Diwali 2025: छोटी दिवाली पर हनुमान जी को चढ़ाएं ये खास प्रसाद, दूर होंगे संकट
दीवाली‑सीज़न में छोटी दिवाली (नरका चतुर्दशी) की शाम का अपना एक खास आध्यात्मिक और लोकधार्मिक महत्व है। कई समुदायों में यही दिन घर‑परिवार के छोटे‑छोटे कर्मकाण्डों, दान‑पुण्य और देवपूजा के लिए चुना जाता है; हनुमान जी को समर्पित भक्ति भी इस दिन पारंपरिक रूप से की जाती है क्योंकि उन्हें संकटमोचन और संकटहर के रूप में जाना जाता है। इस लेख में हम उन पारंपरिक और व्यवहारिक प्रसादों पर ध्यान देंगे जिन्हें छोटी दिवाली पर हनुमान जी को अर्पित करना शुभ माना जाता है — उनके धार्मिक अर्थ, लोकपरंपराएँ, समृद्धि और संकट से मुक्ति की रुपक व्याख्या, और घर में बनाने योग्य सरल रेसिपी। साथ ही हम बताएंगे कि किस प्रकार क्रमबद्ध भक्ति, संख्या (जैसे 11, 21, 108) और समय का पालन करके यह साधना अधिक सत्‑नियोजित और सुरक्षित बन सकती है। अंतिम भाग में विविध पारंपरिक मत और आधुनिक‑सुलेखित सावधानियों का उल्लेख रहेगा ताकि पाठक अपने स्थानीय पञ्चांग और परंपरा के अनुसार समझदारी से अनुष्ठान कर सकें।
हनुमान जी के लिए परंपरागत प्रसाद — कौन‑कौन से वस्तुएँ प्रचलित हैं
लोक परंपरा और मंदिर व्यवहार में कुछ प्रसाद बार‑बार देखने को मिलते हैं; इनका धार्मिक‑आधार और सांकेतिक अर्थ अलग‑अलग समुदायों में विवेचित किया जाता है:
- लड्डू (मोतीचूर/बेसन/बींदियाँ): सबसे आम प्रसाद। बल, समृद्धि और साधना की सरलता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- गुड़‑तिल (तिलगुल/तिल के लड्डू): सर्दियों और कार्तिक महीना में तिल‑गुड़ का विशेष महत्व है; तिल ऊर्जा और गुड़ स्थायित्व का प्रतीक माने जाते हैं।
- केले और सूखे मेवे: साधारण, उपलब्ध और पौष्टिक — कई मंदिरों में केला सामान्य भेंट होता है।
- सिंदूर व तेल: लोकआस्था में हनुमान जी को सिन्दूर और तेल चढ़ाने की परंपरा प्रसिद्ध है; यह उनकी बल और राम‑प्रेम के संकेत के रूप में समझा जाता है। (यह लोकप्रिय मान्यता है — शास्त्रगत सर्वत्र अनुपस्थित होने पर भी स्थानीय रीति में मजबूत प्रचलन है।)
- चने, मूंगफली, नारियल: प्राचीन और ग्रामीण परंपराओं में गर्म‑सूखा चना, भुनी मूंगफली या केवड़ा नारियल चढ़ाया जाता है।
- मधु/गुड़/शक्कर: मीठा अर्पण करना भी आम है, जो भक्ति के मिठास का रूपक है।
क्यों ये प्रसाद संकट हरने में सहायक माने जाते हैं — एक विवेचन
धार्मिक‑वेदांतिक दृष्टि से कहें तो हनुमान को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है। परंपरा में प्रसाद का अर्थ केवल भौतिक भोजन नहीं; यह समर्पण, श्रद्धा और अनुशासन का प्रतीक है। मनोवैज्ञानिक रूप में नियमित पूजा‑प्रसाद और निष्ठा से तनाव कम होता है, सामाजिक रूप में सहायता‑प्रार्थना और सामूहिक भक्ति से जुड़ाव बनता है — ये सभी कारक व्यक्तिगत कठिनाइयों को हल करने में मददगार साबित होते हैं। विभिन्न ग्रंथों में सीधे तौर पर ‘कौन‑सा प्रसाद संकट हटाता है’ जैसा एकरूप निर्देश नहीं मिलता; इसलिए स्थानीय पंडितों और परंपराओं का पालन ही सर्वाधिक मानक माना जाता है।
