Diwali 2025: दिल्ली से अयोध्या तक, इन 7 शहरों की दिवाली होती है सबसे खास
Diwali या दीपावली हिन्दू धर्म के सबसे व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है, पर्यावरण, क्षेत्रीय परंपराएँ और दार्शनिक व्याख्याएँ इसे अलग-अलग जगहों पर अलग तरह से विशेष बनाती हैं। दीपावली मूलतः कार्तिक माह की अमावस्या (कार्तिक अमावस्या) को जुड़ी हुई है और साधारणतः घरों में लक्ष्मी-पूजा, दीपों की रोशनी, मिठाइयाँ और सामाजिक मिलन के लिए जानी जाती है। अलग‑अलग सम्प्रदाय—वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त—और क्षेत्रीय परंपराएँ इस एक दिन को अलग‑अलग यादों और कथाओं से जोड़ती हैं; उदाहरण के लिए उत्तर भारत में यह राम की अयोध्या वापसी से जुड़ी है, दक्षिण में नरकासुर-विजय की कथा प्रमुख है, और बंगाल में अमावस्या‑रात्रि को कलि पूजा का महत्व है। 2025 में भी स्थानीय पंचांग और जिलेवार आयोजन तय करेंगे कि कौन‑सी परंपरा किस तरह उभरकर सामने आती है; नीचे सात ऐसे शहरों का संक्षिप्त वर्णन है जहाँ दीपावली की अम्बियांस, इतिहास और धार्मिक व्यवहार विशेष रूप से ध्यान देने योग्य होते हैं।
दिल्ली
राजधानी का दीपावली मौसम बड़े बाजारों, ऐतिहासिक घाटियों और आधुनिक शॉपिंग मॉलों के मेल से बनता है। चांदनी चौक और कश्मीरी गेट जैसे बाजारों में दीयों और गुलाल से लेकर पारंपरिक शिल्प तक की रौनक दिखाई देती है; आवासीय क्षेत्रों और पुरानी बस्ती के साथ‑साथ सरकारी इमारतें और ऐतिहासिक स्मारक भी सजाए जाते हैं। वैकल्पिक रूप से कई समुदायों में लक्ष्मी‑पूजा की समय‑सीमा अमावस्या के संध्या‑काल के बाद मानी जाती है; पारिस्थितिक विचारों के चलते अब कई दिल्लीयियों ने पटाखों की जगह इको‑फ्रेंडली दीप या कम शोर वाले आयोजन अपनाए हैं।
वाराणसी (काशी)
काशी में दीपावली और उससे जुड़ा एक अन्य उत्सव, देव दीपावली (कार्तिक पूर्णिमा) दोनों का अलग‑अलग महत्व है। वाराणसी की घाटों पर अमाव्या की रात को भी दीप जलते हैं, लेकिन यहाँ का खास आकर्षण कार्तिक पूर्णिमा पर होने वाला देव दीपावली है जब हजारों दीये गंगा की लहरों में तैरते दिखते हैं। ब्राह्मण और शास्त्रीय परंपराओं में स्नान, पितृकर्म और गंगा आरती का विशेष स्थान है; कुछ ग्रंथों और स्थानीय ऋतु‑वृत्तांतों में यह माना जाता है कि इस समय देवता गंगा तट पर आते हैं, अतः भव्य आरती और दीपमाला का आयोजन होता है।
जयपुर
राजस्थानी राजधानी में दीपावली का रंग राजसी और शिल्पकला के साथ दिखता है। हवामहल और सिटी पैलेस के प्रोजेक्शन‑लाइटिंग और पारंपरिक राजघरानी घेराव विशेष रूप से लोकप्रिय होते हैं। जयपुर की दीवाली हस्तशिल्प बाजारों, पेस्त्री और रंगोली की अपार परंपरा और स्थानीय मैदानी व्यंजनों से जुड़ी होती है। वैदिक और क्षेत्रीय संस्कारों के अनुसार परिवारों में घरेलू देवी‑देवताओं की पूजा, दान‑पुण्य और मेहमान‑नवाज़ी पर जोर रहता है; कई कुटुंब परंपरागत रूप से गौ सेवा और अन्नदान को भी इस समय महत्व देते हैं।
