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Diwali 2025: लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान

Diwali 2025: लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान

दीपावली के समय घर में लक्ष्मी‑गणेश की मूर्ति खरीदना न केवल पारंपरिक इच्छा बल्कि आध्यात्मिक तैयारी का भी हिस्सा होता है। सही मूर्ति चुनने का मतलब केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि सामग्री, प्रतिमा की आकृति‑विशेषताओं, स्थापना की सुविधा और पूजा के अनुकूलता का ध्यान रखना है। अलग‑अलग साम्प्रदायिक परंपराओं में मूर्तिचित्रण और स्थापना के नियमों में विविधता है: कुछ घरों में पारंपरिक पञ्चलौह या संगमरमर की मूर्तियाँ पसंद की जाती हैं, तो कुछ पारिस्थितिक कारणों से मिट्टी या जैव‑घटकों वाली मूर्तियाँ चुनते हैं। खरीदते समय यह समझना उपयोगी होगा कि किस तरह की सामग्री लंबे समय तक रखरखाव मांगती है, कौन‑सी आकृतियाँ किस अर्थ में मान्य हैं, और किस तरह की मुहूर्त या प्राणप्रतिष्ठा आवश्यक हो सकती है। नीचे दिए गए दिशानिर्देश व्यावहारिक, धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से मदद करेंगे ताकि आप सूचित और सम्मानजनक विकल्प चुन सकें।

1. सामग्री के विकल्प और उनके फायदे‑नुकसान

  • पाँचलौह/धातु (ब्रॉन्ज, कांसा, तांबा): स्थायी और पारंपरिक; मंदिरों में प्रचलित। बार‑बार सफाई की जरूरत, वजन अधिक, और कुछ धातुओं के लिए प्रामाणिकता की जाँच कर लें (पाँचलौह में पाँच धातुओं का अनुपात महत्वपूर्ण माना जाता है)।
  • संगमरमर/पत्थर: भारी, शाश्वत दिखते हैं; घर के स्थायी मंडप के लिए उपयुक्त। उठाने‑बैठाने और स्थापना में सावधानी आवश्यक है।
  • मिट्टी/काँचोला (Terracotta): पारिस्थितिक और स्वाभाविक रूप से नष्ट होने योग्य; पारंपरिक शिल्पियों से ली गई मूर्तियाँ सामाजिक समर्थन भी प्रदान करती हैं। पानी में विसर्जन के बाद कम पर्यावरणीय प्रभाव।
  • रेजिन/फाइबरग्लास: हल्की और सस्ती; परन्तु अक्सर नॉन‑बायोडिग्रेडेबल और विषैले रंगों से बनी होती हैं—बच्चों/पालतू जानवरों के घरों में सावधानी रखें।
  • लकड़ी: शिल्पकारी में खूबसूरत, पर कीट और नमी से सुरक्षा चाहिए; ऑयलिंग की आवश्यकता रहती है।

2. प्रतिमा की आकृति और प्रतीकात्मकता

  • लक्ष्मी के चार भुजाएँ: पारंपरिक आकृति में दो भुजाएँ कमल पकड़े हुए, एक वरदान (वरद) और एक अभय मुद्रा में होती है; सिक्के बहते हुए दिखाना अर्थसमृद्धि का संकेत है।
  • गणेशजी की विशेषताएँ: टूटे दांत (एक दांत), मोदक, वाहन मूषक—ये लक्षण पारम्परिक हैं।
  • ट्रंक का दिशा‑सम्बन्ध: कुछ आगामिक और शाखीय परंपराएँ बताती हैं कि दाहिना ट्रंक (दक्षिणमुखी) सख्त नियमों और उच्च शुद्धता की मांग कर सकता है, जबकि बायाँ ट्रंक गृहस्थ पूजा के लिए सामान्यतः सहनीय माना जाता है। यह व्याख्या समुदाय और शास्त्रों के आधार पर बदलती है—ग्राहक अपनी परंपरा के अनुसार चुनें।

