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Diwali Calendar 2025: धनतेरस से भाई दूज तक, यहां देखें दिवाली के 5 दिनों का पूरा कैलेंडर और सभी शुभ मुहूर्त

Diwali Calendar 2025: धनतेरस से भाई दूज तक, यहां देखें दिवाली के 5 दिनों का पूरा कैलेंडर और सभी शुभ मुहूर्त

दिवाली का पर्व केवल रोशनी और मिठाइयों का उत्सव नहीं, बल्कि समय-गणना (पंचांग), तिथियों और मुहूर्तों के अनुसार नित्यकर्म और पूजा-विधि का अनुसरण भी है। हर वर्ष चंद्र-निर्धारित तिथियाँ ग्रेगोरियन कैलेंडर से कुछ दिन पहले या बाद में बदलती हैं; इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों और पंडित-पंढियों में समयों की व्याख्या भिन्न हो सकती है। नीचे दिए गए विवरण में 2025 के दिवाली-क्रम (पाँच दिनों का क्रम: धनतेरस से भाई दूज) का सामान्य पंचांगीय स्वरूप, उन दिनों के प्रमुख तिथियाँ/व्रत और आमतौर पर ग्रहनीय शुभ मुहूर्तों के संकेत दिए गए हैं। जहां संभव हुआ, मैंने पारंपरिक स्रोतों और लोक-रूपों के बीच के वैचारिक अंतर उजागर किए हैं। कृपया ध्यान दें: अंतिम निर्णय के लिए अपने स्थानीय पंडित या प्रमाणित पंचांग की जाँच अवश्य करें क्योंकि मुहूर्तों में स्थान-विशेष (IST/स्थानीय समय) के अनुसार परिवर्तन हो सकता है।

पाँच दिवसीय क्रम — सारांश (सामान्य रूप से पालन किया जाने वाला अनुक्रम)

  • दिवाली से पहले 1. धनतेरस (Dhanteras) — धनत्रयोदशी (कृष्ण पक्ष त्रयोदशी): धनवंतरी और धन की पूजा; नए सामान व सोन चाँदी की खरीद पर विशेष मान्यता।
  • 2. नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली — कृष्ण पक्ष चतुर्दशी: नरकासुर-विनाश स्मरण; सुबह स्नान-विधि और शाम को दीप-प्रज्वलन।
  • 3. दीपावली / लक्ष्मी पूजा (मुख्य दिवाली) — अमावस्या (अमावस्या का दिन): शाम को लक्ष्मी-पूजा, घर-सफ़ाई और दियो का आयोजन।
  • 4. गोवर्धन/पूर्वोत्तर प्रथाएँ / गो-पूजा या गोवर्धन पूजा/विष्णु-पूजा — अमावस्या के बाद प्रतिपदा/प्रथमा: कुछ प्रदेशों में गोवर्धन या द्वितीया/पदवा मनाई जाती है।
  • 5. भाई दूज — शुक्ल पक्ष द्वितीया/भाई दूज: बहनें भाई की रक्षा और कल्याण की कामना करती हैं; उत्तर भारत में विशेष तिथि पर भाई दूज मनते हैं।

2025 के लिए व्यवहार्य तिथियाँ (सूचना-आधारित संकेत)

  • कृपया ध्यान दें कि नीचे दी गई तिथियाँ सामान्य पंचांगानुसार अनुमानित हैं—स्थानीय समय और जगह के अनुसार बदल सकती हैं। अंतिम समय-सत्यापन के लिए स्थानीय पञ्चांग/वैदिक भाजपा प्रयोग करें।
  • दिवाली-काल (2025) — अनुमानित दिनांक (भारत/IST के अनुसार):
    • दहनतेरस — (अनुमानित) 1 दिन पहले: धनत्रयोदशी, दिन का भाग: दिनभर
    • नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — धनपक्ष चतुर्दशी: अगले दिन सुबह
    • लक्ष्मी पूजा (मुख्य दिवाली) — अमावस्या की शाम
    • गोवर्धन/द्वितीया/पदवा — अमावस्या के अगले दिन प्रातः/दोपहर
    • भाई दूज — शुक्ल द्वितीया (भाई दूज): अमावस्या के दूसरे दिन/प्रदेशीय रूढ़ि के अनुसार

