Diwali 2025: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट में क्या है अंतर? जानें यहां
Diwali is not a single ritual but a cluster of observances spread over several days; the day after Lakshmi Puja is often marked by Govardhan Puja and by Annakut. Though many people use the two names interchangeably, they emphasize different stories and practices: Govardhan Puja commemorates Krishna’s lifting of Govardhan Hill to shelter villagers from Indra’s storm, and has scriptural roots in the Bhagavata Purana; Annakut—literally ‘a mountain of food’—highlights thanksgiving through the offering of a large variety of cooked dishes (bhog) to the deity. In some Vaishnava and temple traditions Annakut becomes an elaborate public festival; in village homes Govardhan Puja centres on a symbolic hill made of cow dung or foodstuffs and on worship of cows and nature. This article explains the historical and ritual distinctions, regional variations, and contemporary meanings of these related but distinct observances during Diwali 2025. It also touches on ecological and devotional angles.
तिथि और समय
दोनों पर्व सामान्यतः कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को आते हैं — यानी कार्तिक अमावस्या (जिस पर दीपावली/लक्ष्मी पूजा होती है) के अगले दिन। इस तिथि का निर्धारण क्षेत्रीय पंचांग और स्थानिक समय के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानिक मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंचांग या मंदिर से सत्यापन करना आवश्यक है।
पौराणिक और साहित्यिक आधार
Govardhan पूजा का मुख्य आख्यायिका Srimad Bhagavatam (दशम स्कंध, गोवर्धन लीला के अध्याय) में मिलती है जहाँ कृष्ण ने इंद्र के क्रोध से गाँव वालों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठा लिया था। यह कथा प्रकृति और ग्राम-जीवन के प्रति कृतज्ञता और इंद्र के अहंकारी स्वरूप के विरोध का प्रतीक बन गई। Annakut का शब्दसंधि-आधार भौतिक रूप से ‘अन्नकूट’ — भोजन का ढेर — है; यह भोग/दान और धन्यवाद का प्रतिरूप है और बाद के संस्थागत मंदिर-रसमों में विकसित हुआ।
घर की रीतियाँ — गोवर्धन पूजा
- लोकप्रिय रूप से घरों में गोवर्धन या ‘गोवर्धन पर्वत’ का प्रतीक बनाया जाता है, अक्सर गोबर, मिट्टी या पकवान के छोटे-छोटे टुकड़ों से पहाड़ी जैसा गठन किया जाता है।
- ध्यान, मंत्रोच्चारण (जैसे गोवर्धन स्तुति), आरती और गायों का पूजन प्रचलित है। कई गाँवों में गायों को सजाकर चारा और घास चढ़ाई जाती है।
- कई समुदायों में परिक्रमा और स्थानीय रीति-रिवाज जैसे लोकगीत, नर्तन या गांव-स्तर की आतिथ्य परंपरा जुड़ी रहती हैं।
मंदिर और सामुदायिक रीतियाँ — अन्नकूट
- Annakut में मंदिरों में देवता के सामने किस्तों और थालों में बहुत सारी पकवानों को पर्वत जैसी आकृति में सजाकर समर्पित किया जाता है। यह सार्वजनिक भोग और प्रसाद वितरण का अवसर बनता है।
