Diwali 2025: नरक चतुर्दशी पर सरसों के तेल का दीपक जलाने का क्या है महत्व?
नरक चतुर्दशी के दिन घरों में सरसों के तेल का दीपक जलाने का रिवाज़ उत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में लंबी परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह परंपरा केवल रोशनी बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोककथाओं, आध्यात्मिक अर्थों और दैनिक उपयोगिता का मिश्रण है: सरसों की तीखी गंध, उसकी लौ की बनावट और क्षेत्रीय उपलब्धता ने इस तेल को विशेष स्थान दिलाया। धार्मिक दृष्टि से यह दिन अंधकार, भय व पाप के नाश और आत्मिक शुद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है; इसलिए प्रकाश—विशेषकर घर के द्वार, आंगन और कुएँ के पास—अलग अर्थ ले लेता है। साथ ही यह परंपरा सामाजिक और लोक-धार्मिक भाष्य का हिस्सा है: रिश्तों की मरम्मत, पूर्वजों के लिए स्मरण, और ग्राम-स्तर पर समुदाय के सुरक्षा-आशीर्वाद की कामना। इस लेख में हम सरसों के तेल के दीपक जलाने के ऐतिहासिक, साङ्केतिक और प्रायोगिक कारणों को विभिन्न धार्मिक और क्षेत्रीय दृष्टिकोणों से देखेंगे, साथ ही सुरक्षा और वैकल्पिक विकल्पों की व्यावहारिक सलाह भी देंगे।
ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
पान-कृषि प्रधान क्षेत्रों में सरसों सदैव उपलब्ध रही है, इसलिए सालों से यह घरों में खाना पकाने, दवा और दीपक-तेल के रूप में प्रयोग होती आई है। ग्रीष्म-ठंड के बदलते मौसम में सरसों का तेल स्नेहन और ताप देने की क्षमता के कारण उपयोगी रहा। दीप जलाने की परंपरा वैदिक यज्ञों तक जाती है जहाँ दीपक और अग्नि का प्रतीकात्मक उपयोग होता है, किंतु वैदिक ग्रंथों में सवयं सरसों तेल का विशिष्ट निर्देश नहीं मिलता—वहां अधिकतर घृत (घी) की प्रधानता है। फिर भी लोक-परंपराओं ने स्थानीय संसाधनों के अनुरूप अनुष्ठानों को अपनाया और सरसों का तेल इसका भाग बन गया।
धार्मिक व प्रतीकात्मक अर्थ
- अंधकार का नाश: दीप का मूल अर्थ ही अज्ञान और अंधकार का नाश है। नरक चतुर्दशी पर दीप जलाकर लोग घर व मन की ‘तिमिर’ दूर करने का संकल्प लेते हैं।
- नरकवध स्मरण: पौराणिक कथाओं में नारकासुर के वध की स्मृति से जुड़ा यह दिन विजय का प्रतीक है; प्रकाश जला कर बुराई पर अच्छाई की विजय का अभिनय किया जाता है।
- पूर्वजों की स्मृति और मार्गदर्शन: कुछ लोक-विश्वासों के अनुसार द्वार पर जलते दीप से पूर्वजों को मार्गदर्शन व आशीर्वाद मिलता है।
- शुद्धिकरण: सरसों के तेल का तीव्र सुँघ और धुँआ पारंपरिक रूप से नकारात्मक ऊर्जाओं और कीटाणुओं को दूर करने के रूप में देखा गया—यह व्यावहारिक और प्रतीकात्मक दोनों है।
विभिन्न समुदायों की व्याख्याएँ