3. आकार, वजन और स्थान‑निर्धारण

  • पहले अपने पूजा‑स्थान/मंडप का नाप लें: मूर्ति का आधार, ऊँचाई और डोअरवे के हिसाब से खरीद लें।
  • भारी मूर्तियों के लिए मजबूत आधार और समतल स्थान आवश्यक है; हल्की मूर्तियाँ अधिक बहुमुखी होती हैं।
  • हवादार, साफ और अग्नि‑सुरक्षित जगह चुनें—दीप और अगरबत्ती के लिए पर्याप्त दूरी रखें।

4. पर्यावरण और स्वास्थ्य विचार

  • रंगों में लेड या हानिकारक रसायन हो सकते हैं—बच्चे और पालतू रहते हों तो गैर‑विषैले, जलआधारित रंगों वाली मूर्तियाँ चुनें।
  • पोर्सलेटिव या प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियाँ सस्ती होती हैं पर कई बार जल प्रदूषण और नॉन‑बायोडिग्रेडेबल सामग्री से बनी होती हैं; मिट्टी/काठ/धातु के विकल्प पर्यावरण के अनुकूल माने जाते हैं।
  • स्थानिक शिल्पियों से खरीदना स्थानीय अर्थव्यवस्था को समर्थन देता है—शिल्पियों की शर्तों और न्यायसंगत मूल्य का ध्यान रखें।

5. धार्मिक और साम्प्रदायिक परंपराएँ

  • दीपावली पर लक्ष्मी‑पूजा सामान्यतः कार्तिक अमावस्या (अमावस्या तिथि) की रात में होती है; तिथि और मुहूर्त हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलते हैं—नज़दीकी पण्डित या विश्वसनीय पंचांग देखें।
  • कुछ परंपराओं में स्थायी प्रतिमा लगाने पर प्राणप्रतिष्ठा (समर्पित अनुष्ठान) की आवश्यकता होती है—यह आगाम, शास्त्र और परिवार परंपरा पर निर्भर करता है।
  • गृहस्थ परंपराओं में साधारण शुद्धिकरण (घर की सफाई, पानी, रोली/कुमकुम, दीप) और गणेश मंत्रों/लक्ष्मी स्तोत्रों का पाठ प्रचलित है।

6. खरीदते समय पूछने योग्य व्यावहारिक प्रश्न

  • मूर्ति किस सामग्री की है? (यदि धातु है तो किस प्रकार—पाँचलौह/ब्रास/कॉपर?)
  • क्या रंग‑पेंट गैर‑विषैले हैं? क्या प्रमाण या सामग्री सूची मिल सकती है?
  • वजन, ऊँचाई और आधार का आयाम क्या है—क्या वह मेरे मंदिर में फिट होगा?
  • क्या मूर्ति के साथ कोई स्थापना‑निर्देश या पूजा सामग्री दी जाती है? क्या विक्रेता वापसी/गैरकुशलता की स्थिति में सुविधा देता है?

7. देखभाल, सफाई और रखरखाव

  • धातु मूर्तियों को सूखी, मुलायम कपड़े से पोंछें; कभी भी एब्रसिव क्लीनर का प्रयोग न करें।
  • मिट्टी/टेरेकोटा मूर्तियाँ तेज़ी से गीली न हों; पूजा के बाद हल्का सूखा कपड़ा या खुली हवा में रखें।
  • दीर्घकालिक स्थापना के लिए साल में एक बार औपचारिक शुद्धिकरण और आवश्यकता अनुसार पॉलिशिंग/तेलिंग सुझाई जाती है।

निष्कर्ष

लक्ष्मी‑गणेश की मूर्ति खरीदते समय सिद्धान्त, सामुदायिक प्रथा, पर्यावरणीय प्रभाव और दैनिक उपयोगिता का संतुलन आवश्यक है। आप अपनी पारिवारिक परंपरा, पूजा‑स्थान और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के आधार पर सामग्री और आकृति चुनें। यदि आपकी परंपरा में कोई आगामिक निर्देश हैं तो स्थानीय पण्डित या सेवानिवृत्त शिल्प विशेषज्ञ से सलाह लें। इच्छित मुहूर्त और तिथि के लिए पंचांग अवश्य जाँचें—इस प्रकार आप धार्मिक सम्मान और व्यावहारिक सुविधा दोनों के साथ एक सूचित विकल्प कर पाएँगे।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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