (Ganesha motif with oil‑lamp halo)

विवरण: इस डिज़ाइन में केंद्र में छोटा‑सा गणेश चिह्न और उसके चारों ओर दीपों की माला बनाई जाती है। गणेश को विघ्ननाशक माना जाता है, इसलिए पूजा के प्रारम्भ में उनकी छवि/रंगोली रखना सामान्य है।

  • सामग्री: हल्का लाल और नारंगी रंग, छोटे दीये या वैक्यूम‑टि‑लाइट्स, मूंगफली‑आटा या सूखी हल्दी।
  • बनाने के चरण: गणेश का सरल चित्र केंद्र में बनाएं; बाहर की सर्किल में 8‑16 छोटे‑छोटे दीप रखें ताकि शाम को प्रकाश चक्र बने।
  • समय और शिष्टाचार: यह रंगोली शाम के आरती से पहले तैयार करें और आरती के दौरान दीप प्रज्वलित रखें।

4. मोर‑पक्षी और प्रवाह (Peacock motif with flowing vines)

विवरण: मोर‑मोटिफ सौंदर्य और वैभव का प्रतिनिधि है; साथ में बहती बेलें जीवन‑शक्ति और परिवारिक समृद्धि का संकेत देती हैं। राजस्थान और गुजरात के मंडना/अल्पना शैलियों में इस तरह के आकृतियाँ सामान्य हैं।

  • सामग्री: सूखे फूल, रंगीन चूर्ण, हरे‑पत्तों के सूखे टुकड़े और चावल।
  • बनाने के चरण: मोर का सिर और पंख केंद्र की ओर रखें; पंखों से बाहर की ओर बेलों को फैलाएं।
  • वैरिएशन: स्तरीय रंग संयोजन (नीला‑हरा‑सुनहरा) शाम के प्रकाश में विशेष आकर्षक लगता है।

5. श्री यंत्र / दीप‑मण्डल (Yantra inspired lamp mandala)

विवरण: एक ज्यामितीय मण्डल जिसमें केन्द्र पर दीप और बाहर की ओर त्रिभुज/वृत्त होते हैं। यह साधना और निर्देशित ऊर्जा की परंपरा से जुड़ा हुआ प्रतीक है—कुछ वैदिक और तंत्र ग्रंथ मण्डल के उपयोग का उल्लेख करते हैं।

  • सामग्री: हल्की रेखा के लिए चावल‑आटा, भरने के लिए सूक्ष्म रंग; बीच में छोटा दीया।
  • बनाने के चरण: माप‑रूलर से संतुलन बनाए रखें—त्रिकोण/वृत्तों को सममित रखें; बीच में दीया रखें।
  • आध्यात्मिक टिप्पणी: कुछ विद्वान कहते हैं कि ज्यामिति ईश्वर‑चेतना की भाषा है; इसलिए मण्डल ध्यान और पूजन दोनों के लिये उपयुक्त है।

व्यावहारिक और धार्मिक सुझाव

  • तिथि और समय: दिवाली सामान्यत: कार्तिक अमावस्या के दिन और उसके संध्या‑समय पर होती है—स्थानीय पंचांग देखकर लक्ष्मी पूजन का सटीक समय देखें।
  • स्वच्छता और श्रद्धा: गृहशुद्धि पहले करें; कई गृहग्रन्थ (जैसे कुछ गृहसूत्र संदर्भ) प्रवेशद्वार पर चिन्ह बनाने की शिष्टता का उल्लेख करते हैं।
  • पर्यावरण का ध्यान: प्लास्टिक‑ग्लिटर से बचें; प्राकृतिक रंग और चावल‑आटा पक्षियों के लिए सुरक्षित होते हैं।
  • सम्मान और व्यावहारिकता: रंगोली को पूजा समाप्ति तक अनछुआ रखें; अतिथि‑आगमन के दौरान मंदिर या पूजा कक्ष के समक्ष रखें।
  • स्थानीय विविधता: उत्तर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्व के घरों में शैली और प्रतीक भिन्न होंगे—इन मतभेदों को सांस्कृतिक समृद्धि के रूप में देखें।

रंगोली बनाना एक व्यक्तिगत और पारिवारिक प्रक्रिया है—यह न केवल दृश्य सजावट बल्कि आयोजन के आध्यात्मिक आयाम को भी मजबूती देता है। आप इन पाँच डिजाइनों को अपनी परंपरा और घर की वास्तु के अनुरूप मोड़ सकते हैं; महत्वपूर्ण यह है कि इसे श्रद्धा, साफ‑सफाई और सामर्थ्य के साथ किया जाए। शुभ दीवाली।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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