Diwali 2025: क्या है लाभ पंचमी? जानें गुजरात में कैसे मनाया जाता है ये त्योहार
दिवाली 2025 के संदर्भ में जब घरों में दीपक जलते और खातों की पुस्तिकाएँ साफ़ होती हैं, उसी श्रृंखला में एक विशेष दिन आता है जिसे गुजरात और आसपास के कई व्यापारिक समुदायों में लाभ पंचमी कहा जाता है। यह दिन पारंपरिक रूप से नए लेखों, व्यापारिक लेन‑देन और लाभ की कामना के लिए शुभ माना जाता है। धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं की विविधता के बीच लाभ पंचमी का संदेश अक्सर आर्थिक समृद्धि के साथ साथ सामूहिक कर्तव्य और शुभारम्भ का भी होता है। यहाँ हम तिथि‑पारंपरिकता, ऐतिहासिक संदर्भ और गुजरात में मनाने के तरीकों का विवेचन करेंगे ताकि पाठक समझ सकें कि यह पर्व किन ग्रंथीय और लोकानुमानिक विचारों पर टिका है, कौन‑कौन से कार्य विशेष रूप से किये जाते हैं, और 2025 में इसका महत्व किस तरह रखा जाना चाहिए।
लाभ पंचमी — तिथि और ज्योतिषीय परिभाषा
लाभ पंचमी पारंपरिक हिंदू पञ्चांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी (पाँचमी) को आती है। दिवाली अमावस्या (अँधेरी रात) के बाद शुक्ल पक्ष आरम्भ होता है; उस शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि को लाभ पंचमी कहा जाता है। तिथियों का गणित चंद्र‑स्थिति पर निर्भर करता है, इसलिए लाभ पंचमी का ग्रेगोरियन कैलेंडर में स्थायी दिन नहीं होता — स्थानीय पञ्चांग देखकर ही 2025 का सटीक ग्रेगोरियन दिन निर्धारित करना चाहिए। ज्योतिषीय दृष्टि से यह दिन शुभ माना जाता है और व्यापार के आरम्भ, लेख‑खाता खोलने और समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए अनुकूल ग्रहस्थिति बतलाई जाती है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अर्थ
“लाभ” शब्द से स्पष्ट है कि यह दिन आर्थिक समृद्धि से जुड़ा है। ऐतिहासिक रूप से गुजरात का व्यापारिक समुदाय समुद्री व सूखा‑व्यापार दोनों में सक्रिय रहा है; ऐसे समुदायों ने व्यापार‑सत्रों की शुरुआत और खातों के खुलने के लिए सामूहिक तिथियों को महत्व दिया। ग्रंथीय संदर्भों में, पुराणों और व्यवहारसूत्रों में प्रत्यक्ष “लाभ पंचमी” का उल्लेख सीमित है — यह अधिकतर लोकपरम्परा और कुटुंबीय आर्थिक व्यवहारों से विकसित हुआ माना जाता है। कुछ पहलुओं में यह दिन देवी लक्ष्मी‑गणेश के पूजन से जुड़ जाता है, जबकि अन्य समुदायों में इसे नए लेखों (खाते) की पूजा और तिलक‑होम की तरह मनाया जाता है।
गुजरात में लाभ पंचमी कैसे मनाई जाती है
- चौपड़ा/खाता पूजा: कई गुजराती घरों और दुकानों में व्यापार‑किताबों (खातों) की पूजा की जाती है। पुराने खाते बंद कर नए खाते खोले जाते हैं और परंपरागत तरीक़े से हार्दिक शुभकामनाएँ दी जाती हैं।
- देवी‑पूजा और दीप‑प्रदीप: लक्ष्मी और गणेश की साधारण आराधना होती है; कुछ स्थानों पर स्थानीय देवी‑देवताओं को भी याद किया जाता है।
- शुभारम्भ और सौदे: व्यवसायिक घराना नए अनुबंध, निवेश या व्यापारिक साल का आरम्भ इसी दिन करता है।
- सामुदायिक समागम: छोटे‑मोटे उत्सव, भंडारे और मेलों का भी आयोजन देखने को मिलता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ व्यापारी समुदायों का घनत्व अधिक है।
- दान‑दान कर्म: परंपरागत रूप से लाभ के अवसर पर दान को भी शुभ माना जाता है—खाद्य, वस्त्र या पैसे का दान स्थानीय धर्मशालाओं एवं ज़रूरतमंदों को दिया जाता है।
पूजा‑विधान और व्यवहारिक रीतियाँ
रिवाज स्थानीय समुदाय और परिवार की परंपरा पर निर्भर करते हैं। आम तौर पर विधि‑रूप कुछ इस तरह होता है: पूजा स्थल को साफ़ किया जाता है, खाता‑पुस्तकें सफेद कपड़े पर रखी जाती हैं, हल्दी‑कुँद और रोली से तिलक किया जाता है, दीपक जलाये जाते हैं और छोटी‑सी प्रार्थना के बाद खातों पर चरणामृत/कुमकुम छिड़का जा सकता है। व्यापारियों के बीच इस दिन लाभ के प्रतीक जैसे सिक्के, चावल‑कुट्टी और मिठाइयाँ रखे जाने का चलन है। कई परिवार वित्तीय लिखत पर हस्ताक्षर करते हुए अन्न, फल और गुढ़ का प्रसाद बाँटते हैं।
विविधता और वैचारिक दृष्टिकोण
धार्मिक‑दृष्टि से देखें तो कुछ पाँथों में दिव्य‑अन्वेषण और आर्थिक‑कर्तव्यों के संयोजन को महत्त्व दिया गया है। उदाहरण के लिए, वैष्णव परंपराओं के स्थानीय अनुष्ठानों में लक्ष्मीपूजा का विशेष स्थान होता है, जबकि शैव या स्मार्त घरों में यह दिन पारिवारिक रिवाज की तरह मनाया जा सकता है। जैन और अन्य समुदाय भी अपने संस्कारानुसार लाभ‑सम्बन्धी कार्य करते हैं; इसलिए सार्वजनिन व्याख्या देना कठिन है और उसे स्थानीय प्रथाओं के अनुसार समझना बेहतर है।
व्यावहारिक सुझाव और सावधानियाँ
- सटीक तिथि‑घड़ी के लिए अपने क्षेत्र का पञ्चांग या पुजारी देखें — स्थानीय समयानुसार तिथियाँ बदलती हैं।
- वाणिज्यिक दस्तावेज़ खोलते/हस्ताक्षर करते समय कानूनी सलाह और उचित लेखा‑जोखा रखें; धार्मिक शुभता आर्थिक विवेक की जगह नहीं लेती।
- सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से दीयों और पटाखों के प्रयोग में संतुलन रखें; दान और सामूहिक सहायता को प्राथमिकता दें।
निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि लाभ पंचमी गुजरात की जीवंत लोकधारणा और व्यापारिक परंपरा का संयोजन है — यह आर्थिक शुभारम्भ, आध्यात्मिक कामना और समुदायिक पुनरुत्थान का प्रतीक रहा है। 2025 में भी यह दिन उसी संयोजन के साथ देखा जाएगा, परन्तु सटीक तिथि और शुभक्षण के लिए स्थानीय पञ्चांग के आधार पर योजना बनाना आवश्यक है।