प्रमुख शुभ मुहूर्त — व्याख्या एवं सामान्य संकेत

  • दहनतेरस
    • सर्वाधिक प्रचलित अनुशंसा: धनत्रयोदशी तिथि के दौरान pratyakṣa ऐच्छिक समय में सुबह 6 बजे से दोपहर के पहले भाग तक तथा सायंकालीन खरीदारी के लिये संध्याकालीन ‘श्रेष्ट’ मुहूर्त देखे जाते हैं।
    • पूर्ण सलाह: सोना-चांदी खरीदने के लिये शुभ समय (किंतु ग्रह-प्रतिपदा और व्याप्ति के अनुसार अलग-अलग पंडितों की राय भिन्न हो सकती है)।
  • नरक चतुर्दशी
    • स्नान-मुहूर्त: प्रातः कालीन स्नान-संस्कार के लिये चतुर्दशी तिथि के शुभ प्रातःकालीन भाग में व्यवस्था करती है।
    • दीप प्रज्वलन: शाम के पहले भाग और सूर्यास्त के बाद के शुरुआती घंटों को अनुकूल माना जाता है।
  • लक्ष्मी पूजा (मुख्य दिवाली)
    • मुख्य मुहूर्त: अमावस्या तिथि के शाम–रात्रि का वह समय जब तिथि बनी रहे और अर्घ देने के लिये रात के पहले भाग में “लक्ष्मी पूजन मुहूर्त” घोषित होता है। पारंपरिक रूप से सूर्यास्त के बाद से मध्यरात्रि से पहले का समय सर्वाधिक वांछनीय है।
    • अभिजित/अमृत मुहूर्त: कई शास्त्रीय पद्धतियों में अभिजित (लगभग मध्यदिन के आसपास) और अमृत मुहूर्त (व्यवस्थित समय-विंडो) को भी शुभ माना जाता है—लेकिन लक्ष्मी-पूजा पारंपरिक रूप से संध्याकालीन अनुष्ठान है।
    • विशेष निर्देश: कुछ वैदिक विद्वान अमावस्या के दौरान दीपक-प्रज्वलन के लिए सूर्यास्त के पश्चात तिथि के निरंतर बने रहने को प्राथमिकता देते हैं; यदि अमावस्या रात में कहीं छूटती है तो स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्णय लें।
  • गोवर्धन/पदवा
    • प्रातः/दोपहर मुहूर्त: अमावस्या के बाद की प्रथमा/द्वितीया तिथि में गोवर्धन पूजा या द्वितीया-व्रत के शुभ कार्यक्रम प्रातःकालीन और दोपहर के अच्छे पंचांगिक भागों में आयोजित होते हैं।
  • भाई दूज
    • शुभ समय: शुक्ल द्वितीया के दिन दोपहर वाले भाग या दक्षिणाभिमुख पक्ष (प्रातः के बाद) को बहनें भाई के लिये तिलक व आरती का शुभ समय मानती हैं—क्षेत्रीय विविधताएँ सामान्य हैं।

क्षेत्रीय/पारम्परिक विविधताएँ और शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

  • कुछ समुदायों (उदा., मैथिल, बंगाल, महाराष्ट्र) में तिथियों और अनुष्ठानों का क्रम अलग उल्लेखित हो सकता है—उदाहरण के लिये बंगाल में लक्ष्मी पूजा का अलग समय और विधि होती है।
  • Śaiva, Vaiṣṇava, Śākta और Smārta परम्पराएँ पूजा का स्वरूप बदलती हैं: Śākta परम्परा में देवी (लक्ष्मी/काली) के विशेष मंत्र-यज्ञ हो सकते हैं; Vaiṣṇava समुदाय गोवर्धन या अन्नकूट पर विशेष बल देता है।
  • ग्रह-स्थितियों के अनुरूप वैदिक पंचांग अलग-अलग स्थानों पर तिथियों का आरम्भ/अवसान बदल सकता है—इसलिए मुहूर्त निर्धारण में स्थानीय ज्योतिषाचार्य की भूमिका महत्वपूर्ण है।

अंतिम सुझाव

  • ऊपर दिया गया ढाँचा शैक्षिक और दिशानिर्देशात्मक है—सटीक तिथियों और मिनट-वार मुहूर्त के लिये अपने क्षेत्रीय पंचांग, समकालीन ज्योतिष प्रमाण-पत्र या पंडित से पुष्टि अवश्य कराएँ।
  • पूजा के समय मन-एकाग्रता, साफ-सफाई और दान-कार्य ज्यादातर परम्पराओं में अधिक महत्व रखते हैं; मुहूर्त केवल विधि-संयम में मदद करता है।

निवेदन: यदि आप चाहें तो मैं आपके शहर/जिले (IST/लोकल टाइम ज़ोन) के अनुसार 2025 की सटीक तिथियाँ और मिनट-वार मुहूर्त स्थानीय पंचांग से मिलान कर करके दे सकता/सकती हूँ।

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About G S Sachin

I am a passionate writer and researcher exploring the rich heritage of India’s festivals, temples, and spiritual traditions. Through my words, I strive to simplify complex rituals, uncover hidden meanings, and share timeless wisdom in a way that inspires curiosity and devotion. My writings blend storytelling with spirituality, helping readers connect with Hindu beliefs, yoga practices, and the cultural roots that continue to guide our lives today. When I’m not writing, I spend time visiting temples, reading scriptures, and engaging in conversations that deepen my understanding of India’s spiritual legacy. My goal is to make every article on Padmabuja.com a journey of discovery for the mind and soul.

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