शैव, वैष्णव, शाक्त और स्मार्त परंपराओं में नरक चतुर्दशी की महत्ता और उसका अनुष्ठानिक ढंग अलग-अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, कुछ ग्रामीण वैष्णव/लोक परंपराओं में नारकासुर-वध का प्रतिपादन प्रमुख है; वहीं कुछ शैव व शाक्त समुदाय स्थानीय देवी-देवताओं के साथ जोड़कर इस दिन को मनाते हैं। कई विद्वान और संस्कृति-विशेषज्ञ बताते हैं कि सरसों के तेल का प्रयोग मूलतः क्षेत्रीय उपयोगिता और प्रतीकात्मकता का मेल है—इसलिए किसी भी एक ग्रंथ-आधारित आदेश के रूप में इसे देखना सीमित होगा।
सरसों के तेल के विशेष गुण—व्यावहारिक और पारंपरिक
- लौ और रोशनी: सरसों के तेल से दीये की लौ स्थिर और चमकीली होती है, जिससे अँधेरे में अच्छी रोशनी मिलती है।
- सुगन्ध व धुँआ: तेल की तीखी खुशबू और धुँआ की लोक-धारणा के अनुसार नकारात्मक जीवों तथा कीड़ों को दूर करता है।
- स्थानीय उपलब्धता: खेत-आधारित समाजों में सरसों अक्सर घर पर तैयार या आसानी से मिलता रहा है—इस कारण यह सहज विकल्प बन गया।
- आयुर्वेदिक गुण: पारंपरिक चिकित्सा में सरसों तेल को ‘उष्ण’ और श्लेष्मिक पदार्थों को नियंत्रित करने वाला माना जाता है; परन्तु धार्मिक अनुष्ठानों में इन चिकित्सीय दावों का प्रयोग प्रतीकात्मक स्तर पर होता है।
ग्रंथों में क्या मिलता है — सीमाएँ और व्याख्याएँ
वेद और शास्त्रों में दीपक-प्रथा का उल्लेख है, परन्तु अधिकांश वैदिक अनुष्ठानों में घी प्रमुख ईंधन के रूप में दिखता है। स्थानीय स्मृतियों और पुराणों में सरसों के तेल के उपयोग के स्पष्ट निर्देश कम ही मिलते हैं—यह अधिकतर लोक- परंपरा, रीति-रिवाज और ग्राम्य आचार का हिस्सा है। इसलिए इसे ‘ग्रंथ-आधारित अनिवार्यता’ नहीं, बल्कि ‘क्षेत्रीय धर्माचार्य’ के रूप में समझना ज़्यादा उपयुक्त होगा।
आधुनिक प्रासंगिकता और सुरक्षा सुझाव
- यदि आप सरसों का तेल उपयोग करते हैं तो खुले स्थान में और अच्छी वेंटिलेशन वाले कमरे में दीपक जलाएँ—धुँआ और स्याह धब्बों से सतर्क रहें।
- बाल बालक और पशु-पक्षियों से दीयों को दूर रखें; दीयों के पास सूखे वस्त्र न रखें।
- पर्यावरण या स्वास्थ्य कारणों से आप घी, तिल का तेल या बैटरी-आधारित एलईडी दीयों को विकल्प के रूप में चुन सकते हैं—धार्मिक दृष्टि से मन और नीयत का महत्व अधिक है।
- समुदाय में यदि सार्वजनिक स्थानों पर दीपक जलाए जा रहे हों तो अग्नि सुरक्षा के स्थानीय नियम और पड़ोसियों की सहमति का ध्यान रखें।
निष्कर्ष
नरक चतुर्दशी पर सरसों के तेल का दीपक जलाना क्षेत्रीय परंपरा, प्रतीकात्मक अर्थ और व्यावहारिक उपयोग के मेल से बना एक जीवंत अभ्यास है। यह न सिर्फ अंधकार पर प्रकाश की विजय का धार्मिक संकेत है बल्कि सामुदायिक स्मृति, पारिवारिक अनुभव और पारंपरिक ज्ञान का संवाहक भी है। ग्रंथों में इसकी अनिवार्यता स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे लोक-धार्मिक व्यवहार और व्यक्तिगत श्रद्धा के परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। साथ ही आधुनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और पारिस्थितिक चिंताओं को ध्यान में रखकर परंपराओं की मर्यादा और अनुकूलता दोनों को बनाए रखना आज आवश्यक है।