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Diwali 2025: गोवर्धन पूजा पर गोबर से ही क्यों बनाए जाते हैं गोवर्धन?

Diwali 2025: गोवर्धन पूजा पर गोबर से ही क्यों बनाए जाते हैं गोवर्धन?

दीवाली के अगले दिन मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा का केंद्र बिंदु अक्सर छोटे-छोटे ‘गोवर्धन’ होते हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से गोबर से बनाया जाता है। यह प्रथा सिर्फ लोक-सौंदर्य नहीं है; इसमें वैष्णव भक्त परंपरा, ग्रामीण जीवन के व्यवहारिक तत्त्व और प्रतीकात्मक अर्थों का मेल दिखता है। गोबर से निर्मित गोवर्धन का संबंध श्रीकृष्ण की लीला—गोकुल में गायों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाने—से जुड़ा है, पर इसके पीछे ठोस कारण भी हैं: गोबर घरों में उपलब्ध, गूदा जैसा चिपकने वाला और सुखने पर मजबूती देने वाला माध्यम है; धार्मिक ग्रंथों और गृहरचनाओं में गोबर का शुद्धिकरण एवं उपयोग दर्ज है; और सामुदायिक अनुष्ठान में यह व्यवहारिक, अर्थशास्त्रिक और पारिस्थितिक आयाम लेकर आता है। इस लेख में हम बारीकी से देखेंगे कि क्या-क्या धार्मिक, सामग्रीगत और सामाजिक कारण हैं जिनकी वजह से गोवर्धन बनाने में गोबर प्राथमिकता पाता है, तथा किन परिस्थितियों में विकल्प और आलोचना उभरती है।

तारीख़ और पारंपरिक प्रसंग

गोवर्धन पूजा सामान्यतः दिवाली के अगले दिन—कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन—मनाई जाती है। यह पर्व अन्नकूट के साथ जुड़ा है, जहाँ मंदिरों में और घरों में बहुत सारा भोजन देवलोक को अर्पित करने जैसा व्यवस्था की जाती है। ब्रज (वृंदावन, मथुरा) की परंपरा में गोवर्धन की विशेष महत्ता है क्योंकि पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं कृष्ण ने गोवर्धन उठाया और गोकुलवासियों को वर्षा-प्रकोप से बचाया।

धार्मिक और प्रतीकात्मक कारण

  • कृष्ण-गोचर परंपरा: गोवर्धन बनाना सीधे तौर पर कृष्ण की लीला की प्रतिकृति है—पहाड़ का स्वरूप देकर पूजा करना, ताकि भक्त उस संरक्षण और करुणा को स्मरण कर सकें जो कृष्ण ने गो-समाज को दी।
  • गौ-पूजा और गौ-सम्बन्ध: गोबर गाय से निकली वस्तु है; गाय हिन्दू धार्मिक जीवन में माता-समान मानी जाती है। गोबर का प्रयोग गौ-सम्बन्धी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का साधन बनता है।
  • पृथ्वीता और अनुष्ठानिक शुद्धि: गोबर को पारंपरिक रूप से स्वच्छ, शुद्ध और जीवन-समर्थक माना गया है; इसलिए धरती-आधारित अनुष्ठानों में इसकी उपस्थिति तर्कसंगत मानी जाती है।

व्यावहारिक और भौतिक कारण

  • सुलभता: ग्रामीण एवं पारंपरिक घरों में गोबर सहज उपलब्ध है, इसलिए बड़े सामूहिक अनुष्ठानों के लिए यह सस्ता और त्वरित विकल्प है।
  • मिश्रण और बनावट: गोबर में बसी जैविक नमी, रेशे और मिट्टी के साथ मिलाने पर यह उभरा हुआ, स्थिर ढाँचा देता है; सूखने पर यह कठोर हो जाता है जिससे बनावट बनी रहती है।
  • श्रेणीगत उपयोगिता: गोबर का उपयोग प्राचीन काल से फर्श पॉलिश, दीवार प्लास्टर, ईंधन और कापोलीकरण के लिए होता रहा है—यही बहुमुखी चरित्र इसे पूजास्थल पर भी उपयोगी बनाता है।

