Diwali 2025: धनतेरस से जुड़ी ये 5 मान्यताएं क्या आप जानते हैं?
दीपावली के उत्सव की शुरुआत अक्सर धनतेरस से मानी जाती है। यह तिथि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के साथ जुड़ी रहती है और पारंपरिक रूप से धन, स्वास्थ्य और सुरक्षा से संबंधित विधियों का समय माना जाता है। आधुनिक घरों में यह दिन सोना‑चांदी की खरीद, घर‑सफाई और दीप जलाने के साथ मनाया जाता है, परंपरागत कथाएँ, धार्मिक व्याख्याएँ और सामाजिक प्रथाएँ अलग‑अलग समुदायों में विभिन्न रूप ले लेती हैं। नीचे दिए गए पाँच सामान्य मान्यताओं को हम ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक संदर्भ में समझने की कोशिश कर रहे हैं — जहाँ संभव हो विविध दृष्टिकोणों का हवाला दिया गया है और जहां व्याख्या का अलग‑अलग चलन है, उसे स्पष्ट किया गया है।
1. सोना‑चांदी खरीदना लक्ष्मी की कृपा लाता है
धनतेरस पर की जाने वाली सबसे प्रसिद्ध मान्यता यह है कि सोने‑चांदी या कीमती वस्त्र खरीदना समृद्धि को आमंत्रित करता है। पारंपरिक समझ यह है कि धन देवी लक्ष्मी मृदु और स्थिर संपत्ति को पसंद करती हैं और त्युहार के शुभ संयोग में खरीदी गई धातुएँ घर में समृद्धि टिकाने का साधन बनती हैं।
व्याख्या और परंपराएँ:
- ऐतिहासिक निरूपण: पुरानी अर्थव्यवस्थाओं में सोना‑चांदी पारंपरिक प्रकार की चल संपत्ति थी; त्यौहार पर खरीदी को बचत और सुरक्षा की भूमिका मिली।
- सांस्कृतिक भिन्नता: कुछ परिवारों में यह क्रिया प्रतीकात्मक रूप लेती है — एक छोटा सिक्का या चम्मच खरीदकर भी संतोष माना जाता है।
- आधुनिक परिप्रेक्ष्य: अर्थशास्त्र के नज़रिए से भी त्योहारों पर मांग में वृद्धि होती है; कई लोग इसे निवेश का अवसर मानते हैं, पर वित्तीय सलाहकार अक्सर समय‑सारिणी और मूल्य‑स्थिति देखने की सलाह देते हैं।
2. धनवंतरी पूजन और स्वास्थ्य की कामना
धनतेरस का नाम ‘धन’ और ‘त्रयोदशी’ से जुड़कर धनवंतरी — आयुर्वेद के आधारशिल्प भगवान — की स्मृति भी जगाता है। लोककथाओं और कुछ पौराणिक वर्णनों में धनवंतरी का समुद्र मंथन के बाद प्रकट होना इस तिथि से जोड़ा जाता है। इसलिए कई घरों और मंदिरों में इस दिन स्वास्थ्य, आयु और रोगमोचन की कामना के लिए विशेष पूजा होती है।
तथ्य और दृष्टिकोण:
- धार्मिक संदर्भ: कुछ पौराणिक कथाएँ धनवंतरी के प्रकट होने को समेटती हैं; विभिन्न पुराणों और स्थानीय परंपराओं में विवरण बदलते हैं।
- समाज और चिकित्सा: परंपरागत रूप से यह दिन रोग मुक्ति और आयुर्वृद्धि का प्रतीक रहा है, इसलिए परिवारों में दवा‑बस्तुओं, आयुर्वेदिक सामग्रियों या चिकित्सा साधनों का आदान‑प्रदान भी देखने को मिलता है।
3. दीप जलाना और घर‑सफाई: अंधकार हटाकर शुभता बुलाना