संख्या और समय: किस समय और कितनी बार अर्पण करें
अनेक परंपराएँ 11, 21 या 108 जैसे अंक प्रयोग करती हैं। हिंदू अनुष्ठानशास्त्र और लोकसंख्या दोनों में ये संख्याएँ मनोवैज्ञानिक और सांकेतिक महत्व रखती हैं (11 — आरम्भिक आकांक्षा, 21 — विस्तारित समर्पण, 108 — पूर्णता/परम परंपरा के संकेत)। समय के लिए लोकप्रिय विकल्प:
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त (स्थानीय पंचांग के अनुसार) — शांत और केन्द्रित पूजा के लिए उपयुक्त।
- नारक चतुर्दशी की सुबह/शाम — लोकपरंपरा के अनुसार चतुर्दशी के दिन।
- यदि मंदिर जाकर अर्पण कर रहे हों तो मंदिर के निर्धारित आराधना समय का पालन करें।
सरल घरेलू रेसिपी (त्वरित और पारंपरिक)
नीचे तीन सरल प्रसाद रेसिपी दी जा रही हैं जिन्हें छोटी दिवाली पर घर पर बनाया जा सकता है — सारे वेज, बिना मांसाहार के और साबुत सफाई के साथ तैयार करें:
- बेसन का लड्डू
- सामग्री: 2 कप बेसन, 1 कप घी, 1 कप पिसी चीनी या गुड़, 1/4 चम्मच हींग (वैकल्पिक), थोड़ी कुटी इलायची।
- विधि: घी में बेसन को सुनहरा भूरा और खुशबूदार होने तक भूनें; ठंडा करके चीनी और इलायची मिलाकर लड्डू बनाएं।
- तिल‑गुड़ लड्डू
- सामग्री: 1 कप तिल, 1 कप गुड़, थोड़ा घी।
- विधि: तिल को हल्का भूनकर रख लें; गुड़ को पिघला कर तिल मिलाकर छोटी गोलियां बनाएं।
- मोतीचूर/बूंदी लड्डू (सरल तरीका)
- सामग्री: तैयार बूंदी (या बाजार से), 1 कप चीनी, 1/4 कप पानी, केसर/इलायची।
- विधि: शीरा बनाकर बूंदी मिलाकर लड्डू बना लें। मंदिर शुद्धता का ध्यान रखें।
पुरोहित/सम्प्रदायिक विविधताएँ और सावधानियाँ
सम्प्रदाय अनुसार रीति‑रिवाज बदलते हैं: वैष्णव परंपराओं में अधिकतर शुद्ध भजन‑पाठ और प्रसाद, ग्रामीण समुहों में तिल‑गुड़ का जोर, और कुछ स्थानों पर विशेष मन्दिरीय पकवान प्रचलित होते हैं। प्रसाद बनाते और अर्पित करते समय यह ध्यान रखें:
- साफसफाई, शुद्धता और इरादे (सत्कृति) सबसे आवश्यक हैं।
- यदि परिवार में खाद्य एलर्जी हो (जैसे तिल, मेवा), वैकल्पिक प्रसाद रखें।
- शास्त्रगत निर्देशाें के बजाय स्थानीय पंडित/मंदिर परंपरा का सम्मान करें।
- सिंदूर का प्रयोग करते वक्त सच्चे सामग्री का उपयोग और सुरक्षा का ध्यान रखें; बच्चों और पालतू जानवरों से दूर रखें।
अंत में — श्रद्धा का महत्व और स्थानीय पञ्चांग देखें
छोटी दिवाली पर हनुमान जी को अर्पित प्रसाद का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा और आत्मसमर्पण को प्रकट करना है। परम्परा, संख्या और विशेष व्यंजनों का पालन करने से मानसिक अनुशासन और सामाजिक समर्थन मिलता है, जो संकटों से पार पाने में सहायक होता है। चूंकि तिथियाँ और मुहूर्त क्षेत्रीय पञ्चांग पर निर्भर करते हैं, इसलिए 2025 की नारक चतुर्दशी/छोटी दिवाली के लिए अपने स्थानीय पंचांग या मन्दिर के समय-सारिणी की पुष्टि अवश्य कर लें। अंततः, भक्ति‑निष्ठा, संयम और दूसरों के प्रति दया — यही वास्तविक संकटमोचन के स्थायी साधन माने जाते हैं। ॐ नमो हनुमते नमः।