सूत्र और ग्रंथीय संदर्भ

कई गृहसूत्र, धर्मशास्त्रीय परंपराएँ और स्थानीय पुराणिक कथाएँ गोबर और गौ-संस्कार के उपयोग का उल्लेख करती हैं। कुछ पुराणों और मध्यकालीन भक्तिचर्या ग्रंथों में अन्नकूट और पर्वत-आकार के भोजन-प्रस्ताव के वर्णन मिलते हैं, हालांकि सीधे-सीधे “गोबर से गोवर्धन बनाओ” जैसे निर्देश सभी ग्रंथों में नहीं हैं। इसलिए यह कहना उचित होगा कि गोबर का प्रयोग स्थानीय परंपरा, गृहकार्याशास्त्र और लोक व्यवहार के सम्मिश्रण से स्थापित हुआ है—विशेषकर ब्रज क्षेत्र की वैष्णव साधना में।

क्षेत्रीय विविधताएँ और आधुनिक व्यवहार

  • ब्रज परंपरा: वृंदावन व मथुरा में पारंपरिक रूप से गोबर का प्रयोग अधिक रूप से देखा जाता है; गोवर्धन बनाकर परअन्नकूट चढ़ाया जाता है।
  • शहरी और दक्षिण भारत: शहरी मंदिरों और दक्षिणी राज्यों में मिट्टी, पेपर-मैशी, फूलों या पैकेज्ड साज-सज्जा का उपयोग भी सामान्य है। कुछ स्थानों पर केवल खाद्य सामग्री से ‘अन्नकूट’ बनाना प्राथमिक रहता है—गोबर का न्यून प्रयोग होता है।
  • समाजगत परिवर्तन: कस्बों और शहरों में स्वच्छता, स्वास्थ्य या सजावटी कारणों से विकल्प प्रचलित हुए हैं।

आधुनिक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य विचार

परंपरा का पर्यावरणीय पक्ष जटिल है। शुष्क गोबर ईंधन के रूप में जलाने पर वायु-गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है; वहीं जैविक गोबर का कम्पोस्ट या बायोगैस उत्पादन पारम्परिक उपयोग की तुलना में अधिक टिकाऊ विकल्प दिखता है। सामाजिक स्वास्थ्य दृष्टि से, यदि गोबर बिना सुखाए या उचित सफाई के रखा गया हो तो वह कीट और गंध का कारण बन सकता है। इसलिए कई समकालीन समुदायों ने संवेदनशील संतुलन अपनाया है: पारम्परिक अर्थ और रस्म निभाते हुए भी सुरक्षित, साफ-सुतरे विकल्प या ठीक सूखा व संसाधित गोबर चुनना।

आचार-व्यवहार—गोवर्धन बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • यदि पारंपरिक गोबर उपयोग करें तो सुनिश्चित करें कि वह स्वस्थ गायों का, बिना रासायनिक मिलावट का और अच्छी तरह सुखाया हुआ हो।
  • बच्चों और बुजुर्गों की स्वास्थ्य-सुरक्षा के लिए हाथ धोना और भोजन अलग रखना आवश्यक है।
  • इच्छा हो तो मिट्टी, फूल, अनाज या कागज के विकल्प अपनाएँ—धार्मिक अर्थ वही रहते हैं यदि श्रद्धा और कथा समझाई जाए।

निष्कर्ष

गोवर्धन पूजा पर गोबर से गोवर्धन बनाना एक बहुस्तरीय प्रथा है: इसमें भक्तिपरक स्मृति, ग्रामीण संसाधन-क्षमताएँ, पारंपरिक शुद्धि-विचार और सामुदायिक प्रथा सब सम्मिलित हैं। ग्रंथीय अनुशासन, क्षेत्रीय रीति-रिवाज और आधुनिक पर्यावरण-स्वास्थ्य के तर्क मिलकर यह तय करते हैं कि कौन सा तरीका उपयुक्त होगा। इसलिए परंपरा का सम्मान करते हुए भी स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार सतर्क विकल्प अपनाना दोनों ही संभव और प्रशंसनीय हैं।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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