धनतेरस पर घर की सफाई, दरवाजे‑खिड़कियों की मरम्मत और दीप जलाने की परंपरा बहुत प्रचलित है। धार्मिक रूप में इसे अज्ञानता (अंधकार) हटाकर ज्ञान और समृद्धि (प्रकाश) लाने के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। लोकधर्म में यह क्रिया न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सामाजिक संकेत भी देती है—अतिथि‑सत्कार और सद्भावना की तैयारी।
- प्रायोगिक कारण: पुराने समय में दीप और सफाई प्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा, कीटों की रोकथाम और सार्वजनिक संकेत का काम करती थीं।
- विविधता: कुछ समुदाय रंगोली, दियासज्जा और छोटे‑छोटे रोशनी प्रदर्शनों पर अधिक जोर देते हैं; कुछ और जगह शांति और संयम के साथ सुप्त मान्यताओं का पालन होता है।
4. मुहूर्त और तिथि का महत्व—पंचांग से जुड़ी सावधानियाँ
धनतेरस को विशेष तिथिगत महत्व दिए जाने के कारण कई परिवार खरीद‑दुकान या पूजा के लिए शुभ मुहूर्त देखते हैं। पारंपरिक ग्रंथ और ढेरों पंडित तिथि, नक्षत्र और राहु‑काल के अनुसार उपयुक्त समय सुझाते हैं।
- विविधता का स्वीकार: विभिन्न समुदाय अलग‑अलग पंडांगों और स्थानीय प्रथाओं का पालन करते हैं; इसलिए एक ही दिन दूसरों के लिए अलग‑अलग शुभ या सामान्य माना जा सकता है।
- निहित अर्थ: शास्त्रीय विधियों में समय‑बेला का चयन कर्मफल और स्थापित परंपरा से जुड़ा माना गया है; आधुनिक घरों में भी कई लोग पंडांग देखकर ही बड़े फैसले लेते हैं।
5. व्यापारिक आरम्भ और लेखापरीक्षा—आर्थिक वर्ष का प्रतीक
कई व्यापारिक समुदाय धनतेरस और दीवाली के समय को नए लेखों का आरम्भ, तिजोरी खोलने या पुस्तक‑पुजन का समय मानते हैं। पारंपरिक रूप से यह समय पिछले वर्ष के लेखे‑जोखे करके, नए पात्र तैयार कर के आर्थिक समुच्चय नवीनीकरण का प्रतीक रहा है।
- समुदायगत भिन्नता: गुजराती, मारवाड़ी और कुछ वैश्य समुदायों में यह प्रथा अधिक स्पष्ट है; जबकि अन्य समुदाय परंपरागत नववर्ष या अन्य धार्मिक दिनों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
- आधुनिक वित्तीय अर्थ: आज के समय में कर‑नियम और बैंकिंग कैलेंडर अलग होने से वास्तविक वित्तीय वर्ष अलग हो सकता है; पर सांस्कृतिक दृष्टि से धनतेरस का आर्थिक आरम्भ महत्वपूर्ण बना हुआ है।
निष्कर्ष
धनतेरस से जुड़ी मान्यताएँ धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक श्रोतों का मिश्रण हैं। कुछ बातें—जैसे लक्ष्मी‑पूजन, धातु खरीदना, दीप प्रज्वलन—सभी में सामान्य दिखाई देती हैं, पर हर समुदाय और परिवार उनके पीछे के अर्थ और तरीके को अपनी परंपरा के अनुसार समझता है। शास्त्रीय कथाएँ और लोकविश्वास समय के साथ बदले हैं; आज के समय में पर्यावरण, आर्थिक समझ और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे कारक भी परंपरा के अर्थ को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए धनतेरस पर पारंपरिक विधियों का पालन करते हुए भी विवेक, दान‑भाव और सतत विकल्पों पर विचार करना कई धर्मशास्त्रियों और सामाजिक चिंतकों की सलाह है।