गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का क्या है महत्व? जानें पूरी कहानी
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा—जिसे ब्रज में परिक्रमा या परिक्रमा-यात्रा कहा जाता है—के पीछे एक जीवंत धार्मिक, सामाजिक और दार्शनिक परंपरा है। इसे केवल एक तीर्थयात्रा नहीं माना जाता, बल्कि कृष्ण-लीला की स्मृति, ग्राम-आधारित अर्थशास्त्र की पूजा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रत्यक्ष अभ्यास भी है। परिक्रमा के किस्से पुराणों और लोक-श्रद्धा में मिले हुए हैं; श्रीमद्भागवत (दशम स्कन्ध में गोवर्धन-लीला का वर्णन) जैसे ग्रंथ तथा लोक-कथाएँ इस पर्वत के चारों ओर होने वाली भक्ति-क्रियाओं को जीवंत करते हैं। परिक्रमा केवल कटुवादियों की अनुमति या किसी एक पंथ का चिह्न नहीं है—विभिन्न वैष्णव, स्मार्त और स्थानीय पारंपरिक धाराएँ इसे अपने ढंग से समझती हैं, पर सबमें प्रकृति-पूजा, समुदाय और कृष्ण की रक्षक-भक्ति की केंद्रीयता दिखती है।
पुराणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
गोवर्धन-लीला का सबसे प्रसिद्द संस्करण श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा है—जब इन्द्रोपासना के कारण इन्द्र ने गाँव पर वर्षा करवा कर विनाश करने की कोशिश की, तब कृष्ण ने पर्वत उठाकर ग्रामवासियों और पशुओं को आश्रय दिया। वैष्णव परंपरा इसे भक्ति और लोक-जीविका के रक्षण का प्रतीक मानती है: कृष्ण ने व्रजवासियों को शास्त्रीय यज्ञ-पूजा से हटाकर पृथ्वी‑आधारित उपज और सामुदायिक सहयोग की महत्ता दिखाई। इस कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत (दशम स्कन्ध के संबंधित अध्याय) तथा कई लोक-पुराणों में मिलता है।
आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ
परिक्रमा का अर्थ एक साथ कई स्तरों पर समझा जाता है:
- भक्ति‑आधार: वैष्णव व्याख्याएँ कहती हैं कि गोवर्धन की परिक्रमा कृष्ण‑भक्ति का अभ्यास है—प्रत्येक कदम में कृष्ण को समर्पित करना और उनकी दया की स्मृति बनाए रखना।
- प्राकृतिक सद्भाव: आधुनिक विचारकों और कुछ पुरोहितों का कहना है कि यह पृथ्वी‑आश्रित अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी की पूजा का रूप है—पर्वत को अन्नदाता और रक्षक माना जाता है।
- समुदाय और ग्राम‑संरचना: परिक्रमा ग्रामीण जीवन की पुनर्स्थापना करती है; ग्रामवासियों की साझा भक्ति, भोजन-वितरण (अन्नकूट) और पशु‑पाला को मान्यता मिलती है।
- धार्मिक संवाद: स्मार्त और वैदिक परंपराओं में यह एक प्रकार की चुनौती और संशोधन का प्रतीक भी मानी जाती है—कृष्ण ने यज्ञ‑केंद्रित आध्यात्मिकता से बड़े, लोक‑केंद्रित धर्म की ओर संकेत किया।
परिक्रमा का व्यवहारिक स्वरूप
