Diwali 2025: दिवाली पर श्री यंत्र की स्थापना कैसे करें? जानें सही विधि
दिवाली पर श्री यंत्र की स्थापना पारंपरिक रूप से समृद्धि, सुख और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक शुभ कर्म माना जाता है। श्री यंत्र (या श्रीचक्र) को शक्ति की जोत और आकारबद्ध ब्रह्माण्ड-आकृति समझा जाता है; कई शाक्त और वैदिक परंपराओं में यह लक्ष्मी‑लाभ तथा जगत्संरचना का प्रतीक है। दीवाली—जो करक/कार्तिक माह की अमावस्या (या उसी निकट का शुभ तिथि) पर मनाई जाती है—विशेष रूप से लक्ष्मीपूजा का समय है, इसलिए कई घरों और मंदिरों में इसी दिन यंत्र की स्थापनायें की जाती हैं। परंपरागत ग्रंथों और आधुनिक पंडितों में विधि, मुहूर्त और मंत्रों के संदर्भ में विविधता मिलती है: कुछ परम्पराएँ विस्तृत श्रीविद्या दीक्षा और गुरु‑समर्थन पर जोर देती हैं, जबकि घरेलू पूजा के लिए सरल, सार्वजनिक रूप से अनुशंसित क्रियाएँ उपलब्ध हैं। नीचे दी गई विधि सामान्यत: सुरक्षित, सम्मानजनक और अनुपालन-सुलभ है; परन्तु सघन तांत्रिक साधना या दीक्षा के लिए स्थानीय गुरू या पंडित से सलाह लेना उत्तम रहेगा।
तैयारी और सामग्री
- श्री यंत्र (तांबे/तांबे‑परत, चाँदी या मुद्रित कागज़ पर) — साफ और समुचित आकार का। घर में 3–15 सेमी का तांबे का यंत्र सहज रहता है।
- लाल कपड़ा (सूती/सायन), स्वच्छ थाल/तख्ती, छोटा गोला दीपक (घी/तिल का तेल), अगरबत्ती/दूधिया धूप।
- पंचामृत, कपूर, रोली/कुमकुम, लौंग/इलायची, फलों/फूलों का नैवेद्य, अक्षत (चावल)।
- संकल्प पत्रा (छोटा कागज़), अगर संभव हो तो पवित्र जल (गंगाजल) और पंचोपचार के लिए आवश्यक बर्तन।
- शुद्ध स्थान: घर का उत्तर‑पूर्व (ईशान) कोने का शालीन, साफ और ऊँचा स्थान सर्वोत्तम माना जाता है।
उचित समय (मुहूर्त) और पारंपरिक विचार
- दिवाली का दिन (कार्तिक अमावस्या) स्वाभाविक रूप से अनुकूल माना जाता है। स्थानीय पंचांग/मासिक तिथि के अनुसार शुभ मुहूर्त के लिए अपने ब्राह्मण/स्तरीय ज्योतिष से सलाह लें।
- सामान्यतया प्रातः के ब्रह्म मुहूर्त, सुबह अर्द्धदिन या शाम के समय (लक्ष्मी पूजन के बाद) को शुभ माना जाता है।
- कुछ परंपराओं में धुँधला‑अमावस्या (संध्या) का समय अधिक प्रभावी कहा जाता है; पर यह परम्परा‑निष्ठ विवेचन पर निर्भर है।
स्थापनाविधि — चरणबद्ध तरीका (घरेलू साधारण आरम्भ)
- सम्पूर्ण शुद्धि: पूजा स्थल को स्वच्छ करें, दीपक और अगरबत्ती जलाएँ, संक्षेप में आसन और मन को शांत करें।
- संकल्प लें: संकल्प पत्रा पर अपना नाम, परिवार का नाम और उद्देश्य लिखें। उदाहरण: “आज दिनांक ___ को मैं/हम यह श्री यंत्र परिवार की समृद्धि, शान्ति और आध्यात्मिक उन्नति हेतु स्थापित करते हैं।”
- पूजा की पद्धति:
- सबसे पहले गणेश‑वन्दना करें (ॐ गणपतये नमः)।
