Diwali 2025: इस दिवाली इन रंगों के कपड़ों से करें मां लक्ष्मी को प्रसन्न
इस दिवाली, कपड़ों के रंगों का चुनाव सिर्फ फैशन का सवाल नहीं बल्कि परिवार की परंपरा, प्रतीकात्मकता और मनोभाव का भी प्रतिबिम्ब होता है। पारंपरिक रूप से दिवाली—जो कार्तिक मास की अमावस्या (कार्तिक अमावस्या) के दिन मनाई जाती है—को माता लक्ष्मी का आगमन और आराधना से जोड़ा गया है। रंगों के माध्यम से हम सुख, समृद्धि, शुद्धता और सौभाग्य का संकेत देते हैं; इसी कारण विभिन्न सम्प्रदायों और क्षेत्रों में कुछ रंगों को विशेष महत्व दिया जाता है। नीचे दिए गए सुझाव धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों, व्यवहारिक उपयोग और क्षेत्रीय विविधताओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं, ताकि आप अपने घर और पूजा के अनुसार समझदारी से और सम्मान के साथ रंग चुन सकें।
रंगों का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अर्थ
रंगों के अर्थ समय, स्थान और सम्प्रदाय के अनुसार बदलते हैं; इसलिए यहां दिए गए बोधक अर्थ व्यापक परंपराओं और स्थानीय प्रथाओं का संयोजन हैं, न कि किसी एक ग्रंथीय आदेश का अनुवर्तन।
- लाल: शक्ति, उर्जा, शुभ कार्य और देवी आराधना के साथ गहरा संबंध। कई शाक्त परंपराओं में लाल वस्र और सिंदूर का उपयोग देवी-पूजन में विशेष रूप से किया जाता है।
- केसरिया/संतरी: त्याग, तप और आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक; वैष्णव और शैव परंपराओं में भी पारंपरिक रूप से प्रयोग होता है।
- पीला/केसर: ज्ञान, समृद्धि, और विष्णु-सम्बन्धी दर्शनों में शुभ माना जाता है; कई गृहस्त पूजाओं में पीला अन्न-भोजन और वस्त्र अच्छे फल का संकेत समझे जाते हैं।
- हरा: प्रजनन, नवजीवन, फसल-समृद्धि और प्रकृति से जुड़ा संकेत; कुछ समुदायों में हरित रंग शुभ माना जाता है।
- सफेद: शुद्धता और शान्ति का प्रतीक। हालांकि, कई क्षेत्रों में सफेद को शोकवस्त्र माना जाता है, इसलिए विवाह या उत्सव में सफेद पहनने के परंपरागत विरोध का भी उल्लेख प्रासंगिक है।
- सोना/धातु स्वर: लक्ष्मी का प्रत्यक्ष प्रतीक—विजय, संपदा और वैभव दिखाने के लिए परिधान पर सुनहरी कढ़ाई या जरी का प्रयोग अत्यंत प्रचलित और उपयुक्त है।
विशेष रंग और संयोजन — लक्ष्मी-आकर्षक विकल्प
नीचे दिए गए रंग और संयोजन पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक पहनावे दोनों को ध्यान में रखते हुए सुझाए गए हैं। प्रत्येक सुझाव के साथ संवेदनशीलताएँ भी जोड़ी गई हैं ताकि आप पारिवारिक रीति के अनुरूप निर्णय ले सकें।
- लाल + सोना: सबसे पारंपरिक और दृश्यात्मक रूप से समृद्ध संयोजन। देवी-आराधना में, लाल वस्त्र और सोने का आभूषण शुभता बढ़ाते हैं। (कहने वालों के अनुसार शाक्त परंपराओं में प्रमुख)
- पीला/नारंगी + सफेद/सोना: वैष्णव-मत और गृहस्थ संस्कारों के अनुरूप; पीले रंग की सूती या रेशमी पोशाक पर सुनहरे बॉर्डर से संयमित वैभव नज़र आता है।
- हरा + सोना/क्रीम: प्रकृति और समृद्धि का मेल; नववर्ष की तरह नए आरंभों के लिए उपयुक्त।
- सफेद + लाल बॉर्डर (पश्चिम बंगाल शैली): बंगाल और कुछ पूर्वोत्तर परंपराओं में यह संयोजन विशेष उत्सवात्मक माना जाता है—लाल चटकीलेपन को लक्ष्मी की अनुकंपा के रूप में देखा जाता है।
- गुलाबी/रानी रंग + सोना: आधुनिक टोन, विशेषकर युवा वर्ग के लिए आकर्षक और पारिवारिक मिलन के अनुरूप।
- नीला/बैंगनी (हल्का): आध्यात्मिक गम्भीरता के साथ, यदि परंपरा अनुमति दे तो संक्षिप्त उपयोग से संतुलन बने रहता है—भारी, गहरे नीले से बचें जब तक आपकी पारंपरिक प्रथा उसे स्वीकार न करे।
कपड़ों के तंतु, बनावट और प्रतीक (प्रैक्टिकल सुझाव)
- वस्त्र चुनते समय: रेशम, बनारसी, जरी-ब्रोकेड और अच्छे सूती कपड़े दिवाली के अवसर पर पारंपरिक पसंद रहते हैं। इन पर सुनहरी कढ़ाई, लहजेदार बॉर्डर और पारम्परिक मोटिफ—कमल, गज, कलश—आदर्श होते हैं।
- नए वस्त्र: कई घरों में दिवाली पर नए वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है; यदि खरीदना संभव न हो तो अच्छी तरह सिले हुए और साफ-सुथरे पुराने वस्त्र भी उतने ही सम्मानजनक हैं।
- आभूषण: सोने या सुनहरी रंग की कलाकृतियाँ, सिक्के, मंगलसूत्र (परंपरा अनुसार), और पारिवारिक जेवर पूजन के समय शुभता बढ़ाते हैं।
- पुरुषों के लिए: हल्का रंगीन कुर्ता-पायजामा, bandh gala, या अंगवस्त्रम—सोने के झाकी के साथ—परंपरागत और सौम्य विकल्प हैं।
क्षेत्रीय विविधता और धार्मिक संवेदनशीलता
भारत भर में दिवाली के परिधान परंपरा अनुसार भिन्न होते हैं—दक्षिण में कासवु/क्रीम-सोनल सीमाएं, बंगाल में लाल-सफेद संयोजन, गुजरात-राजस्थान में उजले रानीटोन और शीशे की कढ़ाइयाँ—यह सब स्वीकार्य हैं। कुछ समुदायों में सफेद या कत्थई रंग उत्सव के अवसर पर उपयुक्त नहीं समझे जाते; इसलिए घर के वरिष्ट सदस्यों या परिवार की रीति का सम्मान करना बुद्धिमानी है।
अंततः — रंग के साथ मन और उद्देश्य
अंत में, किसी भी रंग का असली प्रभाव उस मनोभाव और आचार से आता है जिसके साथ आप पूजा करते हैं। शास्त्रीय दृष्टि में शुद्धता (स्वच्छता), नियत (इच्छा का सच्चापन) और दान-मन (उदारहृदयता) वही गुण हैं जो लक्ष्मी-प्रसन्नता की ओर ले जाते हैं—रंग केवल बाह्य संकेत हैं। इसलिए रंग चुनते समय पारिवारिक परंपरा, धार्मिक संवेदनशीलता और व्यक्तिगत शालीनता का मिश्रण रखें। यही तरीका दिवाली के पावन अवसर पर सर्वोत्तम और दीर्घकालिक शुभता लाने में सहायक होगा।