कोलकाता
पश्चिम बंगाल में दीपावली की रात शाक्त परंपरा के अनुसार कलि पूजा के नाम से मनाई जाती है। अमावस्या की रात माँ काली की पूजा, विशेष भोग और भक्तिमय मंत्रोच्चारण यहाँ की मुख्य गतिविधियाँ हैं। शास्त्रीय और तांत्रिक परंपराओं में इस रात का स्थान अलग‑अलग है; कुछ समुदायों में यह अँधेरी रात में माँ के रूपों का अहर्निश स्मरण करने का समय माना जाता है। पंडाल‑समाज और कलाकारों की संस्करणीयता के कारण कोलकाता की दिवाली में कलात्मक प्रहसन और लोकनाट्य भी गहरे प्रभाव छोड़ते हैं।
मदुरै और तमिल नाडु
दक्षिण भारत में दीपावली का धार्मिक अर्थ अक्सर नरकासुर‑विजय से जुड़ा है—कथा अनुयानुसार भगवान कृष्ण या श्रीकृष्ण की सहायता से नरकासुर का वध हुआ था और सुबह के समय दीप जलाकर विजय का उत्सव मनाया जाता है। मदुरै जैसे शहरों में मीनाक्षी‑अम्मन मंदिरों में विशेष उपासना और आरती होती है, कई परिवार सुबह स्नान और तेल स्नान की परंपरा निभाते हैं। यहाँ का स्थानीय स्वाद, मिठाई और पारिवारिक मेज़बानी का अपना महत्व है; वैष्णव सम्बंधी मठों में ‘अन्नकूट’ जैसी व्यवस्थाएँ भी देखी जा सकती हैं।
अमृतसर
सिख इतिहास में भी दीपावली विशेष महत्व रखती है; यह दिवस बंड़ी छोड़ दिवस के रूप में जाना जाता है—श्री गुरु हरगोबिंद सिंह जी के कारागार से मुक्त होने से जोड़ा जाता है—और स्वर्ण मंदिर की शोभा दीपों और प्रकाश से जगमगाती है। यहाँ के उत्सवों में गुरुद्वारों के सरोवर पर तैरते दीप और सामूहिक कीर्तन‑प्रवचन का अनूठा संयोजन दिखाई देता है। यह एक उपलब्धि‑स्मरण की भावना के साथ‑साथ समुदायिक समावेशन का समय भी है, जहाँ सिख तथा हिन्दू परंपराओं के संयुक्त आयोजन मिलते हैं।
अयोध्या
अयोध्या परंपरागत रूप से उन स्थानों में है जहाँ दीपावली की कथा सबसे जीवंत रूप में सुनाई देती है—लोककथाओं और रामायण परंपराओं में यह दिवस प्रभु राम की 14 वर्ष की वनवास के बाद अयोध्या वापसी की खुशी के साथ जुड़ा हुआ है। आधुनिक सार्वजनिक रूप से मंदिरों और गलियों की सजावट, सामूहिक लक्ष्मी‑राम की आराधना और नगर‑व्यवस्था द्वारा आयोजित रोशनी‑फेस्टिवल अयोध्या की दिवाली को बहुत विशिष्ट बनाते हैं। वैचारिक मतभेदों के बावजूद विभिन्न सम्प्रदायों की श्रद्धा और तीर्थयात्रियों की उपस्थिति से यह पर्व अक्षुण्ण रूप से जीवित रहता है।
इन शहरों में दीवाली के उत्सव का अनुभव विविधता में एकता का प्रतिबिंब है: तिथियों और व्रत‑विधियों के छोटे‑बड़े अन्तर, स्थानीय देवी‑देवता की प्राथमिकता, और सामुदायिक चुनौतियाँ‑जैसे वायु‑गुणवत्ता या सार्वजनिक सुरक्षा—सब मिलकर दीपावली के रूप को स्थानीय मानचित्र पर आकार देते हैं। अगर आप 2025 की दिवाली पर किसी खास शैली का अनुभव करना चाह रहे हैं तो स्थानीय पंचांग के अनुसार कार्तिक अमावस्या की संध्या‑तिथि और तिथियों का पालन कर लें और स्थानिक मंदिरों या धर्मसमाजों से कार्यक्रमों की पुष्टि कर लें।