- श्री यंत्र को लाल कपड़े पर स्थापित कर केत्राय (स्थान) निर्धारित करें—आमतौर पर यंत्र का निचला भाग (बाह्य चौकोर) दक्षिण‑पश्चिम की ओर नहीं बल्कि सामने वालों की ओर होना चाहिए; परम्परागत रूप से यंत्र का मुख पूर्व/ईशान (उत्तर‑पूर्व) की ओर रखा जाता है।
- साधारण मंत्र‑जप: यदि दीक्षा नहीं है तो श्री सूक्तम्/लक्ष्मी‑स्तोत्र का पाठ अथवा 11/108 बार ‘ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं’ जैसे पारंपरिक श्रीबीज जाप किया जा सकता है।
- अर्जन: फूल, फल, नैवेद्य चढ़ाएँ, अक्षत से तिलक करें, दीपक व आरती से पूजन समाप्त करें।
- प्राण प्रतिष्ठा (सरल विधि): पारम्परिक प्राण प्रतिष्ठा तांत्रिक रूप से विस्तृत होती है और दीक्षा से जुड़ी हो सकती है। घरेलू स्तर पर इसे निम्न प्रकार सरल रखा जा सकता है: प्रणाम कर के, संकल्प के साथ 108 या 11 बार मान्य मंत्र का जप करें, फिर हाथ की मूर्द्धन्य से यंत्र पर ऊँच‑नीच क्रम में ऊर्जा का संचार करने का ध्यान करें और अंत में दीप/दीपिका जला कर आरती करें।
मंत्र और पाठ — विविध दृष्टिकोण
- श्री विद्या परंपरा में विस्तृत मंत्र‑समूह और दीक्षा का महत्व है; यहाँ गुरु‑आशीर्वाद आवश्यक माना जाता है।
- घरेलू पूजा के लिए पण्डित और गृहस्थ परम्परा सामान्यत: श्री सूक्तम्, लक्ष्मी‑स्तोत्र या सरल बीजमंत्र (उदा. “ॐ श्रीं”) का सुझाव देती है।
- विशेष सावधानी: गूढ़ तांत्रिक मन्त्रों और आलम्बनों का प्रयोग बिना योग्य मार्गदर्शन के न करें; परंपरा में इनका दायरा और नियम भिन्न होते हैं।
स्थापना के बाद की देखभाल और नियम
- यंत्र को सदा साफ रखें, उसे सीधे जमीन पर न रखें—ऊँचे शुद्ध आसन पर रखें।
- रोज़ाना दीपक/अगरबत्ती जलाना, सप्ताह में कम से कम एक बार फूल और नैवेद्य चढ़ाना लाभदायक माना जाता है।
- श्री यंत्र को शौचालय, सोने के स्थान या कुकिंग स्थान के पास न रखें।
- यदि आप कुछ समय के लिए घर से दूर जा रहे हैं, तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति को इसकी देखभाल सौंप दें।
संस्कृतियां और वैचारिक विविधता
- श्रीयंत्र स्थापना की परम्पराएँ क्षेत्र, संप्रदाय और परिवार के अनुसार बदलती हैं। उदाहरणतः शाक्त घरों में विस्तृत श्रीविद्या साधना होती है; स्मार्त और वैष्णव घरों में लक्ष्मी‑पूजन, श्री सूक्त और सरल बीजमंत्र अधिक सामान्य हैं।
- कई विद्वान और पंडित सलाह देते हैं कि दीक्षा‑आधारित गूढ़ साधनाओं के लिए योग्य गुरु से निर्देश लें; पर घर में समर्पित, शुद्ध मन से की गई पूजा का अपना प्रामाणिक लाभ माना जाता है।
अंतिम सुझाव
- दिवाली पर श्री यंत्र की स्थापना एक शुभ अवसर हो सकता है पर यह व्यक्तिगत श्रद्धा, परिवार की परम्परा और सामुदायिक परामर्श से बेहतर बनती है।
- अगर आप विशेष मुहूर्त या विस्तृत विधि चाहें तो स्थानीय पंडित या परिवार के ज्येष्ठ सदस्य से समयपूर्व परामर्श कर लें।
- सबसे महत्वपूर्ण: ईमानदारी, शुद्धता और करुणा के भाव से किया गया संकल्प ही किसी भी पूजा का मूल है—विधि का पालन करते हुए भी मन की शुद्धता को प्राथमिकता दें।