- कुछ वैष्णव परंपराओं में विशेष रूप से ‘छप्पन भोग’ (56 व्यंजन) या परंपरागत व्यंजन सूची होती है; ISKCON, स्वामीनारायण और अन्य मठ-सम्प्रदायों में यह परम्परा व्यवस्थित रूप से दिखाई देती है।
- भजन‑कीर्तन, पाठ, और सामूहिक प्रसाद वितरण इस दिन के मुख्य सामाजिक-धार्मिक पहलू होते हैं।
मुख्य अंतर और ओवरलैप
- कथा बनाम क्रिया: Govardhan पूजा मुख्यतः गोवर्धन लीला (कथा) और प्रकृति‑पूजा पर केन्द्रित है; Annakut मुख्यतः भोजन‑भोग और सार्वजनिक धन्यवाद पर केन्द्रित है।
- घरेलू बनाम संस्थागत: घरों में अक्सर गोवर्धन का छोटा प्रतीक बनता है; मंदिरों में Annakut का भव्य प्रदर्शन होता है।
- सामंजस्य: कई स्थानों पर दोनों एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं — घरों और मंदिरों में एक साथ गोवर्धन‑पूजा और अन्नकूट दोनों होते हैं।
क्षेत्रीय विविधताएँ
भारत के विभिन्न भागों में यह दिन अलग‑अलग नामों और जोड़ियों के साथ आता है। मथुरा‑ब्रिंहवान में गोवर्धन पूजा का ऐतिहासिक और तीव्र रूप देखने को मिलता है जहाँ पारंपरिक परिक्रमा और स्थानीय भोग विशेष रूप से प्रचलित हैं। गुजरात और कुछ पश्चिमी समुदायों में अन्नकूट और नये वर्ष के स्वागत की परंपराएँ (स्थानीय रूपों में) जुड़ी होती हैं। महाराष्ट्र तथा कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में इस दिन से कई स्थानीय कथाएं जुड़ी रहती हैं; साथ ही कुछ स्थानों पर Bali Pratipada या पञ्चमी‑सम्बन्धी लोककथाएँ भी एक ही समय‑सीमा में मनाई जाती हैं — परन्तु ये अलग पौराणिक प्रसंगों को दर्शाती हैं।
आधुनिक अर्थ और पर्यावरणीय संदेश
आज के समय में गोवर्धन पूजा पर पर्यावरणीय और कृषि‑आधारित अर्थ पर भी जोर दिया जाता है — प्रकृति की कृतज्ञता, पशुपालक जीवन और ग्राम‑आर्थिक नेटवर्क की भूमिका का स्मरण। अन्नकूट की परंपरा समुदायिक साझा खाने और दान की भावना को बढ़ाती है। मंदिरों के आयोजन सामाजिक एकता और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालते हैं; इसी कारण कई सामाजिक संस्थाएँ इस दिन भोजन वितरण और पशु‑कृपा‑कार्य भी आयोजित करती हैं।
यदि आप मनाना चाहते हैं — संक्षिप्त सुझाव
- तिथि और मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग की पुष्टि करें।
- सरलता को प्राथमिकता दें: छोटा गोवर्धन‑प्रतीक, घर में चौकस तरीके से पकवान तैयार कर वेद/स्तुतियाँ पढ़ें और प्रसाद बांटें।
- भोजन अधिक मात्रा में बनाते समय उसे बाँटने और जरूरतमंदों को देने का प्रबंध रखें—यह अन्नकूट का मूल भाव है।
- गायों, पालतु पशुओं और स्थानीय जीवों के लिए दाना-चारा रखना पारंपरिक और संवेदनशील अभ्यास है।
- स्थानीय मठ या मंदिर से परंपरा और क्रम के बारे में सलाह लें — परंपराएँ समुदाय और संप्रदाय के अनुसार बदलती हैं।
अंततः Govardhan पूजा और Annakut एक ही पर्व‑परंपरा के दो पहलू हैं: एक कथा‑आधारित, प्रकृति‑कृतज्ञता का और दूसरा सामुदायिक, भुक्ति‑धर्म का। दोनों में कृतज्ञता, साझा करने का सिद्धांत और धार्मिक भावना प्रमुख हैं। विभिन्न सम्प्रदाय और क्षेत्र इन रीतियों को अपने सांस्कृतिक और दैवीय दृष्टिकोण से समझते और मनाते हैं; अपने स्थानीय मंदिर या विद्वान से परामर्श करके आप अपनी पारंपरिक और समवर्तमान भावनाओं के अनुरूप उपयुक्त रूप अपना सकते हैं।