परम्परागत रूप से गोवर्धन की परिधि लगभग 21–23 किलोमीटर बताई जाती है; सटीक दूरी पैदल चलने के मार्ग और स्थानीय विवरणों के अनुसार थोड़ी बदल सकती है। परिक्रमा प्रायः वाम‑गति (वामावर्त) यानी पर्वत के वाम दिशा में चक्कर लगाते हुए की जाती है—यह हिंदू परिक्रमा का सामान्य तरीका है। भक्त समयानुसार पूरा रास्ता एक दिन में भी करते हैं, पर कई लोग ‘दण्डवत परिक्रमा’ या पूर्ण प्रणाम करके कई दिनों तक भी लगाने का अभ्यास करते हैं, जिससे यात्रा शारीरिक रूप से अधिक चुनौतीपूर्ण और आत्मकेंद्रित हो जाती है।
अनुष्ठान और स्थानिक चिन्ह
मार्ग में छोटे‑बड़े कई तीर्थस्थान, मंदिर, घाट और स्मृति‑स्मारक आते हैं जहाँ भक्त ठहरकर स्तोत्र, भजन‑कीर्तन और अर्चना करते हैं। परिक्रमा के दौरान अन्नकूट—जन समुदाय द्वारा बनाए गए बड़े खाने—का विशेष महत्व है; गोवर्धन पूजन और अन्नकूट का पर्व दीवाली के अगला दिन, अर्थात् कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (गोवर्धन पूजा/अन्नकूट) पर बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। भक्त कई बार गायों का सम्मान और भोजन भी करते हैं—यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रति सम्मान की परम्परा को दर्शाता है।
विविध व्याख्याएँ और पारम्परिक भेद
धार्मिक‑वैचारिक स्तर पर व्याख्याओं में अंतर है। वैष्णव ग्रंथ और भागवत परंपरा इसमें कृष्ण की लीला और व्यक्तिगत भगवत्प्राप्ति पर जोर देती है। कुछ स्मार्त और स्थानीय ब्रज‑पारंपरिक व्याख्याएँ इसे स्थानीय देवता‑पूजा और कृषि‑समुदाय की रक्षा का उपाय मानती हैं। समकालीन विद्वान और पर्यावरण‑समीक्षक इसे पारंपरिक जीवनशैली और पर्यावरणीय चेतना के संकेत के रूप में पढ़ते हैं। लेखकों और पुरोहितों के बीच सहमति यही है कि गोवर्धन‑परिक्रमा केवल पौराणिक स्मृति नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार है।
कब और कैसे शामिल हों: व्यवहारिक सुझाव
- सबसे उपयुक्त समय: ठंडी ऋतुएं (अक्टूबर–मार्च) और विशेषतः कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीवाली के अगले दिन) पर परिक्रमा लोकप्रिय रहती है।
- तैयारी: पैदल चलने के लिए ठीक जूते, पानी, सरल शाकाहारी भोजन और सन‑प्रोटेक्शन जरूरी है; दण्डवत आदि श्रमसाध्य अनुष्ठान करने पर अधिक समय लें।
- सांस्कृतिक संवेदनशीलता: स्थानीय नियमों का पालन करें—कई पवित्र स्थानों पर जूते हटाने, मांस-मदिरा से बचने और शान्ति बनाए रखने की अपेक्षा होती है।
- सम्प्रदायिक सम्मान: विभिन्न पंथों से आने वाले श्रद्धालु मिलते हैं; उनकी पूजाविधि का सम्मान करें और स्थानिक पुजारी/समुदाय की निर्देशित नियमों का पालन करें।
निष्कर्ष
गोवर्धन परिक्रमा एक बहु‑आयामी धार्मिक अभ्यास है जो लोककथा, पुराणिक स्मरण, समुदाय‑निर्माण और प्रकृति‑पूजा को एकीकृत करती है। वैष्णव भक्ति से लेकर स्थानीय कृषि‑संस्कृति तक, यह यात्रा समय के साथ बदलती सामाजिक अवस्थाओं के बावजूद ब्रज की धार्मिक चेतना का एक सजीव अंग बनी हुई है। ज़्यादा दूरगामी दृष्टि से देखा जाए तो गोवर्धन‑परिक्रमा आज पर्यावरणीय संवेदना और सामुदायिक सहकार का भी प्रतीक बन सकती है—परंपरा का वह अभ्यास जो पृथ्वी‑आश्रित जीवन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता को बार‑बार स्